UPSC Success Story: परीक्षा के दिन हादसे के बाद भी न टूटा हौसला, अंडे की ठेली से IPS की वर्दी तक – सफीन हसन की प्रेरणादायक कहानी
गुजरात के पालनपुर जिले के छोटे से गांव कानोदर में शाम ढलते ही एक ठेली लगती थी, जिस पर उबले अंडे बिकते थे। उसी गांव के एक साधारण घर में रहने वाले लड़के के घर में कई बार दो वक्त की रोटी का हिसाब भी बड़ी मुश्किल से बनता था, लेकिन उस लड़के की आंखों में कुछ बनने का सपना इतना बड़ा था कि गरीबी उसे छू भी नहीं पाई। नाम है सफीन हसन — जिन्होंने महज 22 साल की उम्र में UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2018 में 570वीं रैंक हासिल कर देश के सबसे कम उम्र के IPS अधिकारियों में अपना नाम दर्ज करा लिया। उनकी कहानी सिर्फ सफलता की नहीं, बल्कि उस हिम्मत की है जिसने परीक्षा वाले दिन हुए भयानक हादसे के बाद भी उन्हें पेपर छोड़ने की इजाज़त नहीं दी।
गरीबी में पला बचपन, मां-बाप की अथक मेहनत
सफीन हसन का जन्म 21 जुलाई 1995 को गुजरात के पालनपुर में हुआ। उनके पिता मुस्तफा हसन और मां नसीम बानो दोनों ही हीरा उद्योग में काम करते थे, लेकिन साल 2000 के आसपास आर्थिक मंदी ने उनकी नौकरियां छीन लीं। घर चलाने और बेटे की पढ़ाई जारी रखने के लिए मां दूसरों के घरों में खाना बनाने लगीं और पिता दिन में मजदूरी करने के साथ-साथ रात को भी काम करते थे। शाम को पूरा परिवार एक छोटी सी ठेली पर उबले अंडे बेचकर दो-चार रुपये और जोड़ता था। सफीन ने बाद में कई मौकों पर बताया कि मां-बाप के थके हुए हाथ और उनकी मेहनत ही उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा बनी।
सफीन की शुरुआती पढ़ाई कानोदर गांव के ही एक स्कूल में हुई, जहां उनकी प्रतिभा जल्दी ही सामने आ गई। दसवीं तक मां ने खुद उन्हें पढ़ाया, और घर की हालत इतनी खराब थी कि स्कूल ने 11वीं और 12वीं की फीस माफ कर दी ताकि होनहार बच्चा पढ़ाई न छोड़े। इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला मिला तो रिश्तेदारों ने मिलकर फीस का इंतज़ाम किया। यानी सफीन की पढ़ाई का हर कदम किसी न किसी के सहयोग और त्याग की कहानी कहता है — और शायद यही वजह है कि उन्होंने कभी हार मानना सीखा ही नहीं।
इंजीनियरिंग की कक्षाओं से UPSC के सपने तक
कॉलेज के दिनों में ही सफीन के मन में देश की सेवा करने का जज्बा पनपने लगा। एक मजदूर के बेटे के लिए UPSC की परीक्षा आसान रास्ता नहीं थी — न महंगी कोचिंग का पैसा था, न दिल्ली जाकर तैयारी करने की सुविधा। लेकिन सफीन ने ठान लिया कि वे खुद से पढ़कर इस परीक्षा को पास करेंगे। उन्होंने अपने दिन को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटा, हर विषय के लिए समय तय किया और अखबार पढ़ने को रोज़ की आदत बना लिया। कहते हैं कि जब इरादा पक्का होता है, तो साधन खुद रास्ता बना लेते हैं — सफीन के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
उनके साथी बताते हैं कि सफीन तैयारी के दिनों में घंटों लाइब्रेरी में बैठते और नोट्स खुद बनाते थे। उन्होंने कभी किसी टॉपर की नकल नहीं की, बल्कि अपनी गति और अपनी समझ के हिसाब से रणनीति तैयार की। गरीबी ने उन्हें एक बात ज़रूर सिखाई थी — समय की कीमत। इसलिए उन्होंने तैयारी के एक-एक दिन को गिना और किसी भी दिन को बर्बाद नहीं होने दिया। यही अनुशासन आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत साबित हुआ।
परीक्षा के दिन हुआ वो भयानक हादसा
साल 2017 में जब सफीन UPSC की परीक्षा देने जा रहे थे, रास्ते में एक गंभीर सड़क हादसा हो गया और वे बुरी तरह घायल हो गए। किसी और के लिए यह पल पूरी तैयारी को खत्म कर देने वाला होता, लेकिन सफीन ने हादसे के बाद भी परीक्षा हॉल जाने का फैसला किया। घायल हालत में उन्होंने पेपर लिखा — बाद में एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि उन्हें बस इस बात की खुशी थी कि उनका दायाँ हाथ सही सलामत था और वे लिख सकते थे। परीक्षा के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा, कई ऑपरेशन हुए और लंबे समय तक फिज़ियोथेरेपी चली।
यह हादसा उनकी जिंदगी का सबसे कठिन इम्तिहान था, लेकिन उन्होंने इसे अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत बना लिया। ऑपरेशन के बाद बिस्तर पर लेटे-लेटे भी वे किताबों से जुड़े रहे और ठीक होते ही दोबारा पूरी ताकत से तैयारी में जुट गए। जो लोग उस वक्त उनके साथ थे, वे कहते हैं कि सफीन के चेहरे पर कभी शिकन नहीं आई — न दर्द की, न हार की। शायद UPSC की असली परीक्षा उसी दिन हो गई थी, और सफीन उसमें पहले ही पास हो चुके थे।
