Kisan Success Story: सूखी नदियों को जिंदा करने वाले ‘वॉटरमैन ऑफ इंडिया’ – राजेंद्र सिंह की प्रेरणादायक कहानी
राजस्थान के अलवर जिले में आज जहां हरे-भरे खेत लहलहा रहे हैं, वहां कुछ दशकों पहले सूखी नदियों के नामो-निशान तक मिट चुके थे। पानी की किल्लत से परेशान किसान खेती छोड़ पलायन कर रहे थे। ऐसे में एक युवक ने ठाना कि गांव वालों के साथ मिलकर बरसात के पानी को ही ताकत बनाया जाए। उस युवक का नाम है राजेंद्र सिंह, जिन्हें आज पूरी दुनिया “वॉटरमैन ऑफ इंडिया” के नाम से जानती है। उनकी मेहनत और सूझबूझ ने न सिर्फ पांच सूख चुकी नदियों को फिर से जिंदा किया, बल्कि हज़ारों गांवों की तकदीर ही बदल दी।
पृष्ठभूमि: दाऊला गांव के साधारण लड़के से पर्यावरण योद्धा तक
राजेंद्र सिंह का जन्म 6 अगस्त 1959 को उत्तर प्रदेश के दाऊला गांव में हुआ था। पढ़ाई-लिखाई के लिए वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय गए, जहां उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की। उस दौर में ज्यादातर नौजवानों का सपना सरकारी नौकरी पाना था, लेकिन राजेंद्र सिंह कुछ अलग करना चाहते थे। उनके मन में गांव-समाज के लिए कुछ करने की आग जल रही थी। वे जयपुर के एक संस्थान से जुड़े, जहां उन्होंने समाजसेवा के काम में कदम रखा।
सन् 1985 में राजेंद्र सिंह अपने कुछ साथियों के साथ राजस्थान के अलवर जिले के थानागाजी तहसील के किशोरी गांव पहुंचे। उस समय उनकी संस्था तरुण भारत संघ — जो 1975 में जयपुर के युवाओं ने शुरू की थी — को नया जीवन देने का इरादा था। शुरुआत में उनका उद्देश्य गांव में शिक्षा के काम को आगे बढ़ाना था, लेकिन गांव पहुंचते ही उन्हें असलियत का एहसास हुआ। गांव के लोगों ने साफ कहा कि पढ़ाई-लिखाई बाद में, पहले सबसे बड़ी जरूरत पानी की है। सूखे से जूझते इलाके में यह बात राजेंद्र सिंह के दिल को छू गई।
वह फैसला जिसने दिशा ही बदल दी
किशोरी गांव में राजेंद्र सिंह ने देखा कि बरसात का कीमती पानी बहकर बेकार चला जाता है और गर्मियों में कुएं सूख जाते हैं। गांव के बुजुर्गों ने उन्हें राजस्थान की पुरानी परंपरा “जोहड़” के बारे में बताया — यह एक ऐसा तालाब होता है जो बरसात के पानी को रोककर जमीन में सोख लेता है, जिससे आसपास के कुओं और नदियों में पानी फिर से उतर आता है। राजेंद्र सिंह ने ठान लिया कि इसी पुरानी तकनीक को आधुनिक ढंग से गांवों में वापस लाया जाएगा।
उस समय न तो उनके पास बड़े फंड थे और न ही कोई सरकारी समर्थन। बस एक साइकिल, कुछ साथी और गांव वालों का भरोसा था। उन्होंने एक-एक गांव जाकर लोगों को समझाया कि बरसात का पानी अगर तालाबों और चेक डैम में रोका जाए तो सूखा ख़त्म हो सकता है। धीरे-धीरे गांव वालों ने श्रमदान किया और पहला जोहड़ बना। बारिश के बाद जब उस जोहड़ के आसपास के कुओं में पानी उतर आया, तो लोगों की आंखें खुली रह गईं। यहीं से एक बड़े आंदोलन की शुरुआत हुई।
संघर्ष: हर मोड़ पर मुश्किल, हर कदम पर चुनौती
राह आसान नहीं थी। बरसों से पानी के संकट से जूझते इलाकों में सरकार की नीतियां भी सहयोगी नहीं थीं। अवैध खनन लॉबी जोहड़ के इलाकों में पत्थर और रेत निकालती थी, जिससे जल संरक्षण के काम में बाधा आती थी। राजेंद्र सिंह ने इस खनन माफिया के खिलाफ लंबी कानूनी और सामाजिक लड़ाई लड़ी। उन्हें धमकियां भी मिलीं, लेकिन वे पीछे नहीं हटे।
इसके अलावा, कई गांवों में लोगों को सामुदायिक काम के लिए एकजुट करना सबसे बड़ी चुनौती थी। हर गांव के अपने मतभेद थे, जाति-पंचायत के झगड़े थे। राजेंद्र सिंह ने हर गांव में ग्राम सभाओं का आयोजन किया और “श्रमदान” की परंपरा को जीवित किया। उन्होंने लोगों को समझाया कि पानी किसी सरकार की देन नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। धीरे-धीरे गांव-गांव से लोग जुड़ते गए और जल संरक्षण एक जनआंदोलन में बदल गया।
