UPSC Success Story: बिना बिजली वाले घर की बेटी से केरल की पहली आदिवासी महिला कलेक्टर – श्रीधन्या सुरेश की प्रेरणादायक कहानी

UPSC Success Story: बिना बिजली वाले घर की बेटी से केरल की पहली आदिवासी महिला कलेक्टर – श्रीधन्या सुरेश की प्रेरणादायक कहानी

केरल के वायनाड जिले की एक छोटी-सी आदिवासी बस्ती में रहने वाली एक लड़की, जिसके घर में बिजली भी उसके आईएएस बनने से कुछ साल पहले ही आई थी, आज केरल के कासरगोड जिले की जिलाधिकारी है। 16 सितंबर 2026 को जब श्रीधन्या सुरेश ने कासरगोड के जिला कलेक्टर का पदभार संभाला, तो वे केरल की पहली आदिवासी महिला जिला कलेक्टर बन गईं। उनका यह सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है, जिसमें गरीबी, अंधेरा और संसाधनों की कमी थी, लेकिन उससे कहीं ज्यादा थी पढ़ाई के प्रति जिद और अपने समुदाय के लिए कुछ करने का जुनून।

बचपन: जहाँ बिजली भी एक सपना थी

श्रीधन्या सुरेश का जन्म 30 दिसंबर 1991 को केरल के वायनाड जिले के पोझुथाना पंचायत की एक आदिवासी बस्ती में हुआ। वे कुरिचिया समुदाय से आती हैं, जो वायनाड के मूल आदिवासी समूहों में से एक है। उनके पिता सुरेश दिहाड़ी मजदूर थे और मां कमला ग्रामीण रोजगार योजना के तहत काम करती थीं। घर का खर्च चलाने के लिए परिवार को कभी-कभी हाथ से बने पारंपरिक धनुष-बाण भी बेचने पड़ते थे। बस्ती के उस घर में इतनी मूलभूत सुविधाएं भी नहीं थीं, जितनी शहर के लोग सामान्य मानते हैं — बिजली उनके घर तक श्रीधन्या के सिविल सेवा में आने से कुछ साल पहले ही पहुंची थी।

इन्हीं हालातों में श्रीधन्या ने अपनी शुरुआती पढ़ाई मलयालम माध्यम के सरकारी स्कूलों से की। घर में पढ़ने के लिए किताबें खरीदने के पैसे नहीं थे, लेकिन पढ़ाई के प्रति उनकी लगन इतनी गहरी थी कि वे हर बाधा को पार करती गईं। उन्होंने कोझिकोड के प्रसिद्ध सेंट जोसेफ कॉलेज, देवगिरि से जंतु विज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल की और फिर कालीकट विश्वविद्यालय से एप्लाइड जूलॉजी में परास्नातक किया। यह उस लड़की के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी, जिसने कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन वह देश की सबसे कठिन परीक्षा में सफल होगी।

वह मुलाकात, जिसने सपना दिखाया

पढ़ाई पूरी करने के बाद श्रीधन्या ने केरल के अनुसूचित जनजाति विकास विभाग में नौकरी की, जहां वे वायनाड में आदिवासी छात्रों के एक हॉस्टल में वार्डन के रूप में काम करती थीं। यह काम उन्हें अच्छा लगता था, क्योंकि वे अपने ही समुदाय के बच्चों के बीच थीं। लेकिन 2016 में उनकी जिंदगी ने एक ऐसा मोड़ लिया, जिसने सब कुछ बदल दिया। उस साल उनकी मुलाकात वायनाड के तत्कालीन सब-कलेक्टर सीराम सांबशिव राव से हुई, जिनके सरल स्वभाव और प्रोत्साहन ने श्रीधन्या के मन में सिविल सेवा की परीक्षा देने का बीज बो दिया।

