Kisan Success Story: दसवीं के बाद छोड़ा स्कूल, मिट्टी को बनाया डिग्री और जीता पद्म श्री – हुकुमचंद पाटीदार की प्रेरणादायक कहानी
राजस्थान के झालावाड़ जिले के छोटे से गांव मानपुरा में रहने वाले हुकुमचंद पाटीदार की कहानी उन हज़ारों युवाओं के लिए उम्मीद की किरण है, जो सोचते हैं कि बिना बड़ी डिग्री के ज़िंदगी में बड़ा मुकाम हासिल नहीं किया जा सकता। दसवीं कक्षा के बाद स्कूल छोड़कर खेतों में काम करने उतरे हुकुमचंद ने आज न केवल जैविक खेती से करोड़ों की आमदनी का साम्राज्य खड़ा किया है, बल्कि भारत सरकार से पद्म श्री सम्मान भी पाया है। उनकी फसलें आज जापान, जर्मनी और स्विट्ज़रलैंड जैसे देशों तक पहुँचती हैं, और उनकी जैविक उपज को बाज़ार में सामान्य फसल से चालीस प्रतिशत तक ज़्यादा दाम मिलता है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि साल 2022 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद यानी आईसीएआर की चौदह सदस्यीय राष्ट्रीय समिति में वही एकमात्र ऐसे सदस्य चुने गए, जिनके पास कोई शैक्षणिक डिग्री नहीं थी। आइए जानते हैं उस किसान की पूरी कहानी, जिसने मिट्टी को ही अपनी सबसे बड़ी डिग्री बना लिया।
मानपुरा के साधारण किसान की असाधारण शुरुआत
हुकुमचंद पाटीदार का जन्म 1960 के आसपास राजस्थान के झालावाड़ जिले के मानपुरा गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनका लगाव किताबों से ज़्यादा खेतों की मिट्टी से था, इसलिए दसवीं कक्षा के बाद उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और पूरी तरह खेती में उतर गए। उस दौर में गांव के ज़्यादातर किसान रासायनिक खाद और कीटनाशकों के सहारे खेती करते थे, और हुकुमचंद भी शुरुआत में उसी राह पर चले। लेकिन कुछ ही सालों में उन्होंने अपनी आंखों से देखा कि ज़मीन की पैदावार लगातार घट रही है, मिट्टी की सेहत बिगड़ रही है और फसलें धीरे-धीरे ज़हरीली होती जा रही हैं। यह अहसास उनके दिल में गहराई तक बैठ गया, और उन्होंने ठान लिया कि खेती का यह तरीका न तो धरती के लिए सही है और न ही खाने वालों के लिए।
वह फैसला जिसने सब कुछ बदल दिया
साल 2005 में हुकुमचंद ने एक ऐसा फैसला लिया, जिसे सुनकर उनके परिवार और दोस्त हैरान रह गए। उन्होंने अपने 25 हेक्टेयर के खेत में पूरी तरह जैविक खेती शुरू करने का ऐलान कर दिया, और अपने फार्म का नाम रखा — स्वामी विवेकानंद जैविक कृषि अनुसंधान केंद्र। परिवार वालों को डर था कि बिना रसायनों के फसल बर्बाद हो जाएगी और सालों की मेहनत मिट्टी में मिल जाएगी, इसलिए सबने इस प्रयोग का जमकर विरोध किया। दोस्तों ने भी कहा कि यह पागलपन है और नुकसान तय है, लेकिन हुकुमचंद अपने फैसले पर अडिग रहे। उन्होंने कहा कि रासायनिक खेती से लोगों की सेहत और पर्यावरण दोनों को नुकसान पहुँच रहा है, और वह इस ज़हरीले चक्र का हिस्सा नहीं बनना चाहते।
विरोध और मुश्किलों का दौर
