UPSC Success Story: 13 साल अनाथालय में रहे, 10 साल की उम्र से मज़दूरी की – बी. अब्दुल नासर की प्रेरणादायक कहानी

UPSC Success Story: 13 साल अनाथालय में रहे, 10 साल की उम्र से मज़दूरी की – बी. अब्दुल नासर की प्रेरणादायक कहानी

कभी-कभी ज़िंदगी इतनी कठिन मोड़ पर खड़ी कर देती है कि बड़े-बड़े हिम्मत वाले भी टूट जाते हैं, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो हर मोड़ को अपने हौसले से सीधा कर देते हैं। केरल के थलास्सेरी के बी. अब्दुल नासर की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। सिर्फ 5 साल की उम्र में पिता का साया सिर से उठ गया, घर की हालत इतनी खराब हो गई कि 13 साल तक एक अनाथालय में रहना पड़ा, और सिर्फ 10 साल की उम्र में होटलों में बर्तन मांजने और सफाई करने का काम करना पड़ा। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। बिना सीधे UPSC परीक्षा दिए, केरल राज्य सिविल सेवा के रास्ते से वे पहले डिप्टी कलेक्टर बने, केरल के सर्वश्रेष्ठ डिप्टी कलेक्टर का सम्मान पाया, और फिर 2017 में IAS अधिकारी के पद पर पदोन्नत हुए। यह कहानी हर उस युवा के लिए है जो गरीबी और हालात को अपनी किस्मत मान बैठा है।

बचपन: जब 5 साल की उम्र में छूटा पिता का साथ

बी. अब्दुल नासर का जन्म केरल के कन्नूर ज़िले के थलास्सेरी में एक बेहद गरीब परिवार में हुआ था। वे अभी सिर्फ 5 साल के थे जब उनके पिता का निधन हो गया। पिता के जाने के बाद पूरे घर की जिम्मेदारी उनकी मां मन्हुम्मा के कंधों पर आ गई, जो घरों में काम करके अपने छह बच्चों का पालन-पोषण करने की कोशिश कर रही थीं। लेकिन एक अकेली महिला के लिए इतने बड़े परिवार को रोटी-कपड़ा देना लगभग नामुमकिन था। घर में रोज़ खाने के लाले पड़ने लगे, और हालात दिन-ब-दिन बदतर होते गए। आखिरकार रिश्तेदारों की सलाह पर अब्दुल और उनके भाई-बहनों को थलास्सेरी के दारुस्सलाम अनाथालय में भेज दिया गया। मां के लिए यह फैसला जितना दर्दनाक था, उतना ही मजबूरी भरा भी था, क्योंकि उनके पास बच्चों को खिलाने का कोई और रास्ता नहीं बचा था।

अनाथालय के 13 साल: मां की याद और पढ़ाई का संकल्प

अनाथालय में अब्दुल ने कुल 13 साल बिताए। इन वर्षों में अनाथालय ने उन्हें वो सब दिया जो गरीबी ने छीन लिया था — रहने की छत, पेट भर खाना और पढ़ने का मौका। लेकिन मां और भाई-बहनों की याद उन्हें इतना सताती थी कि कई बार वे अनाथालय से भाग भी जाते थे। फिर मां की चिंता का ख्याल आते ही वापस लौट आते थे, क्योंकि वे जानते थे कि उनकी इस हरकत से मां और ज़्यादा दुखी होगी। इन्हीं 13 सालों में अब्दुल ने अपनी पढ़ाई जारी रखी और खुद को कभी हालात के हवाले नहीं किया। दसवीं कक्षा पूरी करने के बाद वे वातानापल्ली अनाथालय चले गए, जहां से उन्होंने बारहवीं की पढ़ाई पूरी की। इस दौरान पढ़ाई के साथ-साथ काम करना भी जारी रहा, क्योंकि परिवार की मदद करना वे अपनी जिम्मेदारी समझते थे।

वो एक मुलाकात जिसने सपनों को नई दिशा दी

अब्दुल सिर्फ 10 साल के थे जब उन्होंने काम करना शुरू कर दिया था। केरल के होटलों में वे बर्तन धोते, सफाई करते और सप्लाई का काम करते थे। इसके अलावा अखबार बांटना, बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना और टेलीफोन ऑपरेटर का काम — जो भी छोटा-मोटा काम मिलता, वे उसे पूरी ईमानदारी से करते। लेकिन एक दिन एक मुलाकात ने उनके सपनों का आकार ही बदल दिया। युवा IAS अधिकारी अमिताभ कांत उनके स्कूल आए थे, जो उस समय सब-कलेक्टर के पद पर तैनात थे। उन्हें देखकर नन्हे अब्दुल के मन में एक बड़ा सपना जन्मा — एक दिन वे भी ज़िला कलेक्टर बनेंगे। यह सपना उनके दिल में इतनी गहराई से बैठ गया कि बाद के दशकों तक की हर मेहनत इसी सपने की रोशनी में होती रही।

