Kisan Success Story: खेत की मिट्टी से खींची सेहत, धान-गेहूं में घोल दिया ‘धूप का विटामिन’ – चिंतला वेंकट रेड्डी की प्रेरणादायक कहानी

Kisan Success Story: खेत की मिट्टी से खींची सेहत, धान-गेहूं में घोल दिया ‘धूप का विटामिन’ – चिंतला वेंकट रेड्डी की प्रेरणादायक कहानी

विज्ञान हमेशा लैब के चारदीवारी में ही नहीं जन्मता, कभी-कभी वह खेत की मिट्टी से भी उपजता है। तेलंगाना के सिकंदराबाद के अलवाल इलाके में रहने वाले किसान चिंतला वेंकट रेड्डी इसी बात की जीती-जागती मिसाल हैं। उन्होंने धान और गेहूं में विटामिन D पैदा करने की ऐसी प्राकृतिक तकनीक खोजी कि स्विट्ज़रलैंड के जिनेवा स्थित विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (WIPO) ने उन्हें इसका अंतरराष्ट्रीय पेटेंट दे दिया। यह कोई छोटी-मोटी उपलब्धि नहीं है, बल्कि दुनिया भर के वैज्ञानिकों के लिए भी सोचने पर मजबूर करने वाला काम है।

उनकी इस उपलब्धि की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह किसी रासायनिक प्रयोगशाला का कमाल नहीं, बल्कि खेत की मिट्टी, धूप और प्रकृति के साधारण नियमों का नतीजा है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में उनकी तारीफ की और कहा कि यह ‘लैब से लैंड तक’ विज्ञान पहुंचाने का शानदार उदाहरण है। आइए जानते हैं, 70 साल की उम्र में देश का गौरव बढ़ाने वाले इस किसान-वैज्ञानिक की कहानी।

कौन हैं चिंतला वेंकट रेड्डी?

चिंतला वेंकट रेड्डी तेलंगाना के सिकंदराबाद के अलवाल इलाके के रहने वाले हैं और पेशे से किसान हैं। उनके पास कोई बड़ी विज्ञान की डिग्री नहीं है, न ही किसी आधुनिक अनुसंधान संस्थान से प्रशिक्षण। लेकिन उनके पास वह गुण है जो अक्सर किताबों में नहीं मिलता — प्रकृति को बारीकी से देखने और उससे सवाल पूछने की आदत। वह दशकों से अपने खेत में फसल उगाते आ रहे हैं और धीरे-धीरे खेती को एक विज्ञान के रूप में समझने लगे।

उनकी खेती की खासियत यह रही कि वह रसायनों पर निर्भर होने के बजाय प्राकृतिक तरीकों पर भरोसा करते थे। वह अपनी फसलों को ड्रिप सिंचाई के ज़रिए प्राकृतिक पोषक तत्व खिलाते थे और फसल की सेहत पर लगातार नज़र रखते थे। इसी लगन ने उन्हें एक ऐसे प्रयोगशील किसान में बदल दिया, जिसकी खोजें बाद में कृषि जगत के लिए चर्चा का विषय बन गईं। उनकी इस प्रकृति-प्रेमी सोच के लिए सरकार ने उन्हें फरवरी 2020 में पद्म श्री सम्मान से नवाज़ा।

मोड़: डॉक्टर दोस्तों की एक बात

इस कहानी का असली मोड़ साल 2017 के आसपास आया, जब उनकी अपने डॉक्टर दोस्तों से स्वास्थ्य पर बातचीत हुई। दोस्तों ने बताया कि भारत में अधिकतर लोगों में विटामिन D की कमी है और इससे हड्डियों की कमज़ोरी, जोड़ों का दर्द, थकान और कमज़ोर इम्युनिटी जैसी समस्याएं होती हैं। सुनकर वेंकट रेड्डी सोच में पड़ गए, लेकिन उनका अंदाज़ आम लोगों से अलग था।

