UPSC Success Story: दर्जी के बेटे से पहले ही प्रयास में IAS तक – विजय अमृता कुलांगे की प्रेरणादायक कहानी
महाराष्ट्र के अहमदनगर ज़िले के छोटे से गाँव रालेगण में एक ऐसा लड़का पला-बढ़ा, जिसके पिता कपड़े सिलते थे और माँ खेतों में मज़दूरी करती थीं। घर की कुल आमदनी दिन के मुश्किल से दो सौ रुपये थी, जिनमें दो बच्चों का पेट भरना और पढ़ाई का खर्चा निकालना एक रोज़ाना की लड़ाई थी। इसी लड़के ने साल 2012 में बिना किसी कोचिंग, नौकरी करते हुए, मराठी भाषा में पहली ही बार में UPSC की परीक्षा पास कर IAS अधिकारी बनकर सबको हैरान कर दिया। आज उन्हें ओडिशा के ‘पीपुल्स कलेक्टर’ के नाम से जाना जाता है। और अगर आप भी प्रशासनिक सेवा का सपना देखते हैं, तो अपनी उम्र और योग्यता UPSC Eligibility Calculator से ज़रूर जाँच लें, क्योंकि सपने की शुरुआत सही जानकारी से ही होती है।
गरीबी में बिता बचपन और माता-पिता की मेहनत
विजय अमृता कुलांगे का जन्म महाराष्ट्र के रालेगण गाँव में एक बेहद साधारण परिवार में हुआ। उनके पिता दर्जी थे, जो दिन-रात सिलाई मशीन चलाकर घर चलाते थे, और उनकी माँ खेतों में दिहाड़ी मज़दूरी करती थीं। गरीबी इतनी थी कि बच्चों के पास खेलने के खिलौने तक नहीं थे, लेकिन माता-पिता की एक शर्त हमेशा बनी रही – स्कूल कभी नहीं छूटेगा। कभी-कभी माँ को अपने लिए खाना छोड़कर बेटे की किताब-कॉपियाँ खरीदनी पड़ती थीं, फिर भी पढ़ाई की प्राथमिकता पर कोई समझौता नहीं हुआ। विजय गाँव के ज़िला परिषद स्कूल में पढ़ते थे और शुरू से ही मेहनती छात्र थे।
बचपन में ही विजय ने अपने माता-पिता को दूसरों के खेतों और घरों में पसीना बहाते देखा। यही दृश्य उनके मन में एक सवाल छोड़ गया – क्या ज़िंदगी हमेशा ऐसी ही रहेगी? वे दसवीं और बारहवीं दोनों बोर्ड परीक्षाओं में स्कूल के सबसे अच्छे छात्रों में रहे। उस समय उनका सपना डॉक्टर बनकर गाँव के गरीब लोगों की सेवा करना था। उन्होंने MBBS की सीट भी हासिल कर ली थी, लेकिन फीस का खर्च परिवार की पहुँच से बाहर था। एक सपना टूटा, लेकिन विजय का हौसला नहीं टूटा।
सपने की नई दिशा – प्राथमिक शिक्षक से प्रशासनिक सेवा की ओर
डॉक्टर बनने का सपना छूटने के बाद विजय की माँ ने उन्हें समझाया कि पहले कोई नौकरी पकड़ लो और अपने पैरों पर खड़े हो जाओ। विजय ने डिप्लोमा इन एजुकेशन (डी.एड.) किया और सरकारी स्कूल में प्राथमिक शिक्षक बन गए। दिन में वे बच्चों को पढ़ाते और रात में खुद पढ़ाई करते। धीरे-धीरे उनके मन में यह बात बैठने लगी कि सिर्फ एक गाँव के बच्चों को पढ़ाने से बड़ी ज़िम्मेदारी लेकर वे पूरे समाज को बदल सकते हैं। इसी सोच ने उन्हें प्रशासनिक सेवा की ओर मोड़ दिया।
तत्कालीन अहमदनगर के ज़िला कलेक्टर आईएएस संजीव कुमार से मुलाक़ात ने उनके आत्मविश्वास को और बढ़ाया। उन्होंने विजय को UPSC की तैयारी के लिए प्रेरित किया। विजय ने तय कर लिया कि वे सिविल सेवा परीक्षा देंगे, भले ही रास्ता कितना भी कठिन क्यों न हो। एक शिक्षक की नौकरी ने उन्हें आर्थिक सुरक्षा दी थी, जिससे वे बिना डर के यह बड़ा जोखिम उठा सके।
संघर्ष के दिन – असफलता और अथक परिश्रम
विजय की राह आसान नहीं थी। पहले उन्होंने महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (MPSC) की परीक्षा दी, जिसमें वे दो बार असफल रहे। हार मानने के बजाय उन्होंने अपनी गलतियों को समझा और तीसरे प्रयास में MPSC पास कर सेल्स टैक्स इंस्पेक्टर बन गए, फिर चौथे प्रयास में तहसीलदार बने। इन वर्षों में उन्होंने पाँच साल तक स्टेट सिविल सेवा की पढ़ाई के नोट्स बनाए थे, जो आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी पूँजी साबित हुए।
अब बारी थी UPSC की। विजय ने कोई कोचिंग नहीं ली, क्योंकि नौकरी के साथ समय मिलना मुश्किल था। वे ड्यूटी से पहले और बाद में मिलने वाले हर घंटे का इस्तेमाल करते। अंग्रेज़ी से जूझते हुए उन्होंने हिम्मत करके मराठी में परीक्षा देने का फैसला किया, जबकि उस भाषा में पढ़ाई की सामग्री भी सीमित थी। साल 2012 में उन्होंने पहली ही बार में UPSC सिविल सेवा परीक्षा पास कर IAS का पद हासिल कर लिया – पूरे गाँव और परिवार के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था।
