Kisan Success Story: बेटी की मौत के ग़म से जन्मा 111 पेड़ों का त्योहार – श्याम सुंदर पालीवाल की प्रेरणादायक कहानी

Kisan Success Story: बेटी की मौत के ग़म से जन्मा 111 पेड़ों का त्योहार – श्याम सुंदर पालीवाल की प्रेरणादायक कहानी

कभी-कभी एक इंसान का दुख पूरे गांव की तकदीर बदल देता है। राजस्थान के राजसमंद जिले के छोटे से गांव पिपलांत्री में एक पिता ने अपनी बेटी को खोया, लेकिन उसने आंसू पोंछकर ऐसी मुहिम छेड़ दी जिसने एक सूखे, बंजर गांव को हरी-भरी धरती में बदल दिया। आज पिपलांत्री में हर बेटी के जन्म पर 111 पेड़ लगाए जाते हैं, और गांव की लड़कियां उन पेड़ों को राखी बांधती हैं। यह कहानी है श्याम सुंदर पालीवाल की, जिन्हें देश ने 2021 में पद्म श्री से सम्मानित किया।

बचपन और गांव की पृष्ठभूमि

श्याम सुंदर पालीवाल का जन्म 9 जुलाई 1964 को राजस्थान के राजसमंद जिले के पिपलांत्री गांव में हुआ था। पिपलांत्री मार्बल की खानों के इलाके में बसा था, जहां खदानों की धूल मिट्टी को दबा चुकी थी और भूजल का स्तर बहुत नीचे जा चुका था। खेती के लिए पानी नहीं था, हरियाली के नाम पर सिर्फ बंजर धरती थी। पालीवाल गांव की इस हालत को देखकर बड़े हुए और धीरे-धीरे गांव के सरपंच बने। सरपंच बनने के बाद उन्होंने गांव की सबसे बड़ी समस्याओं को करीब से देखा — सूखा, पानी की कमी और बेटियों के जन्म को बोझ समझने वाली मानसिकता।

उन दिनों पिपलांत्री में बेटी के जन्म पर खुशी नहीं मनाई जाती थी, बल्कि कई परिवार इसे कर्ज और बोझ जैसा मानते थे। गांव की औरतें खुद बेटी के जन्म पर शर्मिंदगी महसूस करती थीं। पानी की इतनी किल्लत थी कि खेती करना मुश्किल हो गया था और युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे थे। पालीवाल समझते थे कि गांव को बचाना है तो पानी और पेड़, दोनों लौटाने होंगे। लेकिन उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ अभी आना बाकी था।

बेटी की मौत — जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़

साल 2006 में पालीवाल की छोटी बेटी किरन की डिहाइड्रेशन से मौत हो गई। गांव में पानी की किल्लत इतनी थी कि एक मासूम बच्ची की जान चली गई। एक पिता के लिए इससे बड़ा दुख कुछ नहीं हो सकता। कई लोग इस गम में टूट जाते, लेकिन पालीवाल ने इस गम को गांव के भविष्य में बदलने का फैसला किया। उन्होंने सोचा कि अगर गांव में पेड़ और पानी होते, तो शायद उनकी बेटी आज जिंदा होती।

उन्होंने ठान लिया कि पिपलांत्री में अब कोई बच्ची पानी की कमी से नहीं मरेगी और कोई बेटी जन्म को शर्म का कारण नहीं बनेगी। इसी संकल्प से जन्मा एक ऐसा विचार जो आज देश-दुनिया में चर्चा का विषय है — गांव में जब भी कोई बेटी जन्म लेगी, गांव के लोग उसके सम्मान में 111 पेड़ लगाएंगे। एक पिता के आंसू से शुरू हुई यह मुहिम धीरे-धीरे पूरे गांव की परंपरा बन गई।

संघर्ष और विरोध

शुरुआत आसान नहीं थी। जब पालीवाल ने 111 पेड़ लगाने की बात कही, तो गांव के कई लोगों ने इसे पागलपन कहा। मार्बल खदानों की धूल में पौधे कहां जिएंगे, लोग पूछते थे। बेटियों के जन्म पर खुशी मनाने की बात तो कई परिवारों को अजीब लगी, क्योंकि पुरानी सोच के मुताबिक बेटी पैदा होना बोझ था। पालीवाल घर-घर गए, महिलाओं से बात की, दादियों और चाचियों को समझाया कि ये पेड़ उनकी पोतियों के भविष्य की तरह हैं।

पानी की कमी तो मुहिम की सबसे बड़ी दुश्मन थी। बिना पानी के पौधे सूख जाते। पालीवाल ने गांव के लोगों के साथ मिलकर पास की पहाड़ियों पर चेक डैम बनाए, ताकि बारिश का पानी रुक सके और भूजल का स्तर ऊपर आए। धीरे-धीरे लोगों का भरोसा बढ़ा। जब पहले पौधे हरे हुए और बेटियों के नाम की FD तैयार हुई, तो गांव वालों ने देखा कि यह कोई सपना नहीं, सच्ची बदलती तकदीर है।

सफलता की रणनीति

1. 111 पेड़ और बेटियों की इज्जत

मुहिम का सबसे खूबसूरत नियम यह था कि बेटी के जन्म पर परिवार 111 पौधे लगाएगा और उनकी देखभाल करेगा। लड़कियां बड़ी होकर उन पेड़ों को राखी बांधती हैं, जैसे पेड़ उनके भाई हों। माता-पिता को एक शपथ-पत्र पर हस्ताक्षर करने होते हैं कि वे बेटी की शादी 18 साल से पहले नहीं करेंगे, उसे पढ़ाएंगे और कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुरीति को छोड़ेंगे। इस तरह हर बेटी का जन्म पेड़ों के साथ-साथ सम्मान का भी उत्सव बन गया।

