Kisan Success Story: धान के बीजों की रक्षक, आदिवासी महिला जो बनीं पद्म श्री – कमला पुजारी की प्रेरणादायक कहानी
भारत की मिट्टी में ऐसी कई गुमनाम कहानियाँ बसी हैं, जो किताबों में नहीं, धानों की बालियों में लिखी गई हैं। ओडिशा के कोरापुट जिले की आदिवासी महिला कमला पुजारी की कहानी भी ऐसी ही है, जिन्होंने धरती के सबसे पुराने धन यानी देसी बीजों को बचाने में अपना पूरा जीवन लगा दिया। उन्होंने न तो किसी कॉलेज में पढ़ाई की और न ही बड़े शहरों में कोई प्रशिक्षण लिया, फिर भी उनका नाम आज देश भर में ‘बीज रक्षक’ के रूप में जाना जाता है। जब पूरा देश रासायनिक खेती और हाइब्रिड बीजों की दौड़ में आगे बढ़ रहा था, तब कमला पुजारी ने परंपरागत धान की किस्मों को सींचा, सहेजा और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित किया। यही समर्पण उन्हें 2019 में देश के चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म श्री तक ले गया, जो किसी भी किसान के लिए सबसे बड़ा गौरव है।
गरीब आदिवासी परिवार में जन्म, बीजों से गहरा लगाव
कमला पुजारी का जन्म ओडिशा के कोरापुट जिले के बोइपरिगुडा ब्लॉक के पतरापुट गांव में एक गरीब आदिवासी परिवार में हुआ था। वे परजा जनजातीय समुदाय से ताल्लुक रखती थीं, जहाँ खेती पीढ़ियों से जीविका का आधार रही है। बचपन से ही कमला को खेत-खलिहानों से गहरा लगाव था, लेकिन उनकी सबसे बड़ी दिलचस्पी थी देसी धान के बीजों में। वे बचपन में देखती थीं कि गाँव के बुजुर्ग किस तरह धान की अलग-अलग किस्मों को पहचानते हैं, उनके बीज अलग रखते हैं और मौसम के हिसाब से बुवाई करते हैं। यह पारंपरिक ज्ञान उनके मन में धीरे-धीरे गहरे उतरता गया। जैसे-जैसे वे बड़ी हुईं, उन्होंने देखा कि बाजार में हाइब्रिड बीजों के आने से गाँव की पुरानी धान की किस्में एक-एक करके गायब होती जा रही हैं। यही चिंता उनके जीवन का सबसे बड़ा मिशन बन गई और उन्होंने ठान लिया कि वे इन देसी बीजों को बचाकर रखेंगी।
वह बड़ा फैसला जो बदल गया उनका रास्ता
कमला पुजारी के जीवन का टर्निंग पॉइंट तब आया जब उन्होंने जेयपोर स्थित एमएस स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन से खेती की आधुनिक और वैज्ञानिक तकनीकें सीखीं। इस प्रशिक्षण के बाद उन्होंने महसूस किया कि सिर्फ खेती करने से काम नहीं चलेगा, बीजों के संरक्षण के लिए एक व्यवस्थित प्रयास करना होगा। उन्होंने गाँव की कुछ अन्य महिलाओं के साथ मिलकर फाउंडेशन की मदद से एक बीज बैंक स्थापित किया, जहाँ देसी धान और अन्य फसलों के बीजों को सुरक्षित तरीके से रखा जाने लगा। यह फैसला उस समय बहुत हिम्मत वाला था, क्योंकि ज्यादातर किसान रासायनिक खाद और हाइब्रिड बीजों को ही भविष्य मान रहे थे। लेकिन कमला का मानना था कि देसी बीजों में प्रकृति की वह ताकत है जो किसी भी रसायन से नहीं मिल सकती। उन्होंने ठान लिया कि वे न सिर्फ बीज बचाएंगी, बल्कि गाँव-गाँव जाकर जैविक खेती के फायदे भी समझाएंगी।
संघर्षों से भरा सफर, पर हौसला नहीं टूटा
कमला पुजारी का रास्ता कभी आसान नहीं था। आदिवासी महिला होने के कारण उन्हें कई तरह की सामाजिक और आर्थिक बाधाओं का सामना करना पड़ा। गाँव में कई लोगों ने शुरू में उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया, क्योंकि वे रासायनिक खेती के बड़े-बड़े दावों में विश्वास करते थे। आर्थिक तंगी भी एक बड़ी समस्या थी, क्योंकि बीजों के संरक्षण के लिए समय और मेहनत तो लगती ही है, उससे मिलने वाली तुरंत आमदनी भी सीमित रहती है। लेकिन कमला ने हार नहीं मानी और वे साथियों के साथ घर-घर जाकर जैविक खेती के बारे में जागरूकता फैलाने लगीं। धीरे-धीरे उनके काम का असर दिखने लगा और पतरापुट तथा आसपास के गाँवों में किसानों ने रासायनिक खाद का इस्तेमाल छोड़ना शुरू कर दिया। यहाँ तक कि पड़ोसी नबरंगपुर जिले के गाँवों तक उनकी पहल पहुँची, जहाँ किसानों ने जैविक खेती को अपनाया।
सफलता की रणनीति
1. देसी बीजों का संरक्षण