जैविक खेती की शुरुआत के शुरुआती साल हुकुमचंद के लिए किसी कड़ी परीक्षा से कम नहीं थे। रसायन छोड़ते ही पहले एक-दो साल फसल की पैदावार में गिरावट आई, क्योंकि ज़मीन को ज़हरीले रसायनों की लत छुड़ाने में वक्त लगता है। आस-पड़ोस के किसान ताने मारते थे कि देखो, डिग्री भी नहीं और अब खेती भी डुबो दी, और कई रिश्तेदारों ने तो उनसे दूरी तक बना ली थी। आर्थिक तंगी का दौर भी आया, क्योंकि जैविक उपज को बेचने के लिए सही बाज़ार और भरोसेमंद खरीदार ढूंढना आसान नहीं था। लेकिन हुकुमचंद ने हार नहीं मानी — वह रोज़ खेत में प्रयोग करते, प्राचीन ग्रंथों और पांडुलिपियों में लिखी पारंपरिक खेती की विधियों को पढ़ते और धीरे-धीरे मिट्टी को फिर से जीवित करने में जुटे रहे।
सफलता की रणनीति
हुकुमचंद की कामयाबी कोई चमत्कार नहीं, बल्कि सोची-समझी रणनीति और धैर्य का नतीजा है। उन्होंने जैविक खेती को सिर्फ रसायन छोड़ने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि मिट्टी, फसल और बाज़ार — तीनों मोर्चों पर एक साथ काम किया। आइए समझते हैं उनकी रणनीति के तीन सबसे अहम पहलू, जिन्होंने उन्हें साधारण किसान से जैविक खेती के राष्ट्रीय गुरु बना दिया।
पंचगव्य और देसी खाद का जादू
हुकुमचंद हमेशा से पंचगव्य यानी गाय से मिलने वाले पांच तत्वों — दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर — के इस्तेमाल की वकालत करते आए हैं। उनका मानना है कि यही देसी तत्व मिट्टी को पोषण देते हैं और फसलों को अंदर से मज़बूत बनाते हैं, जबकि रासायनिक खाद सिर्फ ऊपरी हरियाली दिखाती है। उन्होंने अपने खेत में गोबर और गोमूत्र आधारित खादों का पूरा तंत्र विकसित किया, जिससे मिट्टी में सूक्ष्म जीवों और केंचुओं की संख्या बढ़ने लगी। धीरे-धीरे उनकी ज़मीन इतनी उपजाऊ हो गई कि बिना किसी रसायन के भी फसलें लहलहाने लगीं। आज वह राजस्थान के चारों कृषि विश्वविद्यालयों में जैविक खेती के सलाहकार हैं और हज़ारों किसानों को यही पंचगव्य तकनीक सिखा रहे हैं।
जीवित मिट्टी और कार्बन चक्र की समझ
हुकुमचंद की दूसरी बड़ी रणनीति थी मिट्टी के कार्बन चक्र को बेहतर बनाना, यानी ज़मीन में जैविक पदार्थ की मात्रा बढ़ाकर उसे फिर से जीवित करना। उन्होंने खेत में फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उन्हें मिट्टी में ही मिलाना शुरू किया, जिससे ज़मीन की नमी और उर्वरता दोनों बढ़ीं। इसका असर यह हुआ कि मिट्टी में लाभदायक सूक्ष्म जीवों और कीटों के लिए अनुकूल माहौल बन गया, जो प्राकृतिक रूप से ज़मीन को उपजाऊ बनाते हैं। वह कहते हैं कि स्वस्थ मिट्टी ही स्वस्थ फसल की नींव है, और इसी सोच ने उनके खेत को रसायन-मुक्त प्रयोगशाला में बदल दिया। उनके इस वैज्ञानिक नज़रिए को देखकर ही आईसीएआर ने उन्हें राष्ट्रीय पाठ्यक्रम समिति में जगह दी।
फसल विविधता और निर्यात की दूरदर्शी सोच
