कश्मीर के हालातों को कैमरे में कैद करने वाले 3 Photo journalists को मिला Pulitzer Award 2020,साझा किए अनुभव

Pulitzer Award 2020 : कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने के बाद सब कुछ बदल गया। कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा खत्म हो गया। सारे नियम बदल गए। उस दौरान काफी विरोध हुआ। स्थिति को काबू में करने के लिए केंद्र सरकार ने कई अहम कदम उठाए। राज्य में कर्फ्यू लगवा दिया गया। कुछ नेता नजरबंद कर दिए गए। फोन, इंटरनेट, सब बंद कर दिए गए।

ऐसे में कश्मीर के लोगों की जिंदगी को एसोसिएट प्रेस के 3 फोटोग्राफर्स ने अपने कैमरे में कैद किया और वहां के हालात दुनिया के सामने लाए। इन तीनों पत्रकारों की इस बहादुरी के लिए इन्हें इस साल का Pulitzer Award 2020 दिया गया। इन तीनों के नाम डार यासीन, मुख्तार खान औप चन्नी आनंद है। इनकी फीचर फोटोग्राफी ने कश्मीर के लोगों की दिनचर्या और वहां के माहौल को दुनिया के सामने लाकर रखा।

इन पत्रकारों को अपनी फोटोग्राफी के दौरान कई परेशानियों से जूझना पड़ा। हर वक्त एक मुसीबत रहती थी। कभी अजनबियों के घर में कवर करना तो कभी सब्जी के थैले में कैमरा छिपाना, पत्थरबाजी के दौरान फोटो लेना, उसके बाद पुलिस और अर्धसैनिकों की कार्रवाई झेलना पड़ता था. इसके बाद भी इन सभी पत्रकारों नेअपने कैमरे में कैद किया। सबसे मुश्किल काम तो यात्रियों को फोटो खींचने के लिए मनाना। उनसे बातचीत करना।

कवरेज के दौरान की बाते याद करते हुए यासीन ने कहा कि “यह हमेशा चूहे बिल्ली के खेल की तरह था। इन बातों ने हमें कभी चुप न रहने के लिए और ज्यादा मजबूत बना दिया।

डार, यासीन और खान श्रीनगर के ही रहने वाले हैं। जबकि आनंद जम्मू के रहने वाले हैं। अवॉर्ड (Pulitzer Award 2020) लेते वक्त आनंद ने कहा कि वो 20 सालों से एसोसिएट प्रेस के लिए काम कर रहे हैं। मुझे यकीन नहीं हो रहा कि मुझे अपने काम के लिए अवॉर्ड मिल रहा है।

आपको बता दें कश्मीर में अक्सर पत्थरबाजी, पुलिस और प्रदर्शनकारियो के बीच झड़प होती रहती है। यहां तक फोटोग्राफर्स (Pulitzer Award 2020) ने वो फोटो भी अपने कैमरे में कैद की जब पत्थरबाज सैनिकों पर पत्थर बरसाते थे। लेकिन पत्थरबाजी और फायरिंग के बीच ही फोटोग्राफर्स फोटे लेते रहे।

गौरतलब है कि कश्मीर में धारा 370 हटाने के बाद कर्फ्यू लगा दिया गया था। फोन, इंटरनेट, हर तरह की गतिविधियां बंद कर दी गई थीं। ऐसे में लगातार किसी से भी संपर्क नहीं हो पाता था। तब एपी के पत्रकारों को विरोध और बाकी समाचारों के बारे में व्यक्तिगत रूप से पता लगाना था।

खान और यासीन ने श्रीनगर की क्षेत्रीय राजधानी में और उसके आसपास सड़कों पर घूमना शुरू कर दिया. यासीन ने कहा, प्रदर्शनकारियों और सैनिकों दोनों से अविश्वास का सामना करना पड़ रहा है। इस दौरान पत्रकार न घर जा पाते थे। यहां तक वो अपने घरवालों को ये भी नहीं बता पाते थे कि वो ठीक हैं। इस तरह के माहौल में फोटो लेना काफी कठिन था।