Kisan Success Story: नौ अनाज से पद्म श्री तक – नेक राम शर्मा की प्रेरणादायक कहानी
कभी-कभी इंसान को पहचान उस काम से नहीं मिलती, जिसे वह मजबूरी में करता है, बल्कि उस काम से मिलती है, जिसे वह अपने जुनून और लगन के साथ करता है। हिमाचल प्रदेश के मंडी ज़िले के करसोग उपमंडल के छोटे-से गाँव ननज के रहने वाले नेक राम शर्मा की कहानी ऐसी ही है। रसायनिक खादों से बर्बाद हो रही ज़मीन को उन्होंने नौ अनाज की परंपरागत खेती से फिर से जीवंत कर दिया, और आज राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों मिला पद्म श्री सम्मान उनकी मेहनत का गवाह है। उनकी कहानी हर उस किसान के लिए उम्मीद की किरण है, जो सोचता है कि ज़मीन अब कुछ नहीं दे सकती।
पृष्ठभूमि: एक आम पहाड़ी परिवार का बेटा
नेक राम शर्मा का जन्म हिमाचल प्रदेश के मंडी ज़िले के करसोग क्षेत्र के ननज गाँव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता भी किसान थे, और घर का सारा गुज़ारा खेती-बाड़ी से ही चलता था। जब नेक राम किशोरावस्था में थे, तब सरकार ने रासायनिक खादों को बढ़ावा देने की नीति लागू की थी, जिसके तहत किसानों को अनुदान पर यूरिया और कीटनाशक मिलने लगे थे। उनके पिता समेत गाँव के अधिकतर किसानों ने पारंपरिक मोटे अनाज छोड़कर नकदी फसलों और एकल फसल वाली खेती की ओर रुख कर लिया, क्योंकि इससे शुरुआत में मुनाफ़ा ज़्यादा दिखता था। लेकिन रसायनों के इस दौर ने धीरे-धीरे पहाड़ों की उपजाऊ मिट्टी को अंदर से खोखला करना शुरू कर दिया, और यह उसी समय था जब नेक राम अपने भविष्य के बारे में सोच रहे थे।
युवावस्था में नेक राम ने भी बहुत से युवाओं की तरह सरकारी नौकरी पाने की कोशिश की। उन्होंने कई बार प्रयास किया, लेकिन किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया और कोई सरकारी नौकरी हाथ नहीं लगी। 1980 के दशक के मध्य में उन्होंने नौकरी का सपना छोड़ दिया और पूरी तरह खेती की ओर मुड़ गए। शुरुआत में उन्होंने भी उसी रास्ते को अपनाया जो उस दौर का चलन था — फलों और सब्ज़ियों की खेती में रसायनिक खाद और कीटनाशकों का भरपूर इस्तेमाल, क्योंकि सरकार इन्हें अनुदान पर देती थी और उपज भी बढ़ी हुई दिखती थी। लेकिन कुछ ही सालों में उन्होंने देखा कि खेतों की पैदावार घट रही है और मिट्टी की उर्वरता खत्म होती जा रही है। 1990 से 1995 तक उन्होंने एक अंगोरा फार्म भी चलाया, लेकिन उनका मन किसी और ही तलाश में था — ऐसी खेती, जो ज़मीन को लूटे नहीं, बल्कि उसे सींचे।
टर्निंग पॉइंट: रसायनों से मोहभंग और परंपरा की ओर वापसी
