Sports Success Story: डेढ़ साल की उम्र में इंजेक्शन ने छीन लिए पैर, निशाने ने दिलाया देश को पहला पैरा-आर्चरी गोल्ड – हरविंदर सिंह की प्रेरणादायक कहानी

Sports Success Story: डेढ़ साल की उम्र में इंजेक्शन ने छीन लिए पैर, निशाने ने दिलाया देश को पहला पैरा-आर्चरी गोल्ड – हरविंदर सिंह की प्रेरणादायक कहानी

पेरिस पैरालिंपिक 2024 के मैदान में जब हरविंदर सिंह ने अपना आखिरी तीर छोड़ा, तो पूरा देश सांस रोके देख रहा था। और जब तीर ने सोने का निशाना भेदा, तो इतिहास बन गया — भारत को तीरंदाजी में पहला पैरालिंपिक गोल्ड मिला। ये कहानी है हरियाणा के कैथल जिले के एक छोटे से गांव अजीत नगर के उस किसान बेटे की, जिसके पैर डेढ़ साल की उम्र में ही साथ छोड़ गए थे, लेकिन जिसका निशाना कभी डगमगाया नहीं।

बचपन और वो हादसा जिसने पैर छीन लिए

हरविंदर सिंह का जन्म हरियाणा के कैथल जिले के अजीत नगर गांव में एक मध्यमवर्गीय किसान परिवार में हुआ। उनका परिवार खेती-बाड़ी से जुड़ा था और जीवन साधारण गति से चल रहा था। लेकिन जब हरविंदर मात्र डेढ़ साल के थे, तो उन्हें डेंगू हो गया। गांव के एक डॉक्टर ने इलाज के लिए इंजेक्शन लगाया, लेकिन उस इंजेक्शन का दुष्प्रभाव इतना गंभीर निकला कि उनके पैरों ने काम करना बंद कर दिया। एक झटके में एक स्वस्थ बच्चे की जिंदगी बदल गई और पूरा परिवार गहरे सदमे में डूब गया।

इस हादसे के बाद हरविंदर का बचपन बाकी बच्चों जैसा नहीं रहा। गांव के दूसरे बच्चे खेलते-कूदते थे, जबकि उन्हें हर कदम पर सहारे की जरूरत पड़ती थी। लोग हमदर्दी जताते थे, कुछ तो पिता से कहते भी थे कि इस बच्चे का भविष्य अब क्या होगा। लेकिन पिता परमजीत ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने बेटे को पढ़ाई पर ध्यान देने के लिए प्रेरित किया और हर कदम पर उसका साथ दिया। घर का माहौल ऐसा बना कि हरविंदर ने कभी खुद को कमजोर महसूस नहीं किया।

सपना जो 2012 में एक टेलीविजन स्क्रीन से शुरू हुआ

हरविंदर के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साल 2012 में आया, जब उन्होंने लंदन पैरालिंपिक का प्रसारण देखा। स्क्रीन पर व्हीलचेयर और बैसाखियों वाले एथलीटों को दुनिया के सबसे बड़े खेल मंच पर संघर्ष करते देखकर उनके भीतर कुछ जाग उठा। उन्हें लगा कि अगर ये लोग कर सकते हैं, तो वो क्यों नहीं। यहीं से तीरंदाजी की ओर उनका आकर्षण बढ़ा और उन्होंने तय कर लिया कि यही उनकी मंजिल होगी।

इस सपने को हकीकत बनाने में उनके पिता ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई। कोरोना महामारी के लॉकडाउन के दौरान, जब ट्रेनिंग के सारे रास्ते बंद हो गए, तो पिता ने अपने खेत को ही आर्चरी रेंज में बदल दिया। हरविंदर रोज़ खेत में घंटों अभ्यास करते थे। उनकी मां हरभजन कौर भी हमेशा उनका हौसला बढ़ाती थीं, हालांकि 2018 में हार्ट अटैक से उनका निधन हो गया — जकार्ता एशियन पैरा गेम्स में गोल्ड जीतने से ठीक बीस दिन पहले। वो गोल्ड मेडल हरविंदर ने अपनी मां को समर्पित किया।

संघर्ष के वो साल जो किसी को नहीं दिखे

तीरंदाजी जैसे खेल में सफलता पाने के लिए सिर्फ जज्बा काफी नहीं होता — महंगे उपकरण, सही कोचिंग और निरंतर अभ्यास की जरूरत होती है। किसान परिवार से आने वाले हरविंदर के लिए ये सब जुटाना आसान नहीं था। उन्होंने 2017 में पैरा आर्चरी वर्ल्ड चैंपियनशिप में अंतरराष्ट्रीय पदार्पण किया और सातवां स्थान हासिल किया। ये नतीजा शानदार नहीं था, लेकिन इसने उन्हें बताया कि वो सही रास्ते पर हैं।

