Sports Success Story: धान के खेतों से दुनिया के ट्रैक तक – हिमा दास की प्रेरणादायक कहानी
असम के नगांव जिले के छोटे से ढींग गांव की हरी-भरी धान के खेतों में खेलने वाली एक लड़की ने एक दिन ऐसा कारनामा कर दिखाया, जिस पर पूरी दुनिया ने गौर किया। महज 18 साल की उम्र में, पहली बार अंतरराष्ट्रीय दौड़ में उतरे सिर्फ 18 महीने बाद, हिमा दास ने फिनलैंड के टाम्पेरे में भारत को विश्व स्तर पर ट्रैक इवेंट में पहला स्वर्ण पदक दिलाया। धान के खेतों की मिट्टी से उठकर विश्व चैंपियन बनने तक का उनका सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है, और यह कहानी हर उस युवा के लिए है जो छोटे गांव या गरीब घर से निकलकर बड़ा सपना देखता है।
बचपन: ढींग गांव की मिट्टी और धान के खेत
हिमा दास का जन्म 9 जनवरी 2000 को असम के नगांव जिले के ढींग गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ। वे अपने माता-पिता की पांच संतानों में सबसे छोटी हैं, और उनके पिता धान की खेती करके परिवार का गुजारा चलाते थे। घर में आमदनी इतनी कम थी कि बच्चों की पढ़ाई और खेल-कूद की सुविधाओं के बारे में सोचना भी मुश्किल था। गांव में ज्यादातर परिवारों की तरह उनका घर भी खेती-बाड़ी पर निर्भर था, और बचपन से ही हिमा खेतों की पगडंडियों पर दौड़ती-खेलती बड़ी हुईं।
हिमा के लिए धान के खेत ही पहला खेल मैदान थे। स्कूल के बाद वे गांव के लड़कों के साथ कीचड़ भरे मैदान में फुटबॉल खेलती थीं, और अक्सर टीम की सबसे तेज खिलाड़ी के रूप में सबसे आगे निकल जाती थीं। उस समय उनके पास न तो खेल के जूते थे और न ही किसी तरह का प्रशिक्षण, बस दौड़ने का जुनून था। गांव में लड़कियों का खेल में आगे बढ़ना आम बात नहीं थी, फिर भी हिमा ने कभी अपनी गति पर अंकुश नहीं लगने दिया।
सपने की शुरुआत: फुटबॉल से एथलेटिक्स तक
हिमा बचपन में फुटबॉल की स्ट्राइकर के रूप में खेलती थीं और सपना देखती थीं कि एक दिन फुटबॉल में भारत के लिए खेलेंगी। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। खेल प्रतिभा खोजने आए एक कोच ने उनकी तेज रफ्तार को पहचाना और उन्हें सलाह दी कि वे फुटबॉल छोड़कर एथलेटिक्स, खासकर दौड़ में किस्मत आजमाएं। यह सलाह हिमा के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुई।
कोच निपोन दास ने हिमा की प्रतिभा को निखारने की जिम्मेदारी ली और उन्हें गुवाहाटी के सरुसजई स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स के पास ठहरने की व्यवस्था की। गांव से दूर, सुविधाओं की कमी के बीच हिमा ने रोज सुबह-शाम कड़ी प्रैक्टिस शुरू की। उनके पिता के पास बेटी की ट्रेनिंग का खर्च उठाने के साधन नहीं थे, लेकिन उन्होंने अपनी बेटी के सपने पर कभी कोई रोक नहीं लगाई। हिमा ने ठान लिया था कि वह अपने मां-बाप की मेहनत और विश्वास को बेकार नहीं जाने देंगी।
संघर्ष के कठिन दिन
हिमा का रास्ता फूलों से सजा नहीं था। जब उन्होंने एथलेटिक्स शुरू किया, तो उनके पास ठीक से स्पाइक्स (दौड़ के जूते) तक नहीं थे, और गांव में लड़कियों का खेल में निकलना कोई उत्साह से नहीं देखता था। उनकी पहली प्रतिस्पर्धी दौड़ असम के शिवसागर में हुई एक अंतर-जिला प्रतियोगिता थी, जहां से सिर्फ डेढ़ साल बाद वे विश्व चैंपियन बन गईं। इस छोटी सी अवधि में उन्होंने जो मेहनत की, वह असाधारण थी।
आर्थिक तंगी के साथ-साथ शारीरिक चुनौतियां भी थीं। अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों के मुकाबले हिमा के पास न तो आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाएं थीं और न ही पोषण की वो व्यवस्था जो बड़ी अकादमियों में मिलती है। कई बार उन्हें लगता कि गांव की लड़की विश्व मंच पर कैसे खड़ी होगी, लेकिन हर बार उनके कोच और परिवार का भरोसा उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देता। उन्होंने हर रुकावट को अपनी रफ्तार में बदलना सीख लिया था।
