Kisan Success Story: डाकिए से देसी बीजों के रक्षक तक – बाबूलाल दहिया की प्रेरणादायक कहानी
मध्य प्रदेश के सतना जिले के छोटे से गाँव पिथौराबाद में एक किसान रहता है, जिसके खेतों में सिर्फ धान नहीं, बल्कि देश की सदियों पुरानी विरासत भी पल रही है। नाम है बाबूलाल दहिया — कभी पोस्टमास्टर, आज बघेली भाषा के मशहूर कवि और कहानीकार, और सबसे बढ़कर देश के देसी बीजों के सबसे बड़े संरक्षकों में से एक। उन्होंने 200 से ज़्यादा परंपरागत धान की किस्मों को बचा लिया है, जो कभी हमारे खेतों की शान थीं और अब बाज़ार की हाइब्रिड किस्मों की भीड़ में गुम होती जा रही हैं। उनकी मेहनत को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 2019 में कृषि के क्षेत्र में पद्म श्री से सम्मानित किया। आज उनकी कहानी हर उस किसान के लिए प्रेरणा है, जो अपनी मिट्टी और अपने बीजों से मोहब्बत करता है।
बचपन और शुरुआती जीवन
बाबूलाल दहिया का जन्म और परवरिश सतना के पास पिथौराबाद गाँव में ही हुई। बचपन से ही उनका मन पढ़ने-लिखने और लोककथाओं में रमता था। नौकरी के लिए उन्होंने डाक विभाग का रास्ता चुना और लंबे समय तक पोस्टमास्टर के पद पर काम किया। नौकरी के साथ-साथ उन्होंने आदिवासी लोक कला परिषद में भी काम किया, जहाँ उनका काम लोक साहित्य और गीतों का संग्रह करना था। गाँव-गाँव जाकर पुराने गीतों और कहानियों को सहेजने का यह काम धीरे-धीरे उनकी ज़िंदगी की दिशा बदलने वाला था।
पोस्टमास्टर की नौकरी से रिटायर होने के बाद ज़्यादातर लोग आराम करते हैं, लेकिन बाबूलाल जी के मन में एक नई बेचैनी जाग रही थी। लोककथाओं के संग्रह के दौरान उन्होंने बार-बार धान और सब्ज़ियों की ऐसी किस्मों के नाम सुने थे, जो अब खेतों में कहीं दिखती ही नहीं थीं। करगी, कलावती जैसे धान की किस्में, जिनका ज़िक्र पुराने गीतों में मिलता था, आज की खेती में लगभग विलुप्त हो चुकी थीं। यही बात उनके मन को कुरेदने लगी और उन्होंने तय कर लिया कि रिटायरमेंट के बाद का जीवन इन बीजों को बचाने में लगाएँगे।
मोड़: लोककथाओं से बीजों की ओर
साल 2005 में बाबूलाल जी ने अपना मिशन शुरू किया। वे अपनी कुल आठ एकड़ ज़मीन में से दो एकड़ पर जैविक तरीके से परंपरागत धान की खेती करने लगे। बाकी छह एकड़ में सौ से ज़्यादा तरह की दालें, अनाज और सब्ज़ियाँ उगाईं। उनकी शुरुआत लोकगीतों और कहानियों में आए नामों को ढूँढ़ने से हुई — जिन किस्मों का ज़िक्र बुज़ुर्गों के गीतों में था, उन्हें उन्होंने किसानों के बीच से खोजा, बचाया और अपने खेत में उगाकर संरक्षित किया। कवि की संवेदनशीलता और किसान की लगन का यह अनोखा मेल ही उनकी असली ताकत बना।
उनकी दिलचस्पी सिर्फ धान तक सीमित नहीं रही। धीरे-धीरे उन्होंने बारह तरह के गेहूँ, देसी सब्ज़ियों और दालों की किस्मों का भी संग्रह तैयार कर लिया। उनका मानना था कि एक समय देश में एक लाख से ज़्यादा परंपरागत धान की किस्में थीं, जो घटते-घटते बहुत कम रह गई हैं। उनके संग्रह में आज दो सौ से ज़्यादा किस्में हैं, जिन्हें वे लगातार बचा रहे हैं और उनका अध्ययन कर रहे हैं। हर बीज के पकने पर उन्हें वही ख़ुशी मिलती है, जो किसी कवि को अपनी नई रचना पूरी होने पर मिलती है।