जब नेक राम ने 1990 के दशक के मध्य में अपने परिवार के खेतों की बागडोर संभाली, तब तक स्थिति बेहद चिंताजनक हो चुकी थी। खेत रसायनिक खादों के आदी हो चुके थे, मिट्टी की सेहत बिगड़ चुकी थी और पैदावार लगातार गिर रही थी। उन्होंने गौर किया कि जिस खाद से कभी फसलें लहलहाती थीं, वही अब ज़मीन को बंजर बनाने की दिशा में ले जा रही थी। यही वह क्षण था, जब उन्होंने एक बड़ा और जोखिम भरा फैसला लिया — धीरे-धीरे, लेकिन पूरी निष्ठा के साथ, रसायनमुक्त खेती की ओर बढ़ने का। उन्हें पता था कि एक झटके में पूरी खेती को जैविक करना संभव भी नहीं था और सेहतमंद भी नहीं, इसलिए उन्होंने हर साल रसायनिक खाद की मात्रा घटानी शुरू कर दी। वर्ष 2005 तक उन्होंने अपने खेतों में रसायनिक खाद का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर दिया था।
इस बदलाव के लिए उन्होंने सिर्फ हिम्मत नहीं, बल्कि ज्ञान का भी सहारा लिया। उन्होंने कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों से सलाह ली और ‘ज़ीरो बजट प्राकृतिक खेती’ के प्रणेता सुभाष पालेकर से मुलाकात की, जिनके विचारों ने उनकी सोच को और मज़बूत किया। लेकिन सबसे बड़ी प्रेरणा उन्हें अपने ही आसपास मिली — गाँव के बुज़ुर्ग किसान, जिनमें से कई की उम्र सौ साल से भी ज़्यादा थी। नेक राम ने जगह-जगह जाकर इन बुज़ुर्ग किसानों से परंपरागत खेती के तरीकों को सीखा। उनमें से अधिकांश ‘नौ-अनाज’ पद्धति का पालन करते थे, यानी एक ही खेत में नौ तरह के अनाजों को मिलाकर उगाना। यह परंपरागत ज्ञान, जो रसायनिक खेती के दौर में लगभग लुप्त होने की कगार पर था, नेक राम के लिए एक ख़ज़ाना साबित हुआ।
संघर्ष: जब रास्ता आसान नहीं था
रसायनमुक्त खेती की ओर बढ़ना कहने में जितना आसान लगता है, करने में उतना ही मुश्किल था। शुरुआती सालों में जब नेक राम ने रसायनिक खाद घटानी शुरू की, तो फसलों की पैदावार में गिरावट आई, जिससे घर का बजट डगमगाने लगा। आसपास के किसान उन्हें अजीब निगाहों से देखते थे और कहते थे कि यह आदमी पुराने ज़माने के तरीकों से खेती करके अपना नुकसान कर रहा है। गाँव में हर कोई नकदी फसलों की एकल खेती से तुरंत मुनाफ़ा कमा रहा था, और ऐसे में नौ तरह के अनाजों को एक ही खेत में उगाने की उनकी योजना लोगों को पागलपन जैसी लगती थी। लेकिन नेक राम ने इन तानों को अपने हौसले की ईंट बना लिया और धीरे-धीरे अपने प्रयोग जारी रखे।
दूसरा बड़ा संघर्ष था बीजों का। रसायनिक खेती के दौर में देसी और पारंपरिक बीज लगभग खत्म हो चुके थे, बाज़ार में सिर्फ संकर और संशोधित बीज मिलते थे। नौ-अनाज पद्धति के लिए उन्हें रागी (फिंगर मिलेट), कंगनी (फॉक्सटेल मिलेट), कोदो, सावा (बार्नयार्ड मिलेट), कुटकी (प्रोसो मिलेट), कुट्टू (बकव्हीट), ज्वार, बाजरा और देसी मक्का जैसे पारंपरिक अनाजों के बीज चाहिए थे, जो कहीं मिल नहीं रहे थे। इसके लिए उन्होंने दूर-दराज़ के गाँवों की खाक छानी और बुज़ुर्ग किसानों के पास से एक-एक दाना जुटाकर अपने बीज बैंक की नींव रखी। साल 2000 तक उन्होंने इन बाजरा किस्मों के देसी बीजों को विकसित और संरक्षित कर लिया था, जो विलुप्त होने के कगार पर थे। यह मेहनत इतनी लंबी और धैर्य भरी थी कि आज उसे याद करके भी लोगों को हैरानी होती है।
