Kisan Success Story: कर्ज़ के दलदल से सालाना 20 लाख तक – प्रेम सिंह की प्रेरणादायक कहानी
कहा जाता है कि जो धरती से प्यार करता है, धरती उसे कभी खाली हाथ नहीं लौटाती। बुंदेलखंड की पथरीली और सूखाग्रस्त ज़मीन पर यह बात सच करके दिखाई है उत्तर प्रदेश के बांदा ज़िले के प्रेम सिंह ने। कभी बैंक के कर्ज़ में डूबा किसान आज ‘आवर्तनशील खेती’ की अपनी अनूठी विधि से सालाना 15 से 20 लाख रुपये कमाता है, और उसका खेत देश-विदेश के किसानों के लिए एक खुला विश्वविद्यालय बन चुका है। प्रेम सिंह की कहानी सिर्फ़ एक सफल किसान की कहानी नहीं है, बल्कि उस भरोसे की कहानी है जो बताती है कि अगर किसान कर्ज़ और रसायनों के जाल से निकलकर आत्मनिर्भर बने, तो खेती घाटे का सौदा नहीं, बल्कि शान का सौदा बन सकती है।
बुंदेलखंड की पथरीली धरती पर जन्मा एक सपना
प्रेम सिंह का जन्म 1964 में उत्तर प्रदेश के बांदा ज़िले के बड़ोखर खुर्द गाँव के एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। बचपन खेतों की हरियाली और जानवरों के बीच बीता, लेकिन परिवार की आर्थिक हालत हमेशा तंग ही रही। प्रेम पढ़ाई में अच्छे थे, उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में एमए किया और महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय से ग्रामीण विकास प्रबंधन की पढ़ाई भी की। इतनी पढ़ाई के बाद भी उन्होंने अपने पुरखों का पेशा छोड़ा नहीं — 1987 में वह पूरी तरह खेती में उतर आए। उस दौर में खेती का मतलब था यूरिया और डीएपी जैसे रासायनिक खादों पर पूरी तरह निर्भर रहना, और प्रेम सिंह भी अपने पिता की ही राह पर चल पड़े। शुरुआत में फसल अच्छी आई, लेकिन मिट्टी की सेहत लगातार गिरती गई और उत्पादन की लागत साल-दर-साल बढ़ती गई।
कर्ज़ का पहाड़ और दो विकल्प
खेती शुरू करने के दो साल बाद ही प्रेम सिंह को एहसास हो गया था कि कुछ बहुत ग़लत हो रहा है। उस समय परिवार की सालाना आमदनी करीब 2.15 लाख रुपये थी, लेकिन 1.90 लाख रुपये से ज़्यादा उत्पादन लागत और बैंक के कर्ज़ की किस्तों में निकल जाता था। बची-खुची रकम में चार भाइयों और उनके बच्चों वाले बड़े परिवार का गुज़ारा करना लगभग असंभव था। कर्ज़ बढ़ता जा रहा था और खेती घाटे का सौदा बनती जा रही थी। प्रेम सिंह के सामने सिर्फ़ दो विकल्प थे — या तो खेती छोड़कर कुछ और करें, या फिर खेती करने का कोई ऐसा तरीका खोजें जो खेत को फिर से जिंदा कर दे। उन्होंने दूसरा रास्ता चुना। 1989 में उन्होंने पिता से इजाज़त लेकर खेत के एक छोटे हिस्से में पारंपरिक और टिकाऊ खेती के प्रयोग शुरू कर दिए। परिवार में किसी ने उनका साथ नहीं दिया, लेकिन प्रेम सिंह ने हार मानना नहीं सीखा था।
सफलता की रणनीति: ‘आवर्तनशील खेती’