सफलता की रणनीति
बिना कोचिंग, अनुशासन से पढ़ाई
विजय की सबसे बड़ी रणनीति थी नियमितता और अनुशासन। नौकरी के बावजूद वे रोज़ाना तय समय पर पढ़ते थे और छोटे-छोटे लक्ष्य बनाते थे। उनका मानना था कि कोचिंग सफलता की गारंटी नहीं है, बल्कि खुद की समझ और निरंतर अभ्यास ही असली हथियार है। उन्होंने अपनी भाषा की कमज़ोरी को ताकत बनाया और मराठी में आत्मविश्वास से परीक्षा दी।
नोट्स बनाने की आदत
MPSC की तैयारी के दौरान बनाए गए पाँच साल के नोट्स ने UPSC में उनकी नींव मज़बूत कर दी। विजय कहते हैं कि जो ज्ञान आप खुद लिखकर तैयार करते हैं, वह परीक्षा के दबाव में भी साथ नहीं छोड़ता। उनकी यह आदत आज के अभ्यर्थियों के लिए भी एक बड़ी सीख है कि सतही पढ़ाई से ज़्यादा काम की है गहरी और लिखित समझ।
बिना डर के प्रयास
विजय के पिता के शब्दों ने उन्हें हिम्मत दी और शिक्षक की नौकरी ने उन्हें आर्थिक सुरक्षा। इसलिए वे बिना किसी डर या दबाव के परीक्षा में बैठ सके। उनका कहना है कि जब आपके पास ‘प्लान बी’ होता है, तो ‘प्लान ए’ के लिए आप बेझिझक पूरी ताकत लगा सकते हैं। यही बेफिक्री उनकी सफलता का छिपा हुआ राज़ थी।
समाज के लिए काम करने का जुनून
IAS बनने के बाद विजय ने गंजाम ज़िले के कलेक्टर के तौर पर कोविड काल में 15 दिनों में अस्पताल तैयार करवाए, प्रवासी मज़दूरों को मनरेगा से रोज़गार दिया और चक्रवात यास के समय समय पर लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया। उन्होंने बाल विवाह रोकने के लिए सूचना देने वाले को पाँच हज़ार रुपये के इनाम की घोषणा की, जिससे कुछ ही महीनों में 38 बाल विवाह रुक गए।
सफलता का क्षण
जब UPSC 2012 का परिणाम आया और विजय का चयन IAS के लिए हुआ, तो रालेगण गाँव में जश्न का माहौल बन गया। जिस लड़के के पास कभी खिलौने नहीं थे, जिसके पिता दो सौ रुपये दिन में कमाते थे, वह अब देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवा का हिस्सा था। उनकी पहली पोस्टिंग ओडिशा के ढेंकानाल ज़िले में हुई। बाद में उन्होंने अपनी ज़िंदगी के संघर्षों और माता-पिता के त्याग पर मराठी में ‘आजचा दिवस माझा’ नाम से किताब भी लिखी, जो हज़ारों युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई।
आज विजय अमृता कुलांगे भुवनेश्वर नगर निगम के आयुक्त के रूप में काम कर रहे हैं और गाँव-गाँव जाकर युवाओं से मिलते हैं। उनकी ‘राजस्व रथ’ पहल – जो ज़मीन के कागज़ात और प्रमाणपत्र लोगों के दरवाज़े तक पहुँचाती है – आज पूरे ओडिशा में अपनाई जा रही है। गरीब परिवार का यह बेटा अब हज़ारों गरीब परिवारों की तकदीर बदल रहा है।
युवाओं के लिए संदेश
विजय का संदेश बेहद सरल है – गरीबी या भाषा आपकी सीमा नहीं है, आपका हौसला ही आपकी असली ताकत है। उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि दर्जी के बेटे को क्या-क्या नहीं मिल सकता, बल्कि यह सोचा कि कड़ी मेहनत से क्या-क्या हासिल किया जा सकता है। वे कहते हैं कि असफलता से मत डरो, क्योंकि हर असफलता आपको सफलता के एक कदम और करीब लाती है।
वे युवाओं से यह भी कहते हैं कि शिक्षा ही गरीबी से निकलने का स्थायी रास्ता है। उनके माता-पिता ने खुद भूखे रहकर भी उनकी पढ़ाई नहीं रुकने दी, और आज वही पढ़ाई लाखों लोगों की सेवा का ज़रिया बन गई है। अगर आपके पास सपना है और उसके लिए रोज़ मेहनत करने का जज़्बा है, तो कोई भी परिस्थिति आपको रोक नहीं सकती।
निष्कर्ष
विजय अमृता कुलांगे की कहानी यह सिखाती है कि बड़ा सपना देखने के लिए बड़ा घर या बड़ा बैंक बैलेंस ज़रूरी नहीं होता। दर्जी के बेटे से IAS अधिकारी तक का यह सफर मेहनत, धैर्य और माता-पिता के विश्वास की जीत है। उन्होंने साबित कर दिया कि नौकरी करते हुए, बिना कोचिंग और अपनी मातृभाषा में भी देश की सबसे कठिन परीक्षा पास की जा सकती है।
आज जब वे गाँव के स्कूलों में बच्चों से मिलते हैं, तो उनकी आँखों में वही चमक देखते हैं जो कभी उनकी अपनी आँखों में थी। उनकी कहानी हर उस युवा के लिए उम्मीद की किरण है जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़ा सपना देखता है। मेहनत करो, डरो मत और अपने सपनों पर विश्वास रखो – यही विजय कुलांगे की ज़िंदगी का सबसे बड़ा संदेश है।