यह फैसला उनके लिए आसान नहीं था। एक स्थिर सरकारी नौकरी छोड़कर यूपीएससी जैसी अनिश्चित परीक्षा की तैयारी करना किसी के लिए भी बड़ा जोखिम था, और उनके जैसे परिवार के लिए तो यह और भी बड़ा दांव था। फिर भी उन्होंने हॉस्टल वार्डन की नौकरी से इस्तीफा दे दिया और पूरी तरह तैयारी में जुट गईं। उनके पास दिल्ली या कोचिंग संस्थानों के महंगे संसाधन नहीं थे, इसलिए उन्होंने अपनी मेहनत और सीमित किताबों के दम पर तैयारी शुरू की। यह वह पल था, जब एक आदिवासी बस्ती की लड़की ने देश के सबसे बड़े प्रशासनिक सपने की ओर पहला कदम बढ़ाया।

संघर्ष के दिन: दो बार असफलता, फिर भी हिम्मत न हारी

श्रीधन्या का यूपीएससी का सफर आसान नहीं था। उनके पहले दो प्रयास — 2016 और 2017 में — असफल रहे। देश के लाखों अभ्यर्थियों की तरह उन्होंने भी हार का स्वाद चखा, लेकिन उन्होंने रुकने के बजाय फिर से तैयारी शुरू कर दी। इसी दौरान केरल में आई भीषण बाढ़ ने उनकी किताबों के दो बोरे बहा दिए, जो उनके लिए बहुत बड़ा नुकसान था। गरीब परिवार की बेटी के लिए किताबें दोबारा खरीदना आसान नहीं था, फिर भी उन्होंने हौसला नहीं छोड़ा और जो संसाधन बचे थे, उन्हीं से तैयारी जारी रखी।

तीसरे प्रयास में जब वे प्रीलिम्स और मेन्स दोनों में सफल होकर इंटरव्यू के लिए चुनी गईं, तो सामने एक नई चुनौती आ खड़ी हुई। दिल्ली जाकर इंटरव्यू देने के लिए उनके पास यात्रा का खर्च तक नहीं था। ऐसे में उनके दोस्त आगे आए और उन्होंने मिलकर श्रीधन्या को 40,000 रुपये उधार दिए, ताकि वे दिल्ली जा सकें। यह पैसा सिर्फ एक उधारी नहीं थी, बल्कि उन लोगों के भरोसे की गवाही थी, जो उनकी काबिलियत पर यकीन करते थे। दोस्तों की इस मदद से वे इंटरव्यू में शामिल हुईं और आखिरकार सफलता उनके कदम चूमने आई।

सफलता की रणनीति: श्रीधन्या से सीखने वाली बातें

सीमित संसाधनों में पूरी तैयारी

श्रीधन्या के पास कोचिंग, महंगे नोट्स या दिल्ली जैसे संसाधन नहीं थे, लेकिन उन्होंने बुनियादी किताबों और निरंतर अभ्यास पर भरोसा किया। उन्होंने सिलेबस को गहराई से समझा और बार-बार दोहराव को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया। यह साबित करता है कि यूपीएससी में सफलता के लिए महंगे संसाधनों से ज्यादा जरूरी है सही दिशा में लगातार मेहनत करना। आज के दौर में जब अभ्यर्थी कोचिंग के पीछे भागते हैं, श्रीधन्या की कहानी बताती है कि खुद की मेहनत सबसे बड़ा हथियार है।

असफलता को सीख में बदलना

दो बार की असफलता के बाद भी श्रीधन्या ने अपनी गलतियों का ईमानदारी से विश्लेषण किया और तीसरे प्रयास में उन्हें सुधारा। उन्होंने हार को अपनी पहचान नहीं बनने दिया, बल्कि उसे तैयारी का हिस्सा माना। हर टॉपर और सफल अभ्यर्थी की कहानी में यह बात समान है कि जो लोग असफलता से सीखते हैं, वही आगे बढ़ते हैं। श्रीधन्या ने यही किया और 2018 की परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक 410 हासिल कर केरल की पहली आदिवासी महिला आईएएस अधिकारी बन गईं।

