UPSC Success Story: टेढ़े टखने वाले लड़के से IAS अफसर और पैरा-बैडमिंटन वर्ल्ड चैंपियन तक – सुहास यतिराज की प्रेरणादायक कहानी

UPSC Success Story: टेढ़े टखने वाले लड़के से IAS अफसर और पैरा-बैडमिंटन वर्ल्ड चैंपियन तक – सुहास यतिराज की प्रेरणादायक कहानी

कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं जो एक बार में ही दो-दो मिथक तोड़ देती हैं। सुहास ललिनकेरे यतिराज की कहानी ठीक वैसी ही है — उन्होंने साबित कर दिया कि दिव्यांगता प्रतिभा की राह में दीवार नहीं बन सकती, और यह भी कि किताबें और खेल का मैदान एक साथ चल सकते हैं। कर्नाटक के हासन जिले में जन्मे सुहास बाएं टखने में जन्मजात विकृति के साथ पैदा हुए थे, जिसकी वजह से उनकी चाल-ढाल आम बच्चों से अलग थी। लेकिन उन्होंने कभी इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। पहले ही प्रयास में UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2006 में सफल होकर वे उत्तर प्रदेश कैडर के IAS अधिकारी बने, और फिर पैरा-बैडमिंटन में टोक्यो और पेरिस पैरालिंपिक में रजत पदक जीतकर दुनिया भर में भारत का नाम रौशन किया। अगर आप भी IAS बनने का सपना देखते हैं, तो पहले अपनी पात्रता UPSC Eligibility Calculator से जरूर जांच लें, क्योंकि सही तैयारी की शुरुआत हमेशा सही जानकारी से होती है।

बचपन और शुरुआती संघर्ष

सुहास यतिराज का जन्म 2 जुलाई 1983 को कर्नाटक के हासन जिले में हुआ था। जन्म से ही उनके बाएं टखने में विकृति थी, जिसके कारण उनके लिए चलना-फिरना और दौड़ना-भागना आम बच्चों जैसा आसान नहीं था। गाँव और स्कूल में कई बच्चे उन्हें चिढ़ाते थे, और समाज की नजरों में वे “अलग” थे। लेकिन उनके पिता का भरोसा हमेशा उनके साथ था — पिता मानते थे कि उनका बेटा किसी से कम नहीं है। इसी भरोसे ने सुहास को टूटने नहीं दिया और उन्होंने पढ़ाई को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया। हासन के पास दुड्डा में शुरुआती पढ़ाई के बाद वे शिवमोगा के डीवीएस इंडिपेंडेंट कॉलेज गए, जहाँ वे पढ़ाई में लगातार अव्वल रहे और हर परीक्षा में खुद को साबित करते गए।

पिता का सपना और UPSC का फैसला

सुहास बचपन से ही मेधावी छात्र थे और उन्होंने एनआईटी सुरथकल से कंप्यूटर इंजीनियरिंग की डिग्री 2004 में हासिल की। इसके बाद वे SAP Labs में सॉफ्टवेयर इंजीनियर बने और बेंगलुरु, बैंकॉक और जर्मनी में काम किया। करियर शानदार चल रहा था, लेकिन उनके पिता का एक सपना था — बेटे को IAS अधिकारी के रूप में देखना। साल 2005 में पिता का निधन हो गया, और यह घटना सुहास के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ बन गई। पिता की आखिरी इच्छा को पूरा करने के लिए उन्होंने नौकरी के साथ-साथ सिविल सेवा की तैयारी शुरू कर दी। और फिर कमाल हो गया — पहले ही प्रयास में उन्होंने UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2006 पास कर ली और 2007 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के IAS अधिकारी बन गए।

दोहरी ज़िम्मेदारी का संघर्ष

IAS बनने के बाद असली परीक्षा शुरू हुई — प्रशासनिक कर्तव्यों के साथ अपने बचपन के प्यार बैडमिंटन को जिंदा रखना। सुहास स्कूल के दिनों से बैडमिंटन खेलते थे और मसूरी स्थित सिविल सेवा अकादमी में भी यह उनका पसंदीदा शौक था। सहकर्मियों ने उनके खेल को देखकर सुझाव दिया कि वे इसे पेशेवर रूप से अपनाएं, और उनकी पत्नी रितु ने भी उनका हौसला बढ़ाया। साल 2012 के आसपास उन्होंने पैरा-बैडमिंटन को गंभीरता से लेना शुरू किया। दिनभर जिला प्रशासन की जिम्मेदारियाँ निभाने के बाद वे रात 8:30 से 12 बजे तक रोजाना प्रैक्टिस करते थे। नींद कम मिलती थी, थकान ज्यादा होती थी — लेकिन उनका जुनून इन सबसे कहीं ज्यादा था।

