Kisan Success Story: साइकिल पर निकले किसान ने लगा दिए एक करोड़ पेड़, मिला पद्म श्री – दारीपल्ली रामैया की प्रेरणादायक कहानी

Kisan Success Story: साइकिल पर निकले किसान ने लगा दिए एक करोड़ पेड़, मिला पद्म श्री – दारीपल्ली रामैया की प्रेरणादायक कहानी

तेलंगाना के खम्मम जिले के छोटे से गांव रेड्डिपल्ली में एक ऐसा किसान रहता था, जिसके पास न बड़ी जमीन थी, न ऊंची डिग्री और न ही जेब में पैसा। था तो बस एक पुरानी एटलस साइकिल, एक टोकरी भर पौधे, कंधे पर फावड़ा और जेब में मुट्ठी भर बीज। नाम था दारीपल्ली रामैया। लोग उन्हें प्यार से ‘चेतला रामैया’ यानी पेड़ों वाले रामैया और ‘वनजीवी’ कहकर पुकारते थे। पांच दशकों तक यह साधारण किसान हर सुबह साइकिल पर निकलता रहा और जहां भी बंजर जमीन मिली, वहां पौधा लगा आया। इस तपस्या का नतीजा यह हुआ कि उनके जीवनकाल में करीब एक करोड़ पौधे खम्मम और आसपास के इलाकों में पनपे। वर्ष 2017 में भारत सरकार ने उन्हें इस असाधारण योगदान के लिए पद्म श्री से सम्मानित किया।

बचपन और साधारण सी शुरुआत

रामैया का जन्म 1 जुलाई 1937 को रेड्डिपल्ली गांव में हुआ था, जब आजादी की लड़ाई अपने चरम पर थी और देश गुलामी की जंजीरों से मुक्त होने के लिए जद्दोजहद कर रहा था। बचपन से ही वे खेत-खलिहानों और पेड़ों के बीच पले-बढ़े। परिवार की आर्थिक हालत ऐसी थी कि पढ़ाई दसवीं कक्षा तक ही हो पाई, लेकिन प्रकृति की पाठशाला से उन्होंने जो सीखा, वह किसी किताब में नहीं लिखा था। बचपन में वे सड़कों के किनारे गिरे हुए बीज इकट्ठा करके अपने खेतों के आसपास बो दिया करते थे। कहते हैं कि जब रामैया किशोरावस्था में थे, तभी उन्होंने ठान लिया था कि जिंदगी का मकसद सिर्फ खुद के लिए कमाना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए छाया, फल और हरियाली छोड़ना है।

वह फैसला जो जिंदगी का मकसद बन गया

रामैया एक आम किसान की तरह खेती करते थे, लेकिन उनका मन हमेशा पेड़ों की ओर खिंचा रहता था। वे अक्सर देखते थे कि गांव के आसपास की जमीन बंजर पड़ी है, पेड़ कटते जा रहे हैं और बारिश कम होती जा रही है। एक दिन उन्होंने तय कर लिया कि अब से हर दिन कम से कम कुछ पौधे जरूर लगाएंगे। यह फैसला न तो किसी योजना का हिस्सा था और न ही किसी ने उन्हें प्रेरित किया था — यह उनके दिल की आवाज थी। धीरे-धीरे यही आदत उनकी जिंदगी का मकसद बन गई। वे रोज सुबह दो केन पानी, एक फावड़ा और टोकरी भर पौधे लेकर साइकिल पर निकल पड़ते और जहां भी खाली जमीन दिखती, वहां गड्ढा खोदकर पौधा लगा आते। पत्नी जनकम्मा भी इस मिशन में उनके साथ खड़ी रहीं और अक्सर उनके साथ पौधे लगाने जाती थीं।

मुश्किलें और संघर्ष

जिस राह पर रामैया चल पड़े थे, वह आसान नहीं थी। लोगों ने शुरुआत में उन्हें अजीब नज़रों से देखा — कोई कहता यह पागलपन है, तो कोई हंसता कि एक किसान पेड़ लगाकर क्या कमा लेगा। लेकिन सबसे बड़ी मुश्किल आर्थिक थी। पौधे खरीदने और साइकिल से दूर-दूर तक जाने में पैसा लगता था, जो उनके पास था नहीं। रामैया ने इस मिशन को जिंदा रखने के लिए अपनी तीन एकड़ जमीन तक बेच दी। गरीबी और उपहास के बावजूद वे रोज सुबह वैसे ही साइकिल पर निकलते जैसे सूरज रोज उगता है। गर्मी, बारिश और बुढ़ापे की थकान — कोई भी चीज उनके रोज के काम में रुकावट नहीं बन पाई। उनके पास किताबें नहीं थीं, लेकिन उन्होंने पौधों पर सैकड़ों किताबें पढ़ीं और बिना किसी डिग्री के खुद को पौधों का चलता-फिरता ज्ञानकोष बना लिया।

सफलता की रणनीति

रामैया की सफलता किसी किस्मत का खेल नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी और सरल रणनीति का नतीजा थी। उन्होंने हर कदम बहुत सादगी और दूरदर्शिता से उठाया, जिसके कुछ अहम पहलू इस प्रकार हैं।

1. बंजर जमीन को चुना, उपजाऊ को नहीं

रामैया किसी की उपजाऊ खेती वाली जमीन पर पौधे नहीं लगाते थे। वे खासतौर पर बंजर, परती और बेकार पड़ी जमीन चुनते थे, ताकि न तो किसी किसान का नुकसान हो और न ही खाद्यान्न उत्पादन पर असर पड़े। उनकी सोच थी कि जो जमीन कुछ नहीं दे रही, उसे हरा-भरा बनाकर वह आने वाली पीढ़ियों के काम आ सकती है। इसी सोच से उन्होंने अपने इलाके में कई बंजर टुकड़ों को फलदार बगीचों और छायादार बगीचों में बदल दिया।