सफलता की रणनीति: नौ-अनाज पद्धति का जादू
नेक राम शर्मा की सफलता का मूलमंत्र है ‘नौ-अनाज’ यानी एक ही खेत में नौ तरह के अनाजों की सह-खेती, बिना किसी रसायन के। इस पद्धति में अनाज, दलहन, लतावाली फसलें, फलियाँ और सब्ज़ियाँ एक साथ उगाई जाती हैं, जिससे खेत की जैव-विविधता बढ़ती है और मिट्टी की सेहत अपने आप सुधरती है। अलग-अलग फसलें एक-दूसरे की पूरक होती हैं — दलहनी फसलें ज़मीन में नाइट्रोजन बढ़ाती हैं, जबकि घनी बुआई से खरपतवार अपने आप दब जाते हैं और कीटों का प्राकृतिक नियंत्रण हो जाता है। इस पद्धति से पानी की खपत में करीब 50 फ़ीसदी की कमी आती है और ज़मीन की उर्वरता लगातार बढ़ती रहती है। आज उनकी यही पद्धति देशभर के किसानों के लिए एक आदर्श मॉडल बन चुकी है।
देसी बीज बैंक: 40 स्वदेशी किस्मों का संरक्षण
नेक राम ने अपने खेत में देसी बीजों का एक समृद्ध बीज बैंक तैयार किया है, जिसमें करीब 40 स्वदेशी किस्में संरक्षित हैं। इनमें कागनी, कोदरा, सोख, ज्वार जैसे हिमाचल के पारंपरिक अनाज, देसी मक्का, जौ और दाल कोल्थी जैसी फसलें शामिल हैं, जो कभी इस क्षेत्र की पहचान थीं। वे इन बीजों को मुफ़्त में किसानों को बाँटते हैं और अब तक छह राज्यों के 10,000 से अधिक किसानों को देसी बीज दे चुके हैं। उनका मानना है कि बीज किसान की असली पूँजी है, और जब तक बीज देसी और स्थानीय रहेंगे, खेती किसान के हाथ में रहेगी। यही बीज बैंक आज हिमाचल के पहाड़ी किसानों के लिए आशा का केंद्र बना हुआ है।
प्राकृतिक कीट नियंत्रण: अनार के बाग का उदाहरण
नेक राम का अनार का बाग उनकी प्राकृतिक खेती की एक और जीवंत मिसाल है। उनका मानना है कि कीटों को मारना समाधान नहीं है, क्योंकि प्रकृति में कोई कीट बेवजह हानिकारक नहीं होता — ज़रूरत है उसे फसल से दूर रखने की सही रणनीति की। इसके लिए उन्होंने प्राकृतिक सामग्रियों से एक खास मिश्रण तैयार किया, जो कीटों को फसलों से दूर रखता है और फसल को पूरी तरह सुरक्षित रखता है। इस नए तरीके को अपनाने के बाद उनका अनार का बाग आज पूरी तरह कीट-मुक्त है। यह उदाहरण बताता है कि रसायनिक कीटनाशकों के बिना भी फसल सुरक्षा पूरी तरह संभव है, बस थोड़ी सूझबूझ और प्रयोगशीलता चाहिए।
ज्ञान बाँटना: हज़ारों किसानों को प्रेरणा
नेक राम शर्मा की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने अपनी सफलता को अपने तक सीमित नहीं रखा। वे पिछले दो दशकों से प्राकृतिक खेती के प्रचार में जुटे हैं और अब तक हिमाचल प्रदेश के करीब 20,000 किसानों को पारंपरिक नौ-अनाज खेती के लिए प्रेरित कर चुके हैं। वे किसानों को मुफ़्त बीज देने के साथ-साथ खेती की बारीकियाँ भी सिखाते हैं — कैसे मिट्टी तैयार करें, कैसे फसलों का मेल बैठाएँ और कैसे बिना रसायन के भी अच्छी पैदावार लें। उनका संदेश साफ है कि जैविक खेती को बढ़ावा दिया जाना चाहिए और बच्चों को स्कूल स्तर से ही इसकी शिक्षा मिलनी चाहिए। वर्ष 2023 को ‘अंतरराष्ट्रीय बाजरा वर्ष’ घोषित किए जाने के बाद उनकी मेहनत को और भी बड़ा मंच मिला, क्योंकि उनकी पूरी पद्धति मोटे अनाजों पर ही आधारित है।
