Sports Success Story: अखाड़े की मिट्टी से ओलंपिक के अखाड़े तक, दंगल गर्ल की जंग – गीता फोगाट की प्रेरणादायक कहानी
साल 2016 में आमिर खान की फिल्म ‘दंगल’ ने करोड़ों दिल जीते, लेकिन उस फिल्म की असली हीरोइन गीता फोगाट की कहानी फिल्म से भी बड़ी और असली है। हरियाणा के गाँव बलाली की गीता ने मिट्टी के अखाड़े से चलकर देश की पहली महिला ओलंपिक पहलवान बनने तक का सफर तय किया। जहाँ गाँव की लड़कियाँ घर की चारदीवारी से बाहर निकलने से डरती थीं, वहाँ गीता ने लड़कों के साथ दंगल लड़ा और साबित किया कि बेटियाँ किसी से कम नहीं होतीं।
मिट्टी के अखाड़े में बिता बचपन
गीता फोगाट का जन्म 15 दिसंबर 1988 को हरियाणा के भिवानी जिले (अब चरखी दादरी) के गाँव बलाली में हुआ, और उनके पिता महावीर सिंह फोगाट खुद पहलवान थे। गाँव में कुश्ती की कोई आधुनिक सुविधा नहीं थी, इसलिए महावीर ने घर के पास पशुओं के बाड़े से लगे घेरे में ही मिट्टी का अखाड़ा बना दिया। दस साल की उम्र में गीता ने कुश्ती शुरू की, बारह की होते-होते गाँव के लड़कों को पटखनी देने लगीं, और बाद में सोनीपत के भारतीय खेल प्राधिकरण केंद्र में उन्हें पहली बार व्यवस्थित प्रशिक्षण और बेहतर आहार मिला।
पिता का जुनूनी फैसला
उस दौर में हरियाणा में लड़कियों का कुश्ती लड़ना रिवाज तोड़ने जैसा था, इसलिए महावीर ने बेटियों के बाल कटवाए, उन्हें लड़कों जैसे कपड़े पहनाए और गाँव के लड़कों के साथ ही दंगल में उतार दिया। गाँव वाले तंज कसते कि वह बेटियों को बिगाड़ रहे हैं और रिश्तेदारों ने भी मुँह मोड़ लिया, लेकिन महावीर हर शाम बेटियों से यही कहते कि दुनिया की बातों पर कान मत दो, सिर्फ अपने दांव पर ध्यान दो। उन्होंने बेटियों के प्रशिक्षण को ही अपनी जिंदगी का मिशन बना लिया और अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा उनके खाने-पीने और तैयारी पर लगा दिया।
गरीबी और तानों से बड़ी लड़ाई
गीता की सबसे बड़ी लड़ाई अखाड़े के बाहर लड़ी गई, क्योंकि एक साधारण किसान परिवार के लिए बेटियों को पहलवान बनाना आसान नहीं था। गाँव के ताने और अजीब नज़रें कई बार उनके हौसले तोड़ने की कगार पर ले आती थीं। फिर भी किशोरावस्था में ही गीता ने राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाना शुरू कर दिया और 2003, 2004 और 2005 में लगातार तीन बार एशियन कैडेट चैंपियनशिप में पदक जीते, जिनसे हर जीत के साथ ताने कम होते गए।
सफलता की रणनीति
गीता की सफलता किस्मत का खेल नहीं, बल्कि वर्षों की कठोर तपस्या और सोची-समझी रणनीति का नतीजा थी। पिता महावीर सिंह ने बेटी के खेल को वैज्ञानिक तरीके से गढ़ा और गीता ने इस अनुशासन को अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लिया। सुबह की कसरत से लेकर रात के विश्लेषण तक हर दिन का तय कार्यक्रम था और उसमें कोई ढील बर्दाश्त नहीं होती थी।
सुबह चार बजे की तपस्या