2. देसी प्रजातियों पर जोर

रामैया हमेशा देशी और स्थानीय प्रजातियों के पेड़ लगाते थे, क्योंकि उनका मानना था कि यही पेड़ मिट्टी, जलवायु और पक्षियों के लिए सबसे उपयुक्त हैं। छायादार पेड़, फलदार पौधे और बायोडीजल वाले पौधों को उन्होंने प्राथमिकता दी, ताकि भविष्य की पीढ़ियों को छाया के साथ-साथ फल और ईंधन का भी लाभ मिले। यही समझदारी थी जिसने उनके लगाए पौधों को लंबे समय तक जीवित रखा और इलाके की जैव विविधता को समृद्ध किया।

3. गर्दन पर तख्ती लगाकर जागरूकता

रामैया सिर्फ पौधे ही नहीं लगाते थे, वे लोगों को पेड़ लगाने के लिए प्रेरित भी करते थे। वे अपनी गर्दन पर हरे रंग की एक तख्ती टांगे घूमते थे, जिस पर लिखा होता था — ‘वृक्षो रक्षति रक्षितः’, यानी पेड़ बचाओ, पेड़ तुम्हें बचाएगा। साइकिल पर सवार, तख्ती लगाए यह किसान जहां भी जाता, लोग रुककर पूछते और पर्यावरण की बात सुनते। बाद में वे तेलंगाना सरकार के ‘हरिता हारम’ अभियान के प्रचार के लिए हैदराबाद और राज्य के दूर-दराज के इलाकों तक गए।

4. रोज की निरंतरता, उम्र भर की तपस्या

रामैया की सबसे बड़ी ताकत थी निरंतरता। उन्होंने पचास साल से भी ज्यादा समय तक लगभग हर दिन पौधे लगाए। न कोई सरकारी नौकरी, न फंडिंग और न ही टीम — सिर्फ एक व्यक्ति, एक साइकिल और एक जुनून। यही रोजमर्रा की छोटी-छोटी कोशिशें मिलकर एक करोड़ पौधों के विशाल जंगल में बदल गईं, जिसकी कल्पना कोई सरकार भी शायद इतने कम खर्च में न कर पाए।

वह पल जब देश ने सलाम किया

दशकों की तपस्या के बाद आखिरकार वह दिन आया, जब देश ने इस सादे किसान को पहचान दी। 2017 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रपति भवन में उन्हें पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया। पुरस्कार मिलने से पहले भी रामैया को सेवा पुरस्कार (1995), वनमित्र पुरस्कार (2005) और राष्ट्रीय नवाचार एवं उत्कृष्ट पारंपरिक ज्ञान पुरस्कार (2015) मिल चुके थे। तेलंगाना सरकार ने उनकी कहानी को स्कूली पाठ्यक्रम में भी शामिल किया, ताकि बच्चे उनसे प्रेरणा ले सकें। दुर्भाग्य से 12 अप्रैल 2025 को 87 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया, लेकिन वे अपने पीछे एक करोड़ पेड़ों की ऐसी विरासत छोड़ गए, जो सदियों तक लोगों को छाया और फल देती रहेगी।

युवाओं के लिए संदेश

दारीपल्ली रामैया की जिंदगी युवाओं को यह सिखाती है कि बड़ा काम करने के लिए बड़ी डिग्री, बड़ा पैसा या बड़ा पद जरूरी नहीं होता — जरूरी होती है साफ नीयत और रोज की मेहनत। वे दसवीं तक पढ़े थे, लेकिन पौधों के बारे में उनका ज्ञान किसी प्रोफेसर से कम नहीं था। उन्होंने दिखाया कि अगर लक्ष्य नेक हो, तो गरीबी भी रुकावट नहीं बनती। आज जब हम पर्यावरण संकट, घटते पेड़ और बढ़ते तापमान की शिकायत करते हैं, तो रामैया का जीवन हमें आईना दिखाता है — एक अकेला इंसान भी एक करोड़ पेड़ लगा सकता है, तो हम सब मिलकर क्या नहीं कर सकते। युवा पीढ़ी को उनसे यह प्रेरणा लेनी चाहिए कि अपने गांव, अपने शहर और अपनी धरती के लिए कुछ करना कभी व्यर्थ नहीं जाता।

निष्कर्ष

दारीपल्ली रामैया की कहानी एक किसान की कहानी से कहीं बड़ी है — यह एक ऐसे इंसान की कहानी है, जिसने प्रकृति को अपनी मां माना और उम्र भर उसकी सेवा की। न उन्होंने कभी दान मांगा, न प्रचार चाहा, न ही किसी पद की उम्मीद रखी। बस हर सुबह साइकिल निकाली और पौधे लगाते चले गए। आज खम्मम के हजारों पेड़ उनकी मेहनत की गवाही देते हैं और ‘वृक्षो रक्षति रक्षितः’ का उनका संदेश हर उस व्यक्ति के दिल में गूंजता है, जो धरती को बचाना चाहता है। सच ही कहा गया है — कुछ लोग इतिहास पढ़ते हैं, और कुछ लोग इतिहास रचते हैं। दारीपल्ली रामैया ने अपने एक करोड़ पेड़ों से ऐसा इतिहास रचा, जो आने वाली पीढ़ियां सदियों तक याद रखेंगी।

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