प्रेम सिंह ने दो दशकों के प्रयोग और मेहनत के बाद जो विधि विकसित की, उसे उन्होंने नाम दिया ‘आवर्तनशील खेती’, यानी ‘पीरियॉडिक प्रोपोर्शनेट फार्मिंग’। इस विधि की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि इसमें किसान पूरी तरह आत्मनिर्भर हो जाता है — उसे न बैंक के कर्ज़ की ज़रूरत रहती है, न महंगे रसायनों की। उनकी सलाह का सार एक ही वाक्य में है: “पहले अपने घर का पेट भरो, फिर बचा हुआ बाज़ार ले जाओ, और वह भी कच्चा नहीं, प्रसंस्कृत करके।” इसी सोच पर उन्होंने अपने पूरे खेत को तीन बराबर हिस्सों में बाँट दिया, और हर हिस्सा एक-दूसरे की मदद करता है। आइए समझते हैं उनकी इस रणनीति के तीनों स्तंभ।
पहला हिस्सा: फलों का बगीचा और जंगली पेड़
खेत के एक-तिहाई हिस्से में प्रेम सिंह ने फलों के बगीचे और जंगल की तरह उगने वाले पेड़ लगाए हैं। इस हिस्से की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें मज़दूरी और रखरखाव की लागत बेहद कम है — पेड़ एक बार लग जाएँ तो सालों तक फल देते हैं। इसके साथ ही पेड़-पौधों की विविधता खेत के पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखती है। पेड़ों से गिरने वाले सूखे पत्ते गाय के गोबर के साथ मिलाकर बेहतरीन जैविक खाद बनाते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता लगातार बढ़ती है। यानी यह हिस्सा न सिर्फ़ अतिरिक्त आमदनी देता है, बल्कि पूरे खेत की मिट्टी को पोषण देने वाला ‘खाद का कारखाना’ भी बन गया है।
दूसरा हिस्सा: पशुपालन
खेत के दूसरे हिस्से में गाय, भैंस, बकरी और मुर्गियाँ पाली जाती हैं। पशुओं से मिलने वाला दूध पहले परिवार की ज़रूरत पूरी करता है, और बचा हुआ दूध पनीर, मक्खन और घी बनाकर बेचा जाता है। पशुओं का गोबर और मूत्र खेत की खाद बनता है, जिससे रासायनिक खाद पर निर्भरता पूरी तरह खत्म हो गई है। प्रेम सिंह कहते हैं कि पशुपालन किसान के लिए कई तरह से आमदनी का स्रोत है — दूध से प्रसंस्कृत उत्पाद बनते हैं, गोबर से खाद, और खाद से बेहतर फसल। यह एक ऐसा चक्र है जिसमें कुछ भी बेकार नहीं जाता, और यही आत्मनिर्भर खेती की असली ताकत है।
तीसरा हिस्सा: घर के लिए अनाज और सब्ज़ियाँ
तीसरे हिस्से में वह सब कुछ उगाया जाता है जो परिवार के खाने के लिए चाहिए — गेहूँ, चावल, तीन तरह की दालें, अनाज, सब्ज़ियाँ, फल, मसाले और तेल तक। तेल के लिए बीजों से तेल निकाला जाता है, मसाले भी खेत में ही उगते हैं। प्रेम सिंह का मानना है कि जो चीज़ें बाज़ार से खरीदनी ही पड़ें, उन्हें आस-पास के गाँवों और समुदाय से खरीदना चाहिए ताकि स्थानीय अर्थव्यवस्था मज़बूत हो। इस तरह परिवार का पूरा राशन खेत से ही आता है और बाज़ार की महँगाई का कोई असर उनके घर पर नहीं पड़ता।
प्रसंस्करण: कच्चा माल नहीं, तैयार उत्पाद बेचो