संघर्ष: उपेक्षा और संदेह की दीवारें
जब बाबूलाल जी ने हाइब्रिड बीजों और रासायनिक खाद की जगह देसी बीजों और जैविक खेती का रास्ता चुना, तो शुरुआती दिनों में उन्हें काफ़ी संदेह का सामना करना पड़ा। आसपास के किसान कहते थे कि पुरानी किस्मों से उपज नहीं मिलेगी और यह सब समय की बर्बादी है। बाज़ार में हाइब्रिड बीजों का बोलबाला था और सरकारी योजनाएँ भी उसी दिशा में चल रही थीं, ऐसे में एक बुज़ुर्ग किसान की बात पर कौन ध्यान देता। लेकिन बाबूलाल जी ने हार नहीं मानी और अपने प्रयोग खेतों में जारी रखे।
सबसे बड़ी चुनौती बीजों को खोजना थी। कई किस्में इतनी दुर्लभ हो चुकी थीं कि उन्हें दूर-दराज़ के गाँवों में बूढ़े किसानों के पास से ढूँढ़ना पड़ा। कई बार बीज मिलते भी तो इतने कम कि उनसे अगली पीढ़ी की फसल उगाना जुआ लगता था। उम्र भी बढ़ रही थी और शरीर भी पहले जैसा साथ नहीं देता था, लेकिन कवि का जज़्बा और किसान का धैर्य उन्हें हर बार खेत में वापस खींच लाता था। वे कहते हैं कि जब बीज अंकुरित होते और फसल पकती है, तो सारी थकान और सारे ताने भूल जाते हैं।
सफलता की रणनीति
1. लोक-ज्ञान और वैज्ञानिक प्रयोग का मेल
बाबूलाल जी ने सिर्फ बीज नहीं बचाए, बल्कि उनके गुणों का वैज्ञानिक अध्ययन भी किया। उन्होंने अपनी संस्था के ज़रिए प्रयोग किए जिनमें हाइब्रिड धान के बीजों और देसी किस्मों को साथ-साथ उगाया गया। नतीजे चौंकाने वाले थे — देसी किस्म नेवली महज़ 90 दिनों में पक गई और उसे बहुत कम पानी की ज़रूरत पड़ी, जबकि हाइब्रिड किस्म आईआर-36 को पकने में 120 दिन लगे और तीन गुना ज़्यादा पानी चाहिए था। यह प्रयोग साबित करता है कि स्थानीय जलवायु के अनुकूल देसी बीज सूखे जैसे हालात में फसल की विफलता कम कर सकते हैं।
2. कम पानी, जैविक खेती
उनकी पूरी खेती जैविक तरीकों से होती है, बिना रसायनों के। उनका कहना है कि देसी किस्में कम पानी वाले इलाकों में भी अच्छा उत्पादन देती हैं, जो जल संकट से जूझते किसानों के लिए वरदान है। आठ एकड़ की खेती में वे तरह-तरह की फसलें उगाते हैं, जिससे ज़मीन की सेहत भी बनी रहती है और जोखिम भी बँटा रहता है। उनकी यह पद्धति साबित करती है कि परंपरागत खेती पिछड़ापन नहीं, बल्कि भविष्य का रास्ता है।
3. कविता के ज़रिए प्रचार
बाबूलाल जी सिर्फ खेत में नहीं, मंच पर भी अपनी लड़ाई लड़ते हैं। बघेली भाषा के कवि और कहानीकार के रूप में वे कवि सम्मेलनों में शामिल होते हैं और क्षेत्रीय प्रकाशनों के लिए लेख लिखते हैं। अपनी कविताओं और लेखों के माध्यम से वे देसी बीजों की अहमियत गाँव-गाँव तक पहुँचाते हैं। लोककला परिषद में किया गया उनका पुराना काम आज उनके मिशन का सबसे मज़बूत हथियार बन गया है — कवि की आवाज़ और किसान के अनुभव का यह संगम हज़ारों किसानों को प्रेरित कर रहा है।