सफलता की रणनीति
अंतिम 80 मीटर की रफ्तार
हिमा दास की दौड़ की सबसे बड़ी खासियत उनका आखिरी 80 मीटर का धमाकेदार फिनिश है। उनके कोच निपोन दास खुद कहते हैं कि हिमा की असली रेस अंतिम 80 मीटर में शुरू होती है, जहां वे अपने प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ देती हैं। विश्व अंडर-20 चैंपियनशिप के फाइनल में भी शुरुआत में वे पिछड़ गई थीं, लेकिन आखिरी स्ट्रेच में उन्होंने तीन प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ते हुए 51.46 सेकंड में स्वर्ण पदक अपने नाम किया। यह रणनीति उन्होंने बार-बार के अभ्यास से विकसित की थी।
सही कोच और अनुशासित अभ्यास
हिमा की सफलता के पीछे उनके कोच निपोन दास का मार्गदर्शन सबसे अहम रहा। उन्होंने हिमा को सिर्फ तेज दौड़ना नहीं सिखाया, बल्कि रेस की रणनीति, गति का बंटवारा और मानसिक तैयारी भी सिखाई। हिमा रोज घंटों ट्रैक पर पसीना बहाती थीं, और छोटी-छोटी गलतियों को सुधारने पर पूरा ध्यान देती थीं। उनके कोच कहते हैं कि हिमा किसी भी प्रतिद्वंद्वी से घबराती नहीं हैं और हर रेस में उनका लक्ष्य सबसे अच्छा समय निकालना होता है।
मानसिक मजबूती और देश का जुनून
टाम्पेरे में स्वर्ण पदक जीतने के बाद जब भारतीय राष्ट्रगान बजा, तो हिमा की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने कहा था कि देश के लिए पदक लाना सबसे बड़ी उपलब्धि है। यही देशभक्ति का जुनून उनकी सबसे बड़ी ताकत है। बड़े मंच पर घबराहट स्वाभाविक होती है, लेकिन हिमा अपने गांव, अपने परिवार और अपने देश के सपने को याद करके हर दबाव को पार कर जाती हैं। यही मानसिक मजबूती उन्हें बाकी धावकों से अलग करती है।
सफलता का मुकाम: टाम्पेरे से जकार्ता तक
12 जुलाई 2018 की रात फिनलैंड के टाम्पेरे में हिमा दास ने 400 मीटर की रेस 51.46 सेकंड में जीतकर इतिहास रच दिया। वे विश्व स्तर पर ट्रैक इवेंट में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय बनीं, और यह पदक उन्होंने महज 18 महीने की प्रतिस्पर्धी दौड़ के अनुभव के साथ जीता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ट्वीट करके उन्हें बधाई दी और कहा कि यह उपलब्धि आने वाले सालों में युवा एथलीटों को प्रेरित करेगी।
इसके बाद जकार्ता एशियाई खेल 2018 में हिमा ने 400 मीटर में 50.79 सेकंड का नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाते हुए रजत पदक जीता। उन्होंने महिला 4×400 मीटर रिले में स्वर्ण और मिश्रित 4×400 मीटर रिले में रजत (बाद में स्वर्ण में अपग्रेड) भी अपने नाम किया। जुलाई 2019 में उन्होंने यूरोप में महज 19 दिनों में पांच स्वर्ण पदक जीतकर पूरी दुनिया को चौंका दिया, और देश ने उन्हें अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया। आज उन्हें प्यार से ‘ढींग एक्सप्रेस’ कहा जाता है, और वे यूनिसेफ इंडिया की पहली युवा दूत भी बनीं।
युवाओं के लिए संदेश
हिमा दास की कहानी हर युवा को यह सिखाती है कि सपने देखने के लिए बड़े शहर या अमीर घर की जरूरत नहीं होती। अगर आपके पास जुनून है, तो धान के खेत भी विश्व चैंपियन बना सकते हैं। हिमा का मानना है कि सुविधाओं की कमी को बहाना नहीं बनाना चाहिए, बल्कि जो है उसी में अपना सर्वश्रेष्ठ देना चाहिए। उन्होंने साबित किया है कि लड़कियों के लिए खेल का मैदान उतना ही खुला है, जितना लड़कों के लिए।
निष्कर्ष
धान के खेतों में नंगे पैर दौड़ने वाली लड़की से ‘ढींग एक्सप्रेस’ बनने तक का हिमा दास का सफर इस बात का सबूत है कि मेहनत और जज़्बे से कोई भी मंजिल दूर नहीं। 18 महीने में विश्व चैंपियन बनने वाली हिमा ने दिखा दिया कि सही मार्गदर्शन और अटूट विश्वास मिले तो गरीब किसान की बेटी भी देश का गौरव बन सकती है। उनकी कहानी आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा बनी रहेगी।