प्रेम सिंह की रणनीति का सबसे दमदार पहलू है मूल्य संवर्धन। पिछले 28 सालों में उन्होंने अपनी कोई उपज कच्ची नहीं बेची। अगर 50 लीटर दूध मिलता है और परिवार को 15 लीटर चाहिए, तो बाकी 35 लीटर का घी, मक्खन और पनीर बनाया जाता है। आम का मुरब्बा और अचार, आँवले का अचार और कैंडी, सरसों का तेल, जैविक चावल और गेहूँ-चना-जौ का आटा — ये सब उनके फार्म की पहचान बन चुके हैं। प्रसंस्करण से न सिर्फ़ उत्पाद की कीमत कई गुना बढ़ जाती है, बल्कि किसान का अपना बाज़ार और अपनी पहचान भी बनती है। यही वजह है कि उनकी सालाना आमदनी आज 15 से 20 लाख रुपये के बीच है, जबकि कभी कर्ज़ उतारने में ही सब कुछ चला जाता था।
सफलता का वह पल जब कर्ज़ पूरी तरह उतर गया
प्रेम सिंह को कर्ज़ से मुक्त होने में दो पूरे दशक लगे, लेकिन जब परिवार का 25 लाख रुपये का कर्ज़ पूरी तरह चुकता हो गया, तो वह दिन उनके जीवन का सबसे बड़ा उत्सव था। आज उनका 32 बीघा (करीब पाँच एकड़) का खेत बुंदेलखंड की सूखी धरती पर हरे-भरे स्वर्ग जैसा दिखता है — खेत के अंदर ही जलाशय हैं जिनमें मवेशी और मुर्गियाँ पानी पीती हैं, बायोगैस संयंत्र से 40 लोगों का खाना बिना एलपीजी के बनता है, और 3 किलोवाट के सौर ग्रिड से खेत की बिजली की ज़रूरतें पूरी होती हैं। उन्होंने अपने खेत में ‘ह्यूमेन एग्रीरियन सेंटर’ भी बनाया है — कृषि के इतिहास का एक अनूठा ग्रामीण संग्रहालय, जहाँ स्कूली बच्चे और कॉलेज के छात्र टिकाऊ खेती सीखने आते हैं। 22 से ज़्यादा देशों के किसान उनकी विधि सीखने के लिए यहाँ आ चुके हैं, और 2016 में उन्होंने टेडएक्स गुरुग्राम में ‘क्रैकिंग द फार्मिंग कोड’ नाम से अपना प्रसिद्ध भाषण भी दिया।
युवाओं के लिए प्रेम सिंह का संदेश
प्रेम सिंह युवाओं से कहते हैं कि आत्मनिर्भर बनो — हमारी किस्मत हमारे अपने हाथों में है, और खेती में क्रांति लाने का एक ही रास्ता है: अपनी प्राचीन विधियों को फिर से जीवित करना। उनका मानना है कि अगर खेती सही तरीके से करनी है तो पहले अपने परिवार के लिए उगाओ, बाज़ार के लिए नहीं, और प्रकृति का सम्मान करो जो पहले से ही भरपूर संसाधन देती है। वह युवाओं को सलाह देते हैं कि खेती को सिर्फ़ फसल उगाने का काम न समझें — पशुपालन, प्रसंस्करण, खाद बनाना और बीज संरक्षण सब मिलकर ही खेती को लाभदायक बनाते हैं। बेल्जियम के पर्यावरणविद् जोहान डी’हल्स्टर के साथ उन्होंने ‘व्हाट फार्मर्स रियली नीड’ नाम की किताब भी लिखी है, ताकि उनकी सीख ज़्यादा से ज़्यादा किसानों तक पहुँचे।
निष्कर्ष
प्रेम सिंह की कहानी हमें सिखाती है कि संकट कितना भी बड़ा हो, सही सोच और धैर्य से रास्ता निकल ही आता है। जिस बुंदेलखंड में सूखा और कर्ज़ किसानों की जान ले रहे थे, वहीं एक पढ़े-लिखे किसान ने अपनी मिट्टी पर भरोसा करके आत्मनिर्भरता का ऐसा मॉडल खड़ा कर दिया जिसे आज दुनिया सीखने आती है। उन्होंने साबित कर दिया कि किसान को न कर्ज़ माफी का इंतज़ार करना चाहिए, न महंगे रसायनों पर निर्भर रहना चाहिए — अपनी ज़मीन, अपने पशु और अपने हाथों पर भरोसा ही असली पूँजी है। प्रेम सिंह जैसे किसान ही भारत की खेती का भविष्य हैं, और उनकी कहानी हर उस युवा के लिए प्रेरणा है जो धरती से जुड़कर कुछ बड़ा करना चाहता है।