Sports Success Story: एक टांग पर आसमान छूने वाले पैरा हीरो – Mariyappan Thangavelu की प्रेरणादायक कहानी
खेलों की दुनिया में कई कहानियां दिल को छूती हैं, लेकिन कुछ कहानियां ऐसी होती हैं जो हिम्मत और हौसले की परिभाषा ही बदल देती हैं। तमिलनाडु के सलेम जिले के एक छोटे से गांव पेरियावडगम्पट्टी से निकलकर पैरालंपिक खेलों में तीन लगातार पदक जीतने वाले मरियप्पन थंगावेलु की कहानी ठीक ऐसी ही है। एक ऐसी दुर्घटना जिसने पांच साल के बच्चे का एक पैर हमेशा के लिए कमजोर कर दिया, उसी हादसे के बावजूद यह लड़का दुनिया की सबसे ऊंची छलांग लगाने वालों में गिना जाने लगा। यह कहानी गरीबी, दर्द और संघर्ष के बीच से निकले उस विश्वास की है, जिसने एक गांव के बच्चे को पैरालंपिक चैंपियन बना दिया।
गरीब परिवार और एक नन्हा बचपन
मरियप्पन थंगावेलु का जन्म 28 जून 1995 को तमिलनाडु के सलेम जिले के पेरियावडगम्पट्टी गांव में हुआ था। उनका परिवार बहुत गरीब था और घर में छह बच्चे थे — चार भाई और एक बहन। उनके पिता ने परिवार को जल्दी ही छोड़ दिया था, जिसके बाद उनकी मां सरोजा ने अकेले ही बच्चों को पाला। मां ने पहले ईंटें ढोने और मजदूरी का काम किया, फिर सब्जियां बेचना शुरू किया। कहा जाता है कि वह दिन में महज सौ रुपये कमा पाती थीं, जिससे इतने बड़े परिवार का पेट पालना किसी चुनौती से कम नहीं था। ऐसी हालत में बच्चों की पढ़ाई और खेल जैसी चीजें किसी विलासिता से कम नहीं थीं, फिर भी मां ने कभी बच्चों की शिक्षा से समझौता नहीं किया।
पांच साल की उम्र में वह भयानक हादसा
मरियप्पन जब सिर्फ पांच साल के थे, तब उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई। स्कूल जाते समय एक शराबी बस ड्राइवर ने उन्हें रौंद दिया और उनका दायां पैर घुटने के नीचे से कुचल गया। इस भयानक हादसे के बाद उनका पैर दोबारा कभी ठीक नहीं हो पाया — वह पैर हमेशा के लिए रुक गया और पांच साल के बच्चे के पैर जैसा ही रह गया। इलाज के लिए मां ने तीन लाख रुपये का कर्ज लिया, लेकिन इसके बावजूद पैर को पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सका। कई बच्चे ऐसे हादसे के बाद टूट जाते हैं, लेकिन मरियप्पन ने कभी खुद को दिव्यांग बच्चों से अलग नहीं माना। उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और खेलों से नाता बनाए रखा।
वॉलीबॉल से हाई जंप तक का सफर
बचपन में मरियप्पन को वॉलीबॉल खेलना बहुत पसंद था और विकलांगता के बावजूद वह खेल के मैदान में हमेशा नजर आते थे। चौदह साल की उम्र में उनके स्कूल के शारीरिक शिक्षा शिक्षक ने उन्हें ऊंची कूद (हाई जंप) आजमाने की सलाह दी। उनकी पहली ही प्रतियोगिता में कमाल हो गया — वह सामान्य खिलाड़ियों के बीच दूसरे स्थान पर रहे। इस प्रदर्शन के बाद उनके सहपाठियों और दोस्तों ने उनका जोरदार हौसला बढ़ाया और जिले के हर मुकाबले में उन्हें देखने आने लगे। वहीं से मरियप्पन के अंदर एक एथलीट का सपना आकार लेने लगा और हाई जंप उनका पहला प्यार बन गया।
संघर्ष और सफलता की रणनीति
मरियप्पन की सफलता अचानक नहीं आई थी। इसके पीछे सालों की मेहनत, सही मार्गदर्शन और कभी हार न मानने का जज्बा था। 2013 में राष्ट्रीय पैरा-एथलेटिक्स चैंपियनशिप में उनके प्रदर्शन को भारतीय पैरालंपिक टीम के कोच सत्यनारायण ने देखा और 2015 में उन्होंने मरियप्पन को अपना शिष्य बना लिया। सत्यनारायण उन्हें प्रशिक्षण के लिए बेंगलुरु ले गए, जहां कठोर अभ्यास और वैज्ञानिक ट्रेनिंग ने मरियप्पन को पूरी तरह बदल दिया। 2015 में ही वह विश्व रैंकिंग में नंबर वन बन गए थे और 2016 में ट्यूनीशिया में आईपीसी ग्रां प्री में 1.78 मीटर की छलांग लगाकर उन्होंने रियो पैरालंपिक के लिए क्वालीफाई कर लिया।