सफलता की रणनीति
1. अनुशासन और नियमितता
सफीन की तैयारी का पहला नियम था — रोज़ पढ़ना, चाहे कितना भी कम क्यों न हो। उन्होंने हफ्ते का टाइम-टेबल बनाया और हर विषय को तय समय दिया, जिसमें करंट अफेयर्स के लिए अखबार और नोट्स दोनों शामिल थे। वे मानते थे कि दस घंटे की एक दिन की पढ़ाई से बेहतर है रोज़ के छह घंटे की नियमित पढ़ाई। यही निरंतरता उन्हें भीड़ से अलग करती गई और धीरे-धीरे सिलेबस उनके काबू में आने लगा।
2. सीमित किताबें, गहरी समझ
महंगी कोचिंग और दर्जनों किताबें खरीदने की उनकी हैसियत नहीं थी, इसलिए उन्होंने चुनिंदा किताबों को ही बार-बार पढ़ने की रणनीति अपनाई। हर विषय की एक स्टैंडर्ड किताब, उसके खुद के बनाए नोट्स और पिछले वर्षों के प्रश्नपत्र — बस इतना ही उनका हथियार था। वे कहते थे कि एक किताब को पांच बार पढ़ना, पांच किताबों को एक बार पढ़ने से कहीं बेहतर है। इस गहरी समझ ने उन्हें मेन्स के उत्तर लेखन में भी बड़ी मदद की।
3. आंसर राइटिंग और रिवीजन की आदत
सफीन ने तैयारी के शुरुआती दिनों से ही उत्तर लिखने का अभ्यास शुरू कर दिया था, क्योंकि वे जानते थे कि UPSC में सिर्फ ज्ञान नहीं, उसे कागज़ पर उतारने की कला भी जांची जाती है। वे रोज़ एक-दो उत्तर लिखते और खुद ही उनका मूल्यांकन करते, गलतियों को नोट करके दोबारा नहीं दोहराते। रिवीजन के लिए उन्होंने छोटे-छोटे चार्ट और सूत्र-नोट्स बनाए, जिन्हें परीक्षा से पहले के दिनों में बार-बार दोहराया। यही आदत प्रीलिम्स और मेन्स — दोनों चरणों में उनके काम आई।
4. हार न मानने का जज्बा
हादसे के बाद की लंबी बीमारी और ऑपरेशनों का दौर ऐसा था जो किसी भी अभ्यर्थी का हौसला तोड़ देता, लेकिन सफीन ने इसे अपनी कहानी का सबसे मजबूत अध्याय बना लिया। वे अक्सर कहते हैं कि मुश्किलें हर किसी की जिंदगी में आती हैं, फर्क सिर्फ इतना है कि कोई उनके सामने झुक जाता है और कोई उन्हें सीढ़ी बना लेता है। उनके लिए मां-बाप के थके हाथ और ठेली पर बीतती शामें हमेशा याद दिलाती थीं कि यह लड़ाई सिर्फ उनकी नहीं, पूरे परिवार की है। इसी सोच ने उन्हें 2018 की परीक्षा में दोबारा पूरे जोश के साथ उतरने की ताकत दी।
वो पल जब मेरिट लिस्ट में नाम आया
साल 2018 में जब UPSC सिविल सेवा परीक्षा का परिणाम आया, तो 570वीं रैंक के साथ सफीन हसन का नाम मेरिट लिस्ट में था। 22 साल की उम्र में यह उपलब्धि हासिल करके वे देश के सबसे कम उम्र के IPS अधिकारियों में गिने जाने लगे। 23 दिसंबर 2019 को उन्होंने गुजरात के जामनगर में असिस्टेंट सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस के रूप में कार्यभार संभाला — वही लड़का जिसके घर में कभी फीस के पैसे नहीं होते थे, अब कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी संभाल रहा था। बाद में वे अहमदाबाद में डीसीपी (ट्रैफिक) बने और अगस्त 2025 में उन्हें महीसागर जिले का पुलिस अधीक्षक (एसपी) नियुक्त किया गया।
युवाओं के नाम सफीन का संदेश
सफीन हसन आज भी युवाओं से यही कहते हैं कि गरीबी कोई शर्म की बात नहीं, बल्कि सबसे बड़ी गुरु है — यह आपको समय, मेहनत और धैर्य की कीमत सिखाती है। उनका मानना है कि UPSC की तैयारी में महंगी कोचिंग से ज्यादा जरूरी है सही दिशा, नियमितता और खुद पर भरोसा। वे अक्सर छात्रों को याद दिलाते हैं कि हादसे वाले दिन भी उन्होंने पेपर इसलिए नहीं छोड़ा क्योंकि उनके पास खोने को कुछ नहीं था, पर पाने को सब कुछ था। यही सोच हर उस युवा के काम आ सकती है जो हालातों से हार मानने की कगार पर है।
निष्कर्ष
अंडे की ठेली से IPS की वर्दी तक का सफीन हसन का सफर इस बात का जीवंत सबूत है कि मंज़िल उन्हीं को मिलती है जो रुकना नहीं जानते। गरीबी, हादसा, ऑपरेशन और लंबी बीमारी — हर मुश्किल ने उन्हें तोड़ने की कोशिश की, लेकिन हर बार वे और मजबूत होकर उठे। अगर आप भी UPSC का सपना देख रहे हैं, तो सबसे पहला कदम है अपनी योग्यता जांचना — आप इसे UPSC Eligibility Calculator के ज़रिए आसानी से कर सकते हैं। सफीन की कहानी हर उस युवा के लिए एक सीख है: हालात चाहे जैसे भी हों, हौसला बड़ा हो तो रास्ता खुद बन जाता है।