पद्म श्री का क्षण: देश का सर्वोच्च सम्मान
26 जनवरी 2023 को जब पद्म पुरस्कारों की घोषणा हुई, तो हिमाचल प्रदेश से इस साल के एकमात्र पद्म श्री पुरस्कार के लिए नेक राम शर्मा का नाम चुना गया। 5 अप्रैल 2023 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें नई दिल्ली में पद्म श्री से सम्मानित किया — यह सम्मान उन्हें नौ अनाजों की परंपरागत फसल प्रणाली को पुनर्जीवित करने के लिए मिला। पुरस्कार लेते हुए नेक राम ने कहा कि कृषि क्षेत्र में उनके योगदान को राष्ट्रपति के हाथों मिली यह मान्यता उनके लिए एक अद्भुत अनुभव था, और यह उन्हें हिमाचल की परंपरागत फसल प्रणाली को बहाल करने के लिए और अधिक मेहनत करने की प्रेरणा देगा। पुरस्कार की घोषणा के बाद पूरे करसोग सहित पूरे राज्य में खुशी की लहर दौड़ गई। गणतंत्र दिवस के अवसर पर मंडी में शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने भी उन्हें सम्मानित किया। एक साधारण किसान का देश के चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान तक पहुँचना, यह साबित करता है कि मिट्टी से जुड़ी मेहनत कभी बेकार नहीं जाती।
युवाओं के लिए संदेश
नेक राम शर्मा का जीवन युवाओं के लिए एक खुली किताब है। उन्होंने सरकारी नौकरी न मिलने को अपनी हार नहीं बनने दिया, बल्कि उसे खेती में नया अवसर बना लिया। उनका कहना है कि खेती कोई मजबूरी का काम नहीं, बल्कि देश की सबसे बड़ी सेवा है — और अगर इसे विज्ञान, परंपरा और धैर्य के साथ किया जाए, तो यह सम्मान और समृद्धि दोनों दे सकती है। वे युवाओं से अपील करते हैं कि रसायनिक खेती के चकाचौंध से दूर रहें, अपनी मिट्टी और अपने देसी बीजों को पहचानें, और खेती को एक उद्यम के रूप में अपनाएँ। उनका मानना है कि आने वाले समय में जैविक और प्राकृतिक खेती ही किसानों का भविष्य है, और जो युवा आज इस दिशा में कदम बढ़ाएँगे, वे कल के अग्रणी किसान होंगे।
निष्कर्ष
नेक राम शर्मा की कहानी सिर्फ एक किसान की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि भारतीय कृषि की खोई हुई परंपरा के पुनरुत्थान की कहानी है। नौ-अनाज पद्धति से उन्होंने न सिर्फ अपनी बंजर होती ज़मीन को बचाया, बल्कि हज़ारों किसानों को एक ऐसा रास्ता दिखाया, जो सेहत, पर्यावरण और आर्थिक स्थिरता तीनों को साथ लेकर चलता है। पद्म श्री जैसे सम्मान से नवाज़ा जाना उनकी दशकों की मेहनत का उचित प्रतिफल है। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि असली तरक्की वह है, जो प्रकृति के साथ चलकर हासिल की जाए — और जब इरादे नेक हों, तो नाम भी नेक राम जैसा चमक उठता है।