Kisan Success Story: 700 देसी धानों की किस्में बचाने वाले ‘बीज ऋषि’ – नटाबर सरांगी की प्रेरणादायक कहानी
ओडिशा के कटक जिले के नियाली के पास नरिशू नाम के एक छोटे से गाँव में एक ऐसे किसान की कहानी जन्मी, जिसने अपनी ज़िंदगी के बुढ़ापे में खेती को ही नया अर्थ दे दिया। उनका नाम है नटाबर सरांगी। वे कोई बड़ी डिग्रीधारी कृषि वैज्ञानिक नहीं थे, न ही किसी कंपनी के मालिक थे, बल्कि एक साधारण स्कूल मास्टर थे, जिन्होंने रिटायरमेंट के बाद खेत संभाला। आज वे देश भर के हज़ारों किसानों के लिए जैविक खेती और देसी बीजों के संरक्षण की प्रेरणा हैं, और उनकी मेहनत से धान की लगभग 700 देसी किस्में बची हुई हैं। यह कहानी एक ज़हरीले कीटनाशक की बोतल से शुरू होती है और एक हरे-भरे आंदोलन पर खत्म होती है।
पृष्ठभूमि: गाँव के स्कूल मास्टर
नटाबर सरांगी का जन्म ओडिशा के एक साधारण किसान परिवार में हुआ था, और उन्होंने अपनी जवानी शिक्षक की नौकरी में बिताई। दशकों तक वे गाँव के स्कूल में बच्चों को पढ़ाते रहे, अनुशासन और ईमानदारी के लिए जाने जाते रहे, लेकिन खेती से उनका सीधा नाता उस समय तक खास नहीं था। घर की खेती उनके पिता और परिवार के अन्य सदस्य देखते थे, और नटाबर जी का मन पढ़ाई-लिखाई में ही लगा रहता था। नब्बे के दशक के मध्य में जब वे रिटायर हुए, तब तक उनके पिता नहीं रहे थे और खेत की ज़िम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर आ गई। उस समय देश में हरित क्रांति का असर चरम पर था, और कृषि अधिकारियों व व्यापारियों की सलाह पर उन्होंने भी आधुनिक खेती अपनाई — रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक और हाई-यील्ड वाली धान की किस्में। उन्हें लगता था कि यही खेती का सही और आधुनिक रास्ता है, और इसी से उनका खेत सबसे ज़्यादा उपज देगा।
वह मोड़ जिसने सब कुछ बदल दिया
फिर एक दिन वह हादसा हुआ, जिसने नटाबर जी की ज़िंदगी का रास्ता हमेशा के लिए बदल दिया। उनके खेत में धान की फसल पर टुंग्रो रोग लगा था, और सलाह मिली कि कार्बोफुरान नाम का कीटनाशक छिड़काव कर दिया जाए। उन्होंने 35 किलो कीटनाशक खरीदा, रेत में मिलाया और एक मज़दूर को छिड़काव के लिए लगाया। मज़दूर ने अभी कुछ ही ज़मीन पर छिड़काव किया था कि वह खेत में ही बेहोश होकर गिर पड़ा। नटाबर जी घबरा गए, क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं उसकी जान न चली जाए। उन्होंने तुरंत दूसरों की मदद से उसे सुरक्षित जगह पहुँचाया, पानी के छींटे मारे और उसे गर्म दूध पिलाया, जिसके बाद वह होश में आया। उस पल नटाबर जी ने महसूस किया कि जो ज़हर इंसान को इस तरह गिरा सकता है, वह खाने में कितना ज़हर घोल रहा होगा।
अगले दिन जब वे खेत पहुँचे तो जो नज़ारा उन्होंने देखा, उसने उनकी आँखें खोल दीं। जिस हिस्से में कीटनाशक छिड़का गया था, वहाँ केकड़े, घोंघे, केंचुए और साँप सब मरे पड़े थे। नटाबर जी ने सोचा कि जब यह रसायन मिट्टी को ज़िंदा रखने वाले इन छोटे जीवों को मार सकता है, तो हमारी थाली में आने वाले अनाज के साथ क्या करता होगा। उसी दिन उन्होंने फैसला कर लिया कि अब उनके खेत में कोई रसायन नहीं जाएगा। उन्होंने बचा हुआ सारा कीटनाशक ज़मीन में गड्ढा खोदकर दबा दिया और उसी दिन से जैविक खेती का रास्ता अपना लिया। यह फैसला उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ।
रसायनों से टूटा नाता, देसी बीजों से जुड़ा नाता
शुरुआत में नटाबर जी ने जैविक तरीकों से हाई-यील्ड वाली किस्में ही उगाईं, लेकिन फिर उनके बेटे राजेंद्र ने उन्हें देसी किस्मों की ओर ध्यान देने की सलाह दी। दिक्कत यह थी कि हरित क्रांति के दौर में ज़्यादातर देसी किस्में इलाके से लगभग खत्म हो चुकी थीं। नटाबर जी ने हार नहीं मानी और अपने सहयोगी जुबराज स्वाइन के साथ मिलकर गाँव-गाँव से देसी धान के बीज जुटाने लगे। साल 1998 में उनके पास सिर्फ पाँच किस्में थीं, 2000 में यह संख्या 40 हो गई और 2007 तक यह बढ़कर 305 किस्मों तक पहुँच गई। उन्होंने ‘वन स्ट्रॉ रेवोल्यूशन’ किताब से प्रेरणा लेकर जैविक विधियों को और मज़बूत किया, हरी खाद के लिए ढैंचा जैसी स्थानीय पौधों का इस्तेमाल किया और मिट्टी की सेहत पर सबसे ज़्यादा ध्यान दिया। कृषि अनुसंधान के अधिकारियों ने जब उनका खेत देखा तो वे भी हैरान रह गए, क्योंकि उनकी कुछ देसी किस्में एकड़ में 20 क्विंटल से ज़्यादा उपज दे रही थीं, जो रसायनिक खेती की हाई-यील्ड किस्मों से भी ज़्यादा थी।
सफलता की रणनीति
नटाबर सरांगी की सफलता किसी चमत्कार का नतीजा नहीं थी, बल्कि सोच-समझकर बनाई गई एक सरल और ईमानदार रणनीति का फल थी। उन्होंने हर कदम पर मिट्टी, बीज और किसान — इन तीनों को केंद्र में रखा। उनकी रणनीति के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
देसी बीज बैंक की स्थापना
नटाबर जी ने देश के दूर-दराज़ इलाकों से देसी धान के बीज इकट्ठा करने का अभियान चलाया। साल 2010 में उन्हें ग्लोबल ग्रीनग्रांट्स फंड से एक छोटा अनुदान मिला, जिससे उन्होंने लोगों को दूर-दराज़ के खेतों तक भेजकर बीज जुटाए। करीब 100 महिलाओं को उन्होंने इकट्ठे किए गए बीजों की सफाई और भंडारण के काम पर लगाया। धीरे-धीरे यह संग्रह लगभग 700 देसी धान की किस्मों तक पहुँच गया, जिनमें से 55 किस्में ऐसी थीं जो सूखा, बाढ़, जलभराव और कीट-रोग की स्थिति में भी अच्छी उपज देती थीं। यह बीज बैंक देश की कृषि जैव-विविधता की एक जीवित धरोहर बन गया।
बीज-वापसी का सरल मॉडल
नटाबर जी ने एक बेहद सरल और सुंदर मॉडल अपनाया, जिसे आज भी कई किसान याद करते हैं। वे हर साल अपना अतिरिक्त जैविक बीज स्थानीय किसानों को मुफ्त में दे देते थे, और बदले में किसान फसल के बाद 4 किलो बीज वापस लौटाने का वादा करते थे। इस मॉडल से हर साल सौ से ज़्यादा किसान उनसे बीज लेकर जाते और देसी किस्मों की खेती फैलती चली गई। न तो कोई बड़ा विज्ञापन था, न कोई सरकारी योजना का सहारा — सिर्फ भरोसे और ईमानदारी पर टिका यह आंदोलन ओडिशा के कई जिलों में फैल गया।
किसानों को प्रशिक्षण और केंद्र की स्थापना
बीज बाँटने के साथ-साथ नटाबर जी ने किसानों को जैविक खेती की पूरी विधि सिखाने का काम भी शुरू किया। उन्होंने समान विचार वाले किसानों के साथ मिलकर ‘राजेंद्र देसी चासा गबेसना केंद्र’ की स्थापना की, जिसे लोक समवाय प्रतिष्ठान नाम के ट्रस्ट के ज़रिए चलाया जाता है। इस केंद्र में अब तक 2000 से ज़्यादा किसानों को देसी बीज, जैविक खाद और प्राकृतिक कीटनाशकों के इस्तेमाल का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। इस काम को देखकर ओडिशा सरकार ने भी उनके साथ साझेदारी की, और 2025 में शुरू की गई ‘अमृत अन्न योजना’ उन्हीं की सोच से प्रेरित है, जिसके तहत पुरी के जगन्नाथ मंदिर में देसी किस्मों के जैविक चावल से ही भोग तैयार किया जाता है।
सफलता का पल: सम्मान और पहचान
नटाबर सरांगी के काम को धीरे-धीरे हर तरफ से पहचान मिलने लगी। उन्हें मनमोहन चौधरी स्मृति पुरस्कार और रबीराय ग्रीन शताब्दी पुरस्कार जैसे सम्मानों से नवाज़ा गया। ओडिशा सरकार ने उनकी जैविक खेती की उपलब्धियों को आधिकारिक रूप से सराहा और किसानों के प्रशिक्षण में उनके साथ साझेदारी की। देश के बड़े अखबारों और पत्रिकाओं ने उनकी कहानी छापी, और दूर-दूर से किसान उनका खेत देखने आने लगे। उनके शुभचिंतक उन्हें पद्म श्री जैसे राष्ट्रीय सम्मान के लिए भी प्रस्तावित कर रहे थे। एक रिटायर्ड स्कूल मास्टर, जिसने 60 की उम्र के बाद खेती शुरू की थी, वह लाखों किसानों के लिए जैविक खेती का चेहरा बन चुका था — इससे बड़ा सफलता का पल और क्या हो सकता है।
युवाओं के लिए संदेश
नटाबर सरांगी की कहानी युवाओं को एक बहुत ही साफ़ संदेश देती है कि बदलाव लाने के लिए न तो बड़ी उम्र की सीमा है और न ही बड़ी डिग्री की ज़रूरत। उन्होंने 60 साल की उम्र के बाद खेती शुरू की और साबित कर दिया कि सच्ची लगन और सही सोच से कोई भी क्षेत्र बदला जा सकता है। उनका दूसरा संदेश प्रकृति के सम्मान के बारे में है — उन्होंने दिखाया कि रसायनों से मिलने वाली थोड़ी-सी ज़्यादा उपज के लालच में हम अपनी मिट्टी, अपने बीज और अपने स्वास्थ्य को दाँव पर नहीं लगा सकते। युवाओं को उनकी कहानी से यह भी सीख मिलती है कि पुरानी देसी ज्ञान-परंपराओं में भी आधुनिक समस्याओं के समाधान छिपे हैं। अगर युवा खेती को विज्ञान, ईमानदारी और धैर्य के साथ अपनाएँ, तो खेती घाटे का सौदा नहीं, बल्कि सम्मान और समृद्धि का रास्ता बन सकती है।
निष्कर्ष
नटाबर सरांगी की कहानी सिर्फ एक किसान की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारी कृषि व्यवस्था के लिए एक आईना भी है। जिस दौर में हर कोई रसायनों और हाई-यील्ड किस्मों के पीछे भाग रहा था, उस दौर में उन्होंने मिट्टी की आवाज़ सुनी और देसी बीजों की रक्षा को अपना मिशन बना लिया। आज उनकी बदौलत धान की लगभग 700 देसी किस्में ज़िंदा हैं, हज़ारों किसान जैविक खेती कर रहे हैं और ओडिशा सरकार की योजनाएँ उनकी सोच से प्रेरित हैं। उनकी कहानी हमें याद दिलाती है कि असली प्रगति वह नहीं जो प्रकृति को नष्ट करे, बल्कि वह है जो प्रकृति के साथ मिलकर चले। नटाबर सरांगी ने साबित कर दिया कि एक साधारण शिक्षक भी खेत में खड़ा होकर देश की कृषि का भविष्य बदल सकता है।