2. बेटियों के नाम आर्थिक सुरक्षा

पालीवाल ने गांव के लोगों से मिलकर हर नवजात बेटी के नाम एक फिक्स्ड डिपॉजिट खोलने की व्यवस्था की। गांव के लोग चंदा जुटाकर करीब 21 से 31 हजार रुपये बेटी के नाम जमा करते हैं, जो वह बड़ी होकर 20 साल की उम्र तक एक अच्छी रकम बन जाती है। इससे गरीब परिवारों के लिए बेटी अब बोझ नहीं रही, बल्कि भविष्य की उम्मीद बन गई। गांव की पंचायत हर साल वृक्ष महोत्सव भी मनाती है, ताकि यह परंपरा नई पीढ़ी तक पहुंचती रहे।

3. पानी का प्रबंधन — चेक डैम और भूजल

पेड़ लगाने के साथ-साथ पालीवाल ने पानी बचाने पर सबसे ज्यादा जोर दिया। पहाड़ियों पर बनाए गए चेक डैम से बारिश का पानी रुकने लगा और भूजल का स्तर धीरे-धीरे ऊपर आया। गांव में तालाब और जल संरचनाओं का जाल बिछा दिया गया। आज पिपलांत्री सूखे से जूझने वाला गांव नहीं रहा, बल्कि पानी और हरियाली से भरा नंदनवन कहलाता है। 2018 तक गांव में साढ़े तीन लाख से ज्यादा पेड़ लग चुके थे — आम, शीशम, बरगद और पीपल के।

4. आर्थिक स्थिरता और रोजगार

पेड़ों से गांव की अर्थव्यवस्था भी मजबूत हुई। पिपलांत्री में अब एलोवेरा जैसे प्राकृतिक उत्पादों की खेती और बिक्री होती है, जिनकी बाजार में अच्छी मांग है। पेड़ों से मिलने वाले फल, औषधीय पौधे और अन्य उत्पाद गांव वालों को रोजगार दे रहे हैं। पालीवाल का अगला सपना गांव में और रोजगार पैदा करना है, ताकि युवाओं को काम के लिए शहर न जाना पड़े। हरियाली ने न सिर्फ मिट्टी की उर्वरता लौटाई, बल्कि गांव के चेहरों पर भी मुस्कान लौटा दी।

सफलता का क्षण

2021 में भारत सरकार ने श्याम सुंदर पालीवाल को समाज सेवा के क्षेत्र में पद्म श्री से सम्मानित किया। एक छोटे से गांव के सरपंच का राष्ट्रपति भवन तक पहुंचना पूरे पिपलांत्री के लिए गर्व का क्षण था। लेकिन सफलता यहीं नहीं रुकी — उनकी कहानी पर बनी डॉक्यूमेंट्री “पिपलांत्री: ए टेल ऑफ इको-फेमिनिज्म” को 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ गैर-फीचर फिल्म (सामाजिक और पर्यावरणीय मूल्यों को बढ़ावा देने वाली) का सम्मान मिला। आज पिपलांत्री देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों और शोधकर्ताओं के लिए प्रेरणा का केंद्र है।

कभी सूखे और बेटियों के तिरस्कार के लिए जाना जाने वाला गांव आज बेटियों के जन्म का जश्न मनाता है। हर साल गांव में करीब 60 बेटियां जन्म लेती हैं और हर एक के नाम 111 पेड़ लगते हैं। लड़कियां अब बोझ नहीं, गांव की शान हैं। एक पिता ने बेटी की मौत के गम से जो बीज बोया था, वह आज लाखों पेड़ों का जंगल बन चुका है।

युवाओं के लिए संदेश

पालीवाल की कहानी युवाओं को सिखाती है कि दुख को ताकत में बदला जा सकता है। उन्होंने कभी हार नहीं मानी — न गांव वालों के तानों से, न पानी की कमी से, न पुरानी सोच से। उनका मानना है कि अगर एक गांव बदल सकता है, तो पूरा देश बदल सकता है। युवाओं को चाहिए कि वे अपनी जड़ों से जुड़ें, पर्यावरण को बचाएं और समाज की गलत धारणाओं को चुनौती दें।

उनकी सबसे बड़ी सीख यह है कि बड़ा बदलाव बड़े शहरों से नहीं, छोटे गांवों के छोटे-छोटे कदमों से आता है। 111 पेड़ लगाने का विचार छोटा था, लेकिन उसमें बेटियों का सम्मान, पानी की बचत और गांव की समृद्धि — तीनों सपने एक साथ बुने हुए थे। यही सोच आज के युवाओं को अपनानी चाहिए।

निष्कर्ष

श्याम सुंदर पालीवाल की कहानी सिर्फ एक किसान या सरपंच की कहानी नहीं है, यह एक पिता के प्रेम, एक गांव की जागरूकता और प्रकृति से दोस्ती की कहानी है। उन्होंने साबित कर दिया कि अगर इरादा सच्चा हो तो सूखी धरती भी हरी हो सकती है और बेटियों का जन्म भी त्योहार बन सकता है। पिपलांत्री आज “नंदनवन” कहलाता है — खुशियों का जंगल, जहां हर पेड़ एक बेटी की कहानी कहता है।

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