साल 2018 में जकार्ता एशियन पैरा गेम्स में पुरुष रिकर्व ओपन इवेंट में गोल्ड जीतकर हरविंदर पहली बार सुर्खियों में आए। तीन साल बाद टोक्यो पैरालिंपिक 2020 में उन्होंने ब्रॉन्ज़ मेडल जीतकर इतिहास रच दिया — तीरंदाजी में भारत का ये पहला पैरालिंपिक मेडल था। लेकिन उनका असली सपना अभी बाकी था, और वो था पैरालिंपिक गोल्ड। इसके लिए उन्होंने पेरिस तक दिन-रात एक कर दिया।

सफलता की रणनीति

मानसिक दृढ़ता को सबसे बड़ा हथियार बनाया

हरविंदर हमेशा कहते हैं कि तीरंदाजी नब्बे प्रतिशत मानसिक खेल है। उन्होंने मैच के दबाव में शांत रहने की कला पर सबसे ज्यादा काम किया। पेरिस में एक ही दिन में लगातार पांच मुकाबले जीतना इसी मानसिक तैयारी का नतीजा था — न थकान दिखी, न घबराहट। उन्होंने हर मैच को एक-एक तीर करके खेलने की आदत डाली, ताकि पिछले तीर का दबाव अगले निशाने पर न आए।

पढ़ाई और खेल का संतुलन

खेल के साथ-साथ हरविंदर ने पढ़ाई को कभी नहीं छोड़ा। वो पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से इकोनॉमिक्स में पीएचडी कर रहे हैं। उनका मानना है कि शिक्षा ने उन्हें अनुशासन सिखाया और खेल में रणनीतिक सोच विकसित की। रोज़ की दिनचर्या में उन्होंने पढ़ाई और अभ्यास दोनों के लिए तय घंटे रखे, और इस अनुशासन ने उन्हें दोनों मोर्चों पर आगे बढ़ाया।

परिवार को टीम का हिस्सा बनाया

हरविंदर ने कभी अकेले संघर्ष नहीं किया — उन्होंने अपने परिवार को अपनी टीम बना लिया। पिता ने खेत को रेंज में बदला, पत्नी मनप्रीत हर जीत-हार में साथ खड़ी रहीं। इस भावनात्मक सुरक्षा ने उन्हें बड़े मंचों पर भी निडर होकर खेलने की ताकत दी। वो कहते हैं कि जब पीछे पूरा परिवार खड़ा हो, तो तीर अपने आप निशाने पर लगता है।

सफलता का वो क्षण — पेरिस 2024

चार सितंबर 2024 का दिन भारतीय खेल इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया। पेरिस पैरालिंपिक में हरविंदर सिंह ने मेन्स इंडिविजुअल रिकर्व ओपन के फाइनल में पोलैंड के लुकाश सिज़ेक को 6-0 से हराकर गोल्ड मेडल जीता। उन्होंने एक ही दिन में पांच बैक-टू-बैक मुकाबले जीते — क्वार्टरफाइनल में कोलंबिया के हेक्टर जूलियो रामिरेज़ को 6-2 से और सेमीफाइनल में ईरान के मोहम्मद रेज़ा अरब अमेरी को 7-3 से हराया। फाइनल में उन्होंने अपने विरोधी को एक भी सेट नहीं लेने दिया।

ये जीत सिर्फ एक मेडल नहीं थी — ये तीरंदाजी में भारत का पहला पैरालिंपिक गोल्ड था। मैच के बाद वीडियो कॉल पर पिता परमजीत की आंखों में आंसू थे और उन्होंने कहा, “मुझे तुम पर गर्व है, बेटा।” हरविंदर ने उस पल में अपनी मां को याद किया, जिनका आशीर्वाद वो हर जीत में महसूस करते हैं। उस दिन पूरे देश ने देखा कि निशाना तीर का नहीं, इरादों का होता है।

युवाओं के लिए संदेश

हरविंदर सिंह की कहानी हर उस युवा के लिए है जो अपनी कमजोरी को अपनी किस्मत मान बैठा है। वो कहते हैं कि दिव्यांगता शरीर में होती है, सपनों में नहीं। अगर डेढ़ साल की उम्र में पैर खोने वाला एक किसान का बेटा दुनिया का सबसे बड़ा मंच जीत सकता है, तो मेहनत और धैर्य से कोई भी मंजिल दूर नहीं। उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा सबक यही है — हालात चाहे जैसे हों, निशाना हमेशा ऊंचा रखो।

निष्कर्ष

हरविंदर सिंह ने साबित कर दिया कि सच्ची ताकत पैरों में नहीं, हौसले में होती है। कैथल के खेतों से पेरिस के पोडियम तक का उनका सफर हर भारतीय के लिए प्रेरणा है। आज वो न सिर्फ एक चैंपियन हैं, बल्कि लाखों दिव्यांग युवाओं की उम्मीद भी हैं। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि जिंदगी में सबसे बड़ा निशाना वही होता है, जो आप अपने इरादों से लगाते हैं।

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