उन्होंने कहा, जब इंसान धूप से विटामिन D बना सकता है, तो पौधे क्यों नहीं? अगर पौधे धूप में प्रकाश संश्लेषण कर सकते हैं, तो वह भी इस विटामिन को अपने अंदर पैदा कर सकते हैं। इसी एक सवाल ने उनके मन में जड़ पकड़ ली और उन्होंने ठान लिया कि चावल और गेहूं जैसी आम फसलों में ही विटामिन D पैदा करके दिखाएंगे। उनके लिए यह सवाल था कि जो पोषक तत्व प्रकृति में मुफ्त मिल सकता है, उसके लिए लोग दवाइयों पर क्यों निर्भर रहें।

संघर्ष: दो साल के प्रयोग और असफलताएं

सवाल पूछना आसान था, लेकिन जवाब खोजना कठिन था। वेंकट रेड्डी ने अपने खेत को ही प्रयोगशाला बना लिया और करीब दो साल तक लगातार प्रयोग किए। हर फसल चक्र में वह पोषक तत्वों का अनुपात बदलते, प्रक्रिया में छोटे-छोटे बदलाव करते और नतीजों की जांच करवाते। कई बार प्रयोग नाकाम हुए, कई बार फसल की बढ़त प्रभावित हुई, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

इस दौरान उन्हें आसपास के लोगों की हंसी और शक भी झेलना पड़ा, क्योंकि एक किसान का दावा था कि वह धान और गेहूं में विटामिन D पैदा करेगा — यह बात सुनने में किसी सपने जैसी लगती थी। लेकिन वेंकट रेड्डी का मानना था कि प्रकृति के नियमों को धैर्य से समझा जाए, तो वह रहस्य भी खोलती है। आखिरकार दो साल की मेहनत रंग लाई और उनकी तकनीक से उगे चावल और गेहूं के दानों में विटामिन D की मौजूदगी प्रयोगशाला जांच में साबित हो गई।

सफलता की रणनीति

वेंकट रेड्डी की सफलता रातों-रात नहीं आई, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का परिणाम थी। उनकी तकनीक की बुनियाद पूरी तरह प्राकृतिक थी, जिसमें कोई हानिकारक रसायन नहीं था। आइए समझते हैं उनकी रणनीति के अहम पहलू।

1. प्राकृतिक पोषक तत्व और ड्रिप सिंचाई

वेंकट रेड्डी अपनी फसलों को ड्रिप सिंचाई के माध्यम से प्राकृतिक पोषक तत्व देते थे। इससे पौधों को संतुलित और नियंत्रित मात्रा में पोषण मिलता था, जिससे फसल की सेहत अंदर से मज़बूत होती थी। उनका मानना था कि अगर पौधे की जड़ से लेकर पत्ती तक सही पोषण मिले, तो वह असाधारण क्षमता दिखा सकते हैं। यही बुनियाद बाद में विटामिन D के प्रयोग की सफलता की नींव बनी।

2. पहले विटामिन A और C पर काम

विटामिन D पर प्रयोग शुरू करने से पहले वेंकट रेड्डी ने चावल में विटामिन A और C बढ़ाने पर काम किया था। इससे उन्हें फसल में पोषक तत्व बढ़ाने की प्रक्रिया को समझने में मदद मिली। यह अनुभव उन्हें यह भरोसा देता था कि पौधों के अंदर पोषक प्रोफाइल बदला जा सकता है। इसी आधार पर उन्होंने विटामिन D वाले प्रयोग को आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ाया।

3. प्रक्रिया और पोषक तत्वों में बदलाव

उनकी तकनीक का रहस्य फसल की पोषण-प्रक्रिया में किए गए सूक्ष्म बदलावों में था। उन्होंने पोषक तत्वों के संयोजन को इस तरह बदला कि पौधे धूप से विटामिन D को अपने दानों में संचित कर सकें। वह खुद कहते हैं कि यह एक सरल तकनीक है और पूरी तरह प्राकृतिक है। दो साल तक इस प्रक्रिया को परखते-परखते उन्होंने आखिरकार वह संतुलन पा ही लिया जिसकी तलाश थी।