कमला पुजारी की सबसे बड़ी उपलब्धि सैकड़ों देशी धान की किस्मों को संरक्षित करना रही। उन्होंने काले जीरे जैसे सुगंधित और पौष्टिक चावल समेत कई लुप्तप्राय और दुर्लभ बीजों को बचाया, जिनमें धान के अलावा हल्दी, तिली, काला जीरा और महाकंता जैसे बीज भी शामिल थे। उनका तरीका बहुत सरल और प्रभावी था, वे अपने खेत में देसी धान की बुवाई करती थीं ताकि बीज आगे की पीढ़ी के लिए तैयार रहें। बीज बैंक के माध्यम से ये बीज गाँव के किसानों तक भी पहुँचते थे, जिससे एक तरह की बीज-श्रृंखला बन गई। उनकी इसी मेहनत की वजह से आज भी कई पारंपरिक किस्में जीवित हैं, जो वरना हमेशा के लिए गायब हो जातीं।
2. जैविक खेती का प्रचार-प्रसार
बीज संरक्षण के साथ-साथ कमला पुजारी ने जैविक खेती को भी अपना हथियार बनाया। उन्होंने किसानों को समझाया कि रासायनिक खाद और कीटनाशक मिट्टी की सेहत खराब कर रहे हैं और लंबे समय में खेतों को बंजर बना रहे हैं। उनके जागरूकता अभियानों में गाँव-गाँव जाकर बातचीत, प्रदर्शनी और खेतों पर ही प्रयोग करके दिखाना शामिल था। यह उनकी रणनीति का सबसे प्रभावी हिस्सा था, क्योंकि किसान अपनी आँखों से जैविक खेती के परिणाम देख पाते थे। उनके प्रयासों से कई गाँवों में रासायनिक खेती पूरी तरह बंद हो गई और लोगों ने प्राकृतिक तरीकों से खेती करना शुरू किया।
3. सामुदायिक भागीदारी और बीज बैंक
कमला पुजारी जानती थीं कि अकेले कोई बड़ा काम नहीं हो सकता, इसलिए उन्होंने गाँव की महिलाओं को अपने साथ जोड़ा। एमएस स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन की मदद से बने बीज बैंक में कई महिलाओं ने साथ मिलकर काम किया और देसी बीजों का भंडार तैयार हुआ। इस सामुदायिक मॉडल की खासियत यह थी कि ज्ञान और बीज दोनों बाँटे जाते थे, जिससे यह पहल एक व्यक्ति तक सीमित न रहकर पूरे क्षेत्र की ताकत बन गई। यही वजह है कि उनकी मृत्यु के बाद भी यह बीज बैंक और जैविक खेती का आंदोलन जीवित है। उनकी यह रणनीति आज भी किसानों और शोधकर्ताओं के लिए एक आदर्श उदाहरण है।
सफलता का वह क्षण जब देश ने पहचाना
कमला पुजारी के संघर्ष और समर्पण को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर सम्मान मिला। साल 2002 में उन्हें दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में ‘इक्वेटर इनिशिएटिव अवार्ड’ से नवाजा गया, जहाँ दुनिया भर से आए विशेषज्ञों ने उनके पारंपरिक और जैविक खेती के प्रयासों की सराहना की। ओडिशा सरकार ने 2004 में उन्हें ‘सर्वश्रेष्ठ महिला किसान’ का पुरस्कार दिया और 2018 में वे राज्य योजना बोर्ड की सदस्य भी बनीं। भुवनेश्वर स्थित ओडिशा कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के एक गर्ल्स हॉस्टल का नाम भी 2017 में उनके नाम पर रखा गया। लेकिन सबसे बड़ा सम्मान तब मिला जब 16 मार्च 2019 को तत्कालीन राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया। एक साधारण आदिवासी महिला का देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक तक पहुँचना हर भारतीय किसान के लिए गर्व का क्षण था।
युवाओं के लिए संदेश
कमला पुजारी का जीवन युवाओं को यह सिखाता है कि बड़ी डिग्री या बड़े शहरों के बिना भी देश के लिए बड़ा काम किया जा सकता है। उन्होंने दिखाया कि अपनी जड़ों से जुड़े रहना कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी ताकत है। जिस दौर में युवा खेती छोड़कर शहरों की ओर भाग रहे हैं, कमला पुजारी की कहानी उन्हें बताती है कि खेत की मिट्टी में भी सम्मान, पहचान और राष्ट्रसेवा का मौका है। उनका संदेश स्पष्ट है कि प्रकृति से दोस्ती करो, पुराने ज्ञान का सम्मान करो और छोटे-छोटे कदमों से बड़ा बदलाव लाओ। अगर एक गरीब आदिवासी महिला सैकड़ों बीजों की रक्षा करके दुनिया भर में नाम कमा सकती है, तो कोई भी युवा अपने क्षेत्र में ऐसा ही कर सकता है।
निष्कर्ष
कमला पुजारी अब हमारे बीच नहीं हैं, 2024 में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी विरासत आज भी ओडिशा के खेतों में लहलहाती धान की बालियों में जीवित है। उन्होंने सैकड़ों देसी धान की किस्मों को विलुप्त होने से बचाया और हजारों किसानों को जैविक खेती की राह दिखाई। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्ची सफलता पैसे या प्रसिद्धि में नहीं, बल्कि धरती और समाज के लिए किए गए काम में होती है। ‘बीजों की रक्षक’ कहलाने वाली कमला पुजारी की कहानी हर उस किसान को प्रेरित करेगी जो मिट्टी से प्यार करता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ छोड़कर जाना चाहता है।