सफलता का पल: पद्म श्री की घोषणा
2019 में जब केंद्र सरकार ने कृषि के क्षेत्र में बाबूलाल दहिया को पद्म श्री देने की घोषणा की, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे देसी बीज आंदोलन का सम्मान था। उस समय वे लगभग 75 साल के थे। समाचार एजेंसी से बात करते हुए उन्होंने कहा था कि पद्म श्री पाकर वे बहुत खुश हैं, लेकिन सबसे ज़्यादा ख़ुशी उन्हें अपने खेतों में पकी फसल देखकर मिलती है। बीज का पकना उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है, और यह भावना उन्हें बाकी सबसे अलग करती है।
आज देश-विदेश के पत्रकार और कृषि विशेषज्ञ उनके खेत देखने आते हैं। उनका खेत अब एक जीवित संग्रहालय बन गया है, जहाँ दो सौ से ज़्यादा धान की किस्में एक साथ लहलहाती हैं। मध्य प्रदेश जैसे राज्य में, जहाँ किसान सोयाबीन जैसी नकदी फसलों की ओर भाग रहे थे और परंपरागत फसलें पीछे छूट रही थीं, बाबूलाल जी का काम एक नई दिशा दिखाता है। उनकी मेहनत ने यह साबित कर दिया है कि देशी बीजों का संरक्षण कोई शौक नहीं, बल्कि राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा का गंभीर काम है।
युवाओं के लिए संदेश
बाबूलाल दहिया की कहानी युवाओं को सिखाती है कि सफलता के लिए उम्र या साधन की नहीं, बल्कि जज़्बे और धैर्य की ज़रूरत होती है। उन्होंने रिटायरमेंट के बाद वह काम शुरू किया, जो आज उनकी पहचान बन गया है — यानी कभी भी देर नहीं होती। दूसरा बड़ा सबक यह है कि अपनी जड़ों से जुड़ना पिछड़ापन नहीं है। लोकगीतों में छिपे ज्ञान को उन्होंने वैज्ञानिक प्रयोगों से जोड़कर दिखा दिया कि परंपरा और आधुनिकता साथ चल सकती हैं।
उनका जीवन यह भी सिखाता है कि अपनी मिट्टी और अपने बीजों से प्रेम करना देशभक्ति का ही एक रूप है। जब पूरी दुनिया हाइब्रिड बीजों और रसायनों की ओर भाग रही थी, तब एक अकेले किसान ने अपनी विरासत को बचाने का बीड़ा उठाया। युवाओं को उनसे यह प्रेरणा लेनी चाहिए कि जिस काम में विश्वास हो, उसमें अकेले भी चलने का साहस रखो — रास्ता खुद बन जाता है और सम्मान खुद चलकर आता है।
निष्कर्ष
बाबूलाल दहिया की कहानी एक किसान की नहीं, बल्कि एक पूरे आंदोलन की कहानी है। पोस्टमास्टर से कवि और कवि से बीज-रक्षक तक का उनका सफर दिखाता है कि इंसान जब किसी बड़े उद्देश्य से जुड़ जाता है, तो उसकी उम्र, पेशा और साधन सब गौण हो जाते हैं। दो सौ से ज़्यादा धान की किस्मों का उनका खेत आज देश के किसानों के लिए एक जीवित पाठशाला है, जो बताती है कि हमारी धरती की असली ताकत हमारे देसी बीजों में है।
पद्म श्री जैसे सम्मान तो आते-जाते रहेंगे, लेकिन बाबूलाल जी की असली विरासत वह बीज हैं, जो आने वाली पीढ़ियों के खेतों में लहलहाएँगे। उनकी कहानी हर किसान और हर युवा को यही संदेश देती है — अपनी जड़ों को सहेजो, क्योंकि वही तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत हैं। देसी बीजों का यह रक्षक हमें याद दिलाता है कि प्रकृति से दोस्ती ही सच्ची समृद्धि का रास्ता है।