हार न मानने वाला नजरिया
मरियप्पन हमेशा कहते रहे कि उन्होंने कभी खुद को अलग नहीं समझा। हादसे के बाद दर्द और कठिनाइयां बहुत थीं, लेकिन उन्होंने अपनी विकलांगता को अपनी पहचान नहीं बनने दिया। लकड़ी के पैर से चलने वाला यह लड़का हर दिन मैदान में उतरता और अपने पुराने रिकॉर्ड तोड़ने की कोशिश करता। यही मानसिकता उन्हें बाकी खिलाड़ियों से अलग करती थी। गरीबी और चोट ने उन्हें तोड़ने की जगह और मजबूत बनाया, और उनका यही नजरिया आज युवाओं के लिए सबसे बड़ी सीख है।
अनुशासन और लगातार अभ्यास
कोच सत्यनारायण के मार्गदर्शन में मरियप्पन ने रोजाना घंटों अभ्यास किया। हाई जंप जैसे खेल में टेकनीक, गति और सही समय पर छलांग — सब कुछ महीन संतुलन मांगता है। मरियप्पन ने अपनी एक टांग की कमजोरी को ताकत में बदलने के लिए विशेष अभ्यास किए और धीरे-धीरे अपनी छलांग की ऊंचाई बढ़ाते गए। बेंगलुरु में प्रशिक्षण के दौरान उन्हें पहली बार विश्वस्तरीय सुविधाएं मिलीं और उन्होंने इसका पूरा फायदा उठाया। यही अनुशासन उन्हें 2016 में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ पैरा हाई जम्पर तक ले गया।
वह ऐतिहासिक क्षण: रियो 2016
सितंबर 2016 में रियो डी जनेरियो पैरालंपिक खेलों में मरियप्पन थंगावेलु ने वह कर दिखाया जो किसी भारतीय ने पहले नहीं किया था। पुरुषों के टी42 हाई जंप फाइनल में उन्होंने 1.89 मीटर की छलांग लगाकर स्वर्ण पदक जीत लिया। यह जीत सिर्फ एक पदक नहीं थी — यह साबित कर गई थी कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन हों, हौसला बुलंद हो तो कोई भी मंजिल दूर नहीं होती। इसके बाद उन्होंने टोक्यो 2020 में रजत और पेरिस 2024 में कांस्य पदक जीता, और इस तरह वह लगातार तीन पैरालंपिक खेलों में पदक जीतने वाले पहले भारतीय पैरा-एथलीट बन गए।
युवाओं के लिए संदेश
मरियप्पन थंगावेलु की जिंदगी युवाओं को एक सीधा संदेश देती है — अपनी कमजोरियों को अपनी ताकत बनाओ। जिस लड़के का एक पैर पांच साल की उम्र में बेकार हो गया था, उसी ने 21 साल की उम्र में दुनिया को अपनी छलांग से हैरान कर दिया। उन्होंने कभी शिकायत नहीं की, कभी हार नहीं मानी और हर दिन खुद को बेहतर बनाने में लगे रहे। अगर आप किसी कठिनाई से गुजर रहे हैं, तो याद रखिए कि असली बाधा शरीर में नहीं, मन में होती है। मेहनत, सही गुरु और न टूटने वाला विश्वास — यही सफलता के तीन स्तंभ हैं, जिन्हें मरियप्पन ने अपनी जिंदगी से साबित किया।
निष्कर्ष
मरियप्पन थंगावेलु को भारत सरकार ने 2017 में पद्म श्री से सम्मानित किया, उसी साल उन्हें अर्जुन पुरस्कार मिला और 2020 में उन्हें मेजर ध्यानचंद खेल रत्न से नवाजा गया। लेकिन उनके सबसे बड़े पुरस्कार वे करोड़ों दिल हैं, जिनमें उन्होंने उम्मीद की लौ जलाई है। सलेम के एक गांव से लेकर पैरालंपिक पोडियम तक का उनका सफर हमें सिखाता है कि जिंदगी चाहे कितनी भी मुश्किल हो, अगर इरादे मजबूत हों तो इंसान एक टांग पर भी आसमान छू सकता है। उनकी कहानी सिर्फ खेल की कहानी नहीं, बल्कि इंसानी हौसले की सबसे प्रेरक दास्तानों में से एक है।