सफलता की रणनीति: पुरानी तकनीक, नई सोच
1. जोहड़ और चेक डैम का जाल
राजेंद्र सिंह की सबसे बड़ी रणनीति थी — प्रकृति के पुराने तरीकों को गांव के लोगों के साथ मिलकर पुनर्जीवित करना। बरसात के पानी को रोकने के लिए जोहड़, चेक डैम, खड़ीन और तालाब जैसी पारंपरिक संरचनाएं बनाई गईं। एक गांव से शुरू हुआ काम सैकड़ों गांवों तक फैल गया। आज तरुण भारत संघ के मार्गदर्शन में 8,600 से अधिक जोहड़ और जल संरक्षण संरचनाएं बन चुकी हैं।
2. सामुदायिक स्वामित्व
दूसरी रणनीति थी — पानी के काम को सरकारी योजना से “गांव का काम” बनाना। हर संरचना के रखरखाव की जिम्मेदारी गांव की ग्राम सभा को दी गई। लोग खुद श्रमदान करते, खुद फंड जुटाते और खुद निर्णय लेते। इससे भ्रष्टाचार की गुंजाइश ख़त्म हो गई और लोगों में अपने पानी के प्रति मालिकाना भावना पैदा हुई।
3. नदियों का पुनर्जीवन
तीसरी रणनीति थी — छोटे-छोटे जोहड़ों को नदी-पुनर्जीवन से जोड़ना। जब एक ही जलग्रहण क्षेत्र में सैकड़ों जोहड़ बने, तो भूजल का स्तर बढ़ा और सूख चुकी नदियां फिर बहने लगीं। इस तरह राजस्थान की पांच नदियां — अरवरी, रूपारेल, सरसा, भागानी और जहाजवाली — पुनः जीवित हो उठीं, जो दशकों से सूखी पड़ी थीं।
4. कानून और नीति की लड़ाई
चौथी रणनीति थी — खनन माफिया और प्रशासनिक बाधाओं के खिलाफ कानूनी लड़ाई। राजेंद्र सिंह ने न्यायालयों तक जाकर अवैध खनन रुकवाया और जल संरक्षण को नीतिगत मान्यता दिलाने में भूमिका निभाई। 2009 में वे राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के सदस्य भी बने।
सफलता का पल: जब पूरी दुनिया ने सराहा
सन् 2001 में राजेंद्र सिंह को सामुदायिक नेतृत्व के लिए रैमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला — यह वह पल था जब देश ने उनकी मेहनत को पहली बार बड़े मंच पर सराहा। फिर 2015 में उन्हें स्टॉकहोम जल पुरस्कार मिला, जिसे “पानी का नोबेल पुरस्कार” कहा जाता है। आज उनके प्रयासों से राजस्थान के 1,000 से अधिक गांवों में पानी की सुरक्षा लौट आई है, सूखी नदियां फिर बह रही हैं और हज़ारों किसानों के खेत हरे-भरे हैं।
2008 में ब्रिटेन के प्रतिष्ठित अखबार द गार्जियन ने उन्हें “ग्रह को बचाने वाले 50 लोगों” की सूची में भी शामिल किया था। आज राजेंद्र सिंह देश-विदेश में जल संरक्षण के सबसे बड़े चेहरों में गिने जाते हैं, और उनकी कहानी दुनिया भर के पर्यावरण आंदोलनों के लिए प्रेरणा है।
युवाओं के लिए संदेश
राजेंद्र सिंह हमेशा कहते हैं कि पानी बचाना किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे समाज का काम है। वे युवाओं से कहते हैं कि नौकरी की तलाश से पहले समाज की जरूरत को पहचानो। अगर तुम्हारे पास जुनून है और काम करने की ईमानदारी है, तो एक छोटी शुरुआत भी बड़े आंदोलन में बदल सकती है।
उनका मानना है कि आधुनिक विकास के चकाचौंध में हमें अपनी पारंपरिक समझ को नहीं भूलना चाहिए। बुजुर्गों की तकनीक और युवाओं की ऊर्जा जब मिलती है, तो सूखी नदियां भी फिर से बह सकती हैं। यही उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा सबक है।
निष्कर्ष
राजेंद्र सिंह की कहानी सिर्फ जल संरक्षण की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस भरोसे की कहानी है कि एक व्यक्ति गांव के लोगों के साथ मिलकर पूरे इलाके की तकदीर बदल सकता है। एक साइकिल पर गांव-गांव घूमने वाले युवक से “वॉटरमैन ऑफ इंडिया” बनने तक का उनका सफर हर किसान और हर नौजवान के लिए प्रेरणा है। उन्होंने साबित कर दिया कि पानी बचाना ही जिंदगी बचाना है — और यही उनके आंदोलन का असली मंत्र है।