4. प्रयोगशाला जांच से पुष्टि

जब प्रयोग सफल हुए, तो वेंकट रेड्डी ने नतीजों को प्रयोगशाला में जांच करवाई। जांच में चावल में प्रति 100 ग्राम 102 से 141 अंतरराष्ट्रीय इकाई (IU) और गेहूं में इससे भी अधिक मात्रा में विटामिन D पाया गया। सामान्य या पारंपरिक चावल-गेहूं में विटामिन D लगभग नहीं पाया जाता, इसलिए यह नतीजा क्रांतिकारी था। इसी पुष्टि के बाद उन्होंने अगस्त 2019 में राष्ट्रीय पेटेंट के लिए आवेदन किया और 1 अगस्त 2020 को अंतरराष्ट्रीय पेटेंट का आवेदन दाखिल किया।

सफलता का क्षण

11 फरवरी 2021 को वेंकट रेड्डी को जिनेवा स्थित विश्व बौद्धिक संपदा संगठन से विटामिन D युक्त चावल और गेहूं की किस्मों का अंतरराष्ट्रीय पेटेंट मिल गया। यह पल उनके लिए ही नहीं, पूरे देश के किसानों के लिए गर्व का क्षण था। एक खेत का किसान, जिसने कभी बड़ी प्रयोगशाला नहीं देखी, उसने दुनिया भर के वैज्ञानिकों के सामने अपनी खोज का डंका बजा दिया।

इसी महीने, फरवरी 2021 में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम के 21वें संस्करण में उनकी चर्चा की। प्रधानमंत्री ने कहा कि विटामिन D की कमी की समस्या सुनकर वेंकट रेड्डी ने गेहूं और चावल की ऐसी किस्में विकसित कीं जिनमें विटामिन D है, और यह ‘लैब से लैंड तक’ विज्ञान पहुंचाने का उदाहरण है। प्रधानमंत्री के मुंह से तारीफ सुनना वेंकट रेड्डी के लिए जीवन का सबसे भावुक क्षण था। आज उनकी तकनीक दुनिया भर के किसानों के लिए उम्मीद की किरण है।

युवाओं के लिए संदेश

वेंकट रेड्डी की कहानी युवाओं को एक साफ संदेश देती है — बड़ी खोज के लिए बड़ी डिग्री या बड़ी प्रयोगशाला ज़रूरी नहीं, ज़रूरी है जिज्ञासा और धैर्य। वह खुद कहते हैं कि उनका सवाल बड़ा सीधा था: जो चीज़ प्रकृति में मुफ्त मिल सकती है, उसके लिए दवाइयों पर निर्भर क्यों रहें? यह सवाल किसी भी युवा के मन में आ सकता है, बस ज़रूरत है उस पर काम करने की हिम्मत की।

उनकी कहानी यह भी सिखाती है कि असफलता से डरना नहीं चाहिए। दो साल तक के असफल प्रयोगों ने भी उन्हें रोक नहीं पाया, क्योंकि उनका लक्ष्य साफ था। युवा अगर खेती को पुराना और थका हुआ काम समझकर उससे दूर भागते हैं, तो उन्हें वेंकट रेड्डी को देखना चाहिए — एक किसान ने खेत में रहकर वह कर दिखाया जो बड़ी-बड़ी कंपनियों के अनुसंधान केंद्र भी नहीं कर पाए।

निष्कर्ष

चिंतला वेंकट रेड्डी की कहानी सिर्फ एक किसान की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह सोचने के तरीके की कहानी है। उन्होंने साबित किया कि धूप, मिट्टी और प्रकृति के नियमों को समझने वाला किसान भी दुनिया को बदल सकता है। विटामिन D से भरपूर चावल और गेहूं की उनकी खोज आने वाले वर्षों में करोड़ों लोगों की सेहत सुधार सकती है।

उनकी यात्रा हर उस भारतीय के लिए प्रेरणा है, जो सोचता है कि नवाचार सिर्फ महानगरों और प्रयोगशालाओं में होता है। कभी-कभी क्रांति एक खेत से शुरू होती है, और उसके नायक होते हैं वेंकट रेड्डी जैसे किसान, जिनकी जिज्ञासा आसमान से भी ऊंची होती है।

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