अपनी जड़ों से जुड़ाव

सिविल सेवा में आने के बाद भी श्रीधन्या अपने आदिवासी समुदाय से जुड़ी रहीं और उन्होंने अपने काम में हमेशा वंचित वर्गों के हित को प्राथमिकता दी। कोझिकोड में असिस्टेंट कलेक्टर, पेरिंतलमन्ना में सब-कलेक्टर, पंजीकरण विभाग और खाद्य सुरक्षा आयुक्त जैसे पदों पर काम करते हुए उन्होंने प्रशासन के हर पहलू को समझा। 2019 बैच की केरल कैडर की इस अधिकारी की सफलता पर मुख्यमंत्री पिनराई विजयन से लेकर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा तक ने बधाई दी थी।

सफलता का क्षण: बस्ती से कलेक्टर की कुर्सी तक

2018 में जब यूपीएससी का परिणाम आया और श्रीधन्या ने ऑल इंडिया रैंक 410 के साथ सफलता हासिल की, तो वायनाड की वह छोटी-सी आदिवासी बस्ती जश्न में डूब गई। केरल के इतिहास में यह पहली बार था जब किसी आदिवासी महिला ने सिविल सेवा परीक्षा पास की थी। उस दिन उस घर में भी रौशनी थी, जहां कभी बिजली तक नहीं पहुंची थी — और यह रौशनी सिर्फ बल्ब की नहीं, एक सपने के पूरे होने की थी।

और यह कहानी यहीं नहीं रुकी। सितंबर 2026 में केरल सरकार के बड़े प्रशासनिक फेरबदल में श्रीधन्या को कासरगोड का जिला कलेक्टर नियुक्त किया गया। 16 सितंबर को पदभार संभालते ही वे केरल की पहली आदिवासी महिला बन गईं, जो किसी जिले की कमान संभाल रही हैं। पदभार के बाद उन्होंने कहा कि कासरगोड में पर्यटन, कृषि और उद्योग की बड़ी संभावनाएं हैं और वे जिले की चुनौतियों को दूर करने के लिए सभी के सहयोग से काम करेंगी।

युवाओं के लिए संदेश

श्रीधन्या सुरेश की कहानी हर उस युवा के लिए एक संदेश है, जो गरीबी या संसाधनों की कमी को अपनी मंजिल की बाधा मानता है। उन्होंने साबित किया है कि हालात कितने भी कठिन हों, अगर इरादे मजबूत हों और मेहनत में निरंतरता हो, तो कोई भी सपना दूर नहीं रहता। दो बार की असफलता, बाढ़ में किताबों का बह जाना और इंटरव्यू के लिए उधार का पैसा — इन सबके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। यही उनकी सबसे बड़ी सीख है।

खासकर आदिवासी और वंचित समुदायों के युवाओं के लिए श्रीधन्या एक जीवंत प्रेरणा हैं। वे दिखाती हैं कि शिक्षा ही वह सीढ़ी है, जो सबसे गहरी खाई से भी बाहर निकाल सकती है। उनके जीवन का हर अध्याय यही कहता है कि अपने सपनों पर भरोसा रखो, मेहनत से कभी मुंह न मोड़ो और जब मौका मिले, तो उसे दोनों हाथों से पकड़ लो।

निष्कर्ष

पोझुथाना की आदिवासी बस्ती से कासरगोड के कलेक्टर कार्यालय तक का श्रीधन्या सुरेश का सफर इस बात का प्रमाण है कि प्रतिभा किसी पते की मोहताज नहीं होती। उन्होंने न सिर्फ अपने परिवार और समुदाय का नाम रौशन किया, बल्कि पूरे देश के सामने यह साबित किया कि सही मार्गदर्शन, अटूट मेहनत और अपनों के भरोसे से हर मंजिल पाई जा सकती है। अगर आप भी सिविल सेवा का सपना देखते हैं, तो सबसे पहले UPSC Eligibility Calculator से अपनी पात्रता जांच लें और फिर पूरी लगन के साथ तैयारी में जुट जाएं — क्योंकि अगली प्रेरणादायक कहानी शायद आपकी ही हो।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *