Kisan Success Story: 100 देसी धान की बीज-रक्षक – Kamala Pujari की प्रेरणादायक कहानी
कहते हैं कि मिट्टी से जुड़ा इंसान कभी हार नहीं मानता। ओडिशा के कोरापुट जिले की कमला पुजारी ने इसी मिट्टी से वो कहानी लिखी, जिसे आज पूरा देश सलाम करता है। बिना किसी औपचारिक पढ़ाई-लिखाई के, केवल अपनी लगन और धरती से प्यार के बल पर उन्होंने सैकड़ों देसी धान की किस्मों को विलुप्त होने से बचाया। उनका नाम आज जैविक खेती और बीज-संरक्षण का पर्याय बन चुका है।
पाट्रापुट गांव की एक साधारण आदिवासी महिला
कमला पुजारी का जन्म ओडिशा के कोरापुट जिले के बैपारीगुड़ा ब्लॉक के पाट्रापुट गांव में एक गरीब आदिवासी परिवार में हुआ था। वे परोजा जनजाति से ताल्लुक रखती थीं और उनके पास स्कूली शिक्षा का कोई साधन नहीं था। बचपन से ही वे खेतों में मां-बाप के साथ काम करती थीं, जहां उन्होंने धान की पारंपरिक किस्मों को बेहद करीब से देखा और समझा। गांव की इस बेटी के मन में एक ही सपना पलता रहा — अपने गांव की मिट्टी, बीज और खेती की असली विरासत को बचाकर रखना।
खेती उनकी रोजी-रोटी ही नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा स्कूल थी। उन्होंने देखा कि कैसे उनके पूर्वज बिना रासायनिक खाद और कीटनाशक के, सिर्फ देसी बीजों और प्राकृतिक तरीकों से भरपूर फसल उगाते थे। यही देसी बीज धीरे-धीरे बाजार के महंगे हाइब्रिड बीजों और रसायनों की आंधी में गायब होते जा रहे थे, और यह बात उनके दिल को सालती थी।
एक प्रशिक्षण ने बदल दी सोच की दिशा
कमला जी के जीवन का निर्णायक मोड़ तब आया, जब वे जयपोर स्थित एम.एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन के संपर्क में आईं। इस फाउंडेशन ने उन्हें खेती और बीज-संरक्षण की बुनियादी तकनीकें सिखाईं। यह प्रशिक्षण उनके लिए किसी क्रांति से कम नहीं था — अब वे सिर्फ खेती नहीं कर रही थीं, बल्कि एक मिशन पर थीं। फाउंडेशन के सहयोग से उन्होंने गांव की ही कुछ महिलाओं को साथ लेकर एक बीज बैंक की नींव भी रखी।
इसी के साथ उन्होंने एक बड़ा फैसला लिया — गांव के किसानों को रासायनिक खाद छोड़ने और जैविक खेती अपनाने के लिए प्रेरित करना। यह कोई आसान काम नहीं था, क्योंकि उस दौर में रासायनिक खाद को ही ज्यादा उपज की गारंटी माना जाता था। लेकिन कमला जी को अपनी मिट्टी और देसी बीजों पर पूरा भरोसा था, और उन्होंने गांव-गांव घर-घर जाकर लोगों को समझाना शुरू किया।
संघर्ष भरा सफर: जब कोई सुनने को तैयार नहीं था
शुरुआती दिनों में कमला जी की बातें सुनने वाला कोई नहीं था। गांव के कई किसान उन पर हंसते और कहते कि बिना रासायनिक खाद के खेत में कुछ नहीं उगेगा। कुछ लोगों ने तो उनकी मेहनत को पागलपन तक बता दिया। लेकिन कमला जी ने अपने खेत में खुद करके दिखाया — देसी बीज, जैविक खाद और पारंपरिक तरीकों से उन्होंने अच्छी फसल उगाई, जिसे देखकर धीरे-धीरे लोगों का नजरिया बदलने लगा।
वे गांव के संगठन बनाकर सभाएं करतीं, महिलाओं को साथ जोड़तीं और जैविक खेती के फायदों को सरल भाषा में समझातीं। उन्होंने लोगों को बताया कि रासायनिक खाद भले ही तुरंत ज्यादा उपज दे, लेकिन लंबे समय में यह मिट्टी को बंजर और पानी को जहरीला बनाती है। उनकी यह मेहनत आखिरकार रंग लाई और पाट्रापुट गांव के साथ-साथ आसपास के कई गांवों के किसानों ने रासायनिक खाद का इस्तेमाल छोड़ दिया।
सफलता की रणनीति: बीज बचाओ, मिट्टी बचाओ
कमला पुजारी की सफलता के पीछे कोई जादू नहीं, बल्कि एक साफ और मजबूत रणनीति थी — देसी बीजों का संरक्षण, जैविक तरीकों से खेती, और गांव की महिलाओं को इस आंदोलन से जोड़ना। उन्होंने अपने खेत को ही एक जीवित प्रयोगशाला बना दिया, जहां हर किस्म के बीज की पैदावार, सहनशीलता और स्वाद को परखा जाता था।
1. सैकड़ों देसी धान की किस्मों का संरक्षण
कमला जी ने अपने जीवन में धान की 100 से ज्यादा देसी किस्मों को संरक्षित किया, जिनमें तिली, महाकांता, फूला और घांटिया जैसी दुर्लभ किस्में भी शामिल थीं। इतना ही नहीं, उन्होंने हल्दी, तिल्ली, काला जीरा जैसे कई अन्य बीजों की दुर्लभ किस्मों को भी बचाकर रखा। उनके इस काम से बीजों की जैव-विविधता बची और आने वाली पीढ़ियों के लिए खेती की एक अमूल्य विरासत सुरक्षित हो गई।
2. घर-घर जाकर जैविक खेती का प्रचार
उन्होंने अपने गांव की महिलाओं के साथ मिलकर एक समूह बनाया और गांव-गांव घर-घर जाकर जैविक खेती के बारे में जागरूकता फैलाई। वे किसानों को समझातीं कि गोबर की खाद, हरी खाद और फसल-चक्र जैसे तरीकों से मिट्टी की सेहत बनी रहती है और खर्च भी कम आता है। उनके इस जमीनी अभियान का नतीजा यह हुआ कि कई गांवों में रासायनिक खाद का इस्तेमाल लगभग बंद हो गया।
3. बीज बैंक की स्थापना
एम.एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन के सहयोग से उन्होंने अपने गांव में बीज बैंक स्थापित किया, जहां देसी बीजों को सुरक्षित रखा जाता और जरूरतमंद किसानों को बीज उपलब्ध कराए जाते। यह बीज बैंक आज भी जैविक खेती के आंदोलन की एक मजबूत कड़ी है, क्योंकि इससे किसान महंगे बाजारू बीजों की गुलामी से आजाद हुए और अपनी पसंद के बीज खुद चुनने लगे।
सम्मान का सफर: जोहानिसबर्ग से पद्म श्री तक
कमला जी की मेहनत की गूंज सिर्फ गांव तक ही सीमित नहीं रही। 2002 में वे जोहानिसबर्ग गईं, जहां उन्हें अर्थ समिट के दौरान संयुक्त राष्ट्र की ओर से इक्वेटर इनिशिएटिव पुरस्कार मिला — यह उनके काम की अंतरराष्ट्रीय पहचान थी। इसके बाद 2004 में ओडिशा सरकार ने उन्हें ‘सर्वश्रेष्ठ महिला किसान’ पुरस्कार से सम्मानित किया, और 2018 में वे राज्य योजना बोर्ड की सदस्य भी बनाई गईं।
सबसे बड़ा सम्मान 2019 में आया, जब तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें देश के चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म श्री’ से नवाजा। उनकी मेहनत का ही नतीजा था कि 2012 में संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने कोरापुट को ‘वैश्विक महत्वपूर्ण कृषि विरासत स्थल’ घोषित किया। 20 जुलाई 2024 को उन्होंने 74 साल की उम्र में अंतिम सांस ली, लेकिन उनकी विरासत आज भी खेतों में लहलहाती फसलों में जिंदा है।
युवाओं के लिए संदेश
कमला पुजारी की कहानी हर युवा किसान के लिए एक सीख है — शिक्षा की कमी कभी सफलता की राह में बाधा नहीं बनती, अगर दिल में अपने काम के प्रति सच्ची लगन हो। उन्होंने कभी बड़े निवेश, सरकारी नौकरी या विदेश जाने का सपना नहीं देखा; उन्होंने तो बस अपनी मिट्टी से प्यार किया और उसी मिट्टी को बचाने में जिंदगी लगा दी। आज जब युवा रोजगार के लिए शहरों की ओर भाग रहे हैं, तो कमला जी सिखाती हैं कि गांव की मिट्टी में भी उतनी ही संभावनाएं छिपी हैं, बस जरूरत है उन्हें पहचानने की।
उनका सबसे बड़ा संदेश यही है कि प्रकृति के साथ मिलकर काम करो, उसके खिलाफ नहीं। रासायनिक खेती से तुरंत फायदा दिख सकता है, लेकिन जैविक खेती ही मिट्टी, पानी और सेहत का सच्चा साथी है। देसी बीज हमारी धरोहर हैं — इन्हें बचाना सिर्फ खेती नहीं, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा की सेवा है।
निष्कर्ष
कमला पुजारी की कहानी साबित करती है कि बदलाव लाने के लिए न तो डिग्री चाहिए, न ही बड़ी पूंजी — चाहिए तो सिर्फ सच्ची नीयत और धरती के प्रति अटूट प्रेम। एक गरीब आदिवासी महिला ने अपनी जिंदगी में जो कर दिखाया, वो लाखों किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। सैकड़ों देसी धान की किस्में आज उनकी वजह से जीवित हैं, और उनके जैविक खेती के आंदोलन से आज भी कई गांवों की मिट्टी सांस ले रही है। कमला पुजारी चली गईं, लेकिन उनके बीज अब हर खेत में उग रहे हैं।