सिर्फ खेती करना ही काफी नहीं था, हुकुमचंद ने शुरुआत से ही यह सोचा कि उनकी जैविक उपज को सही दाम कहाँ मिलेगा। उन्होंने संतरे, दालें, प्याज़, धनिया और सौंफ जैसी ऐसी फसलों पर ध्यान दिया, जिनकी विदेशी बाज़ारों में भारी मांग है। आज उनकी उपज का बड़ा हिस्सा यूरोप को निर्यात होता है, और जापान, जर्मनी व स्विट्ज़रलैंड जैसे देशों तक उनका जैविक अनाज पहुँचता है। जैविक होने की वजह से उनकी फसल को सामान्य फसल से चालीस प्रतिशत तक ज़्यादा दाम मिलता है, और यही कारण है कि उनका फार्म आज करोड़ों की आमदनी वाला उद्यम बन चुका है। उन्होंने साबित कर दिया कि भारतीय किसान सिर्फ अनाज ही नहीं, बल्कि वैश्विक ब्रांड भी बना सकता है।
सफलता का वह क्षण
साल 2018 में जब भारत सरकार ने हुकुमचंद पाटीदार को पद्म श्री से सम्मानित किया, तो पूरे मानपुरा गांव की आंखें नम हो गईं। वही लोग जो कभी उनके फैसले का मज़ाक उड़ाते थे, अब गर्व से कहते हैं कि यह सम्मान उनके गांव का है। इस सम्मान से भी बड़ी उनकी उपलब्धि यह रही कि उन्होंने अपने पूरे गांव मानपुरा को रसायन-मुक्त खेती वाला गांव बना दिया, जहाँ आज हर किसान जैविक तरीके से खेती करता है। साल 2022 में तो कमाल ही हो गया — आईसीएआर की चौदह सदस्यीय राष्ट्रीय समिति में उन्हें एकमात्र गैर-शैक्षणिक सदस्य चुना गया, जो देश के कृषि विश्वविद्यालयों और स्कूलों के लिए जैविक खेती का पाठ्यक्रम तैयार करेगी। दसवीं के बाद स्कूल छोड़ने वाला किसान आज वैज्ञानिकों और प्रोफेसरों के साथ बैठकर देश की कृषि शिक्षा की नींव रख रहा है — इससे बड़ी सफलता भला क्या होगी।
युवाओं के लिए संदेश
हुकुमचंद पाटीदार युवाओं से हमेशा एक ही बात कहते हैं — डिग्री ज़रूरी है, लेकिन डिग्री न होने का मतलब यह नहीं कि आप बड़े सपने नहीं देख सकते। उनका कहना है कि उन्होंने जो कुछ भी सीखा, वह प्राचीन ग्रंथों, पांडुलिपियों और सबसे बढ़कर खेत की मिट्टी से सीखा, न कि किसी कॉलेज की क्लास से। वह युवाओं को सलाह देते हैं कि खेती को मजबूरी नहीं, बल्कि एक आधुनिक और सम्मानजनक व्यवसाय की तरह देखें, जिसमें विज्ञान, प्रयोग और धैर्य तीनों की ज़रूरत होती है। उनका मानना है कि अगर युवा रसायन-मुक्त खेती को अपनाएं, तो न सिर्फ उनकी आमदनी बढ़ेगी, बल्कि देश की धरती और लोगों की सेहत भी बचेगी। उनका जीवन इस बात का जीता-जागता सबूत है कि सही दिशा में की गई मेहनत एक दिन पूरी दुनिया का ध्यान खींच ही लेती है।
निष्कर्ष
हुकुमचंद पाटीदार की कहानी हमें सिखाती है कि बदलाव की शुरुआत हमेशा अकेले और विरोध के बीच ही होती है। साल 2005 में जब उन्होंने रसायन छोड़ने का फैसला किया था, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि एक दिन यही किसान पद्म श्री पाएगा और देश की कृषि नीति बनाने वाली समिति में बैठेगा। आज उनका गांव मानपुरा जैविक खेती का मॉडल बन चुका है, उनकी फसलें विदेशों तक जाती हैं और हज़ारों किसान उनसे प्रेरणा लेकर रसायन-मुक्त खेती की ओर बढ़ रहे हैं। यह कहानी हर उस व्यक्ति के लिए है, जो हालात से हार मानने के बजाय मिट्टी से जुड़कर आसमान छूना चाहता है।