संघर्ष की लंबी राह: नौकरी के साथ पढ़ाई

अनाथालय से निकलने के बाद अब्दुल ने थलास्सेरी के सरकारी कॉलेज से स्नातक की डिग्री हासिल की, फिर कोझिकोड के फारूक कॉलेज से परास्नातक और बी.एड की पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई के इन वर्षों में काम का सिलसिला कभी नहीं रुका — अखबार बांटने से लेकर ट्यूशन पढ़ाने तक, हर काम को उन्होंने शर्म नहीं, सम्मान की नज़र से देखा। 1994 में परास्नातक पूरा करने के बाद उन्हें केरल के स्वास्थ्य विभाग में सरकारी नौकरी मिल गई। नौकरी लगने के बाद भी कलेक्टर बनने का बचपन का सपना उनके दिल में जिंदा था। नौकरी के साथ-साथ उन्होंने केरल राज्य सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी शुरू की। इस तैयारी में उनकी पत्नी रुक्साना का भी पूरा साथ मिला, जिनके सहयोग से उन्होंने छुट्टी लेकर परीक्षा पर ध्यान केंद्रित किया। 2002 में प्रीलिम्स और 2004 में मेन्स क्लियर करने के बाद 2006 में उन्होंने यह परीक्षा पास की और डिप्टी कलेक्टर बन गए।

सफलता की रणनीति: अब्दुल नासर के 3 बड़े सबक

1. काम को कभी छोटा मत समझो

अब्दुल ने 10 साल की उम्र से होटलों में बर्तन मांजे, अखबार बांटे और टेलीफोन ऑपरेटर बने, लेकिन किसी काम को कभी छोटा नहीं समझा। उनका मानना था कि ईमानदारी से किया गया हर काम इंसान को आगे बढ़ाता है। यही सोच उन्हें अनाथालय के उन दिनों में भी टूटने नहीं देती थी, जब दूसरे बच्चे हालात से हार मान लेते थे। मेहनत को शर्म की जगह सम्मान देना ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।

2. सपना बड़ा रखो, रास्ता चाहे जो हो

अब्दुल ने UPSC की सीधी परीक्षा नहीं दी, बल्कि केरल राज्य सिविल सेवा के रास्ते से IAS तक पहुंचे। यह सिखाता है कि मंज़िल एक हो सकती है, लेकिन रास्ते कई होते हैं। जरूरी यह नहीं कि आप किस रास्ते से चलें, जरूरी यह है कि आप रुकें नहीं। उन्होंने नौकरी करते हुए, शादीशुदा ज़िंदगी के साथ, सालों तक धीरे-धीरे लेकिन लगातार तैयारी की और आखिरकार मंज़िल पा ली।

3. पढ़ाई को कभी मत छोड़ो

13 साल अनाथालय में रहने, बचपन से काम करने और तमाम मुश्किलों के बावजूद अब्दुल ने पढ़ाई का दामन कभी नहीं छोड़ा। स्नातक, परास्नातक, बी.एड — हर डिग्री उन्होंने काम के साथ-साथ हासिल की। उनकी कहानी साबित करती है कि अगर पढ़ाई के प्रति लगन सच्ची हो, तो न गरीबी रोक सकती है, न हालात। शिक्षा ही वो सीढ़ी है जो अनाथालय के बच्चे को कलेक्टर की कुर्सी तक पहुंचा सकती है।

सफलता का पल: अनाथालय से कलेक्टर की कुर्सी तक

2006 में डिप्टी कलेक्टर बनने के बाद अब्दुल नासर ने अपने काम से ऐसी छाप छोड़ी कि 2015 में उन्हें केरल का सर्वश्रेष्ठ डिप्टी कलेक्टर चुना गया — यह सम्मान किसी भी डिप्टी कलेक्टर के लिए असाधारण माना जाता है। इसके बाद 2017 में उन्हें IAS अधिकारी के पद पर पदोन्नत किया गया, और 2019 में वे कोल्लम के ज़िला कलेक्टर बने। सोचिए, वही बच्चा जो कभी अनाथालय से मां की याद में भाग जाता था, आज उसी ज़िले का सबसे बड़ा प्रशासनिक अधिकारी है। केरल सरकार में हाउसिंग कमिश्नर जैसे अहम पदों पर भी वे काम कर चुके हैं। यह सिर्फ एक व्यक्ति की तरक्की नहीं, बल्कि इस बात का सबूत है कि मेहनत और लगन के आगे कोई भी मुश्किल बड़ी नहीं होती।

युवाओं के लिए संदेश

बी. अब्दुल नासर की कहानी हर उस युवा के लिए एक आईना है जो अपनी गरीबी या हालात को अपनी असफलता का बहाना बनाता है। न उनके पास पैसे थे, न मां-बाप का साथ, न कोई गॉडफादर — था तो सिर्फ एक सपना और उसे पूरा करने का जुनून। वे कहते हैं कि ज़िंदगी में कोई शॉर्टकट नहीं होता; अगर आप खुद पर भरोसा रखते हैं और मेहनत करने को तैयार हैं, तो कोई भी बाधा इतनी बड़ी नहीं कि आपको रोक सके। अनाथालय में रहने वाला बच्चा भी कलेक्टर बन सकता है, बस शर्त यह है कि आप रुकना न सीखें।

निष्कर्ष

बी. अब्दुल नासर का सफर — 5 साल की उम्र में पिता की मौत, 13 साल अनाथालय में, 10 साल की उम्र से मज़दूरी, और फिर डिप्टी कलेक्टर से IAS अधिकारी तक का सफर — यह साबित करता है कि हालात चाहे जैसे भी हों, सपनों की उड़ान को कोई नहीं रोक सकता। अगर आप भी प्रशासनिक सेवा का सपना देखते हैं, तो सबसे पहले अपनी उम्र और अटेम्प्ट की स्थिति UPSC Eligibility Calculator से ज़रूर जांच लें, और फिर पूरी लगन के साथ तैयारी में जुट जाएं। क्योंकि अब्दुल नासर की कहानी कहती है — शुरुआत चाहे जितनी छोटी हो, मंज़िल हमेशा बड़ी हो सकती है।

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