गीता की दिनचर्या सुबह चार बजे शुरू होती थी, जब पूरा गाँव सो रहा होता था। पिता के साथ कई किलोमीटर की दौड़, फिर अखाड़े में दो-तीन घंटे कुश्ती का अभ्यास और शाम को वज़न प्रशिक्षण, और गर्मी हो या सर्दी, यह कार्यक्रम कभी नहीं रुका। शरीर में इतना दर्द होता था कि कई बार रोना आता था, लेकिन पिता कहते थे कि चैंपियन बनने के लिए दर्द से दोस्ती करनी पड़ती है।
दांव-पेंच की बारीक समझ
महावीर सिंह ने गीता को सिर्फ ताकत का नहीं, बल्कि दिमाग का खिलाड़ी बनाया। हर मुकाबले से पहले विरोधी के खेल का विश्लेषण होता, उसकी कमजोरियाँ नोट की जातीं और उसी हिसाब से दांव तय किए जाते। बाद में पटियाला के नेताजी सुभाष राष्ट्रीय खेल संस्थान में मुख्य कोच ओ.पी. यादव और विदेशी विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में उनकी तकनीक और निखरी, जिसने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर का पहलवान बना दिया।
मानसिक मज़बूती और धैर्य
कुश्ती में जीत का खेल मानसिक भी उतना ही है, जितना शारीरिक। गीता ने कई बड़े मुकाबले हारे और कई बार चोटें आईं, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। पिता की सीख थी कि एक हार से पहलवान खत्म नहीं होता, और लंदन ओलंपिक में पहले ही मुकाबले की हार के बाद भी गीता ने अगले टूर्नामेंटों में पदक जीतकर यह साबित कर दिखाया।
दिल्ली के अखाड़े से लंदन के ओलंपिक तक
2009 में गीता ने जालंधर में हुई कॉमनवेल्थ कुश्ती चैंपियनशिप में 55 किलोग्राम वर्ग में स्वर्ण जीता। फिर 2010 में दिल्ली कॉमनवेल्थ खेलों के फाइनल में उन्होंने ऑस्ट्रेलिया की एमिली बेंस्टेड को 1-0 और 7-0 से हराकर स्वर्ण अपने नाम किया, जो महिला कुश्ती में भारत का पहला कॉमनवेल्थ खेल स्वर्ण था। 2012 में उन्होंने कजाकिस्तान के अल्माटी में एशियाई ओलंपिक क्वालिफिकेशन में स्वर्ण जीतकर लंदन ओलंपिक के लिए क्वालिफाई किया और ओलंपिक तक पहुँचने वाली भारत की पहली महिला पहलवान बन गईं, और इसी साल उन्हें अर्जुन पुरस्कार व विश्व कुश्ती चैंपियनशिप का कांस्य पदक भी मिला।
युवाओं के नाम गीता का संदेश
गीता का संदेश खास तौर पर देश की बेटियों के लिए है कि समाज क्या कहेगा, यह सोचकर अपने सपनों को कभी मत मारो। खेल का मैदान लिंग नहीं देखता, वह सिर्फ मेहनत और जुनून देखता है। गरीब परिवारों के बच्चों के लिए भी सीख है कि सुविधाओं की कमी को बहाना मत बनाओ, क्योंकि गीता की शुरुआत पशुओं के बाड़े के पास बने मिट्टी के अखाड़े से हुई थी।
निष्कर्ष
आज फोगाट परिवार भारतीय कुश्ती का ब्रांड बन चुका है, क्योंकि बहन बबिता कुमारी और चचेरी बहन विनेश फोगाट भी कॉमनवेल्थ खेलों की स्वर्ण विजेता हैं और बहनें ऋतु व संगीता भी अंतरराष्ट्रीय स्तर की पहलवान हैं। 20 नवंबर 2016 को गीता ने पहलवान पवन कुमार से शादी की और बलाली गाँव का वह मिट्टी का अखाड़ा अब प्रेरणा का तीर्थ बन गया है। गीता फोगाट की कहानी सिखाती है कि मेहनत और विश्वास से हर दीवार तोड़ी जा सकती है, और सपने देखने वालों की कभी हार नहीं होती।