सफलता की रणनीति

समय का अनुशासन

सुहास की सबसे बड़ी ताकत उनका समय प्रबंधन था। दिन में वे पूर्ण समर्पण से प्रशासनिक काम करते थे — चाहे आज़मगढ़ के डीएम के रूप में पीएम जनधन योजना का क्रियान्वयन हो या बाद में नोएडा और प्रयागराज जैसे बड़े जिलों की जिम्मेदारी। रात को वे खिलाड़ी बन जाते थे। उन्होंने कभी “समय नहीं है” को बहाना नहीं बनाया, बल्कि दिन के 24 घंटों को दो करियर में बाँटकर दिखा दिया कि अनुशासन से सब कुछ संभव है। यही अनुशासन उन्हें IAS की कुर्सी और खेल के मैदान — दोनों जगह सफल बनाता गया।

कमजोरी को ताकत बनाना

जन्मजात टखने की विकृति को सुहास ने कभी शर्म का विषय नहीं माना। बल्कि उनका मानना था कि इसी विकृति ने उन्हें ज्यादा सक्रिय रहने और खेलों से जुड़ने के लिए प्रेरित किया। पैरा-बैडमिंटन की SL4 कैटेगरी में उन्होंने अपनी शारीरिक सीमा को स्वीकार किया, उसके अनुसार खेल की शैली विकसित की और आक्रामक खेल से दुनिया के शीर्ष खिलाड़ियों को चुनौती दी। उन्होंने साबित किया कि कमजोरी वही होती है जिसे हम मान लेते हैं — और ताकत वही, जिसे हम गढ़ लेते हैं।

लगातार सीखना और धैर्य

2015-16 में पेशेवर पैरा-बैडमिंटन में उतरने के बाद सुहास ने धीरे-धीरे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। उन्होंने लगातार टूर्नामेंट खेले, कई खिताब जीते और 2016 एशियाई पैरा-बैडमिंटन चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया — वे वैश्विक स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व कर पदक जीतने वाले पहले सेवारत भारतीय नौकरशाह बने। हर हार से उन्होंने कुछ नया सीखा और हर जीत के बाद और कड़ी मेहनत की। धैर्य और निरंतरता ही उनके खेल और प्रशासन — दोनों की नींव रही।

सफलता का पल

सुहास यतिराज के करियर का सबसे चमकदार पल आया टोक्यो पैरालिंपिक 2020 में, जहाँ उन्होंने SL4 पुरुष एकल में रजत पदक जीता। फाइनल में वे फ्रांस के लुकास मज़ूर से हारे, लेकिन पूरे देश ने उनके इस कारनामे का जश्न मनाया और दिल्ली एयरपोर्ट पर उनका भव्य स्वागत हुआ। इसके बाद उन्होंने हांगझोउ एशियाई पैरा खेल 2022 में स्वर्ण पदक जीता और 2024 विश्व चैंपियनशिप में भी स्वर्ण अपने नाम किया। पेरिस पैरालिंपिक 2024 में उन्होंने फिर रजत पदक जीता। वे भारत के एकमात्र IAS अधिकारी हैं जिन्हें पैरालिंपिक पदक और अर्जुन पुरस्कार दोनों मिले हैं — एक ऐसी उपलब्धि जो शायद ही कोई दोहरा पाए।

युवाओं के लिए संदेश

सुहास यतिराज का जीवन दर्शन बहुत सरल है — “खेल आपको खुद पर विजय पाने में मदद करते हैं।” वे युवाओं से कहते हैं कि पढ़ाई और खेल को एक-दूसरे का दुश्मन न समझें; दोनों को साथ लेकर चला जा सकता है, बस जरूरत है अनुशासन और संतुलन की। उनका मानना है कि अगर मैं कर सकता हूँ, तो कोई भी कर सकता है। दिव्यांगता, गरीबी या असफलता — कोई भी परिस्थिति इतनी बड़ी नहीं होती कि इंसान के हौसले से बड़ी हो। जरूरत है तो बस एक स्पष्ट लक्ष्य, रोज की ईमानदार मेहनत और हार न मानने वाले जज्बे की।

निष्कर्ष

सुहास यतिराज की कहानी हमें सिखाती है कि जिंदगी में कोई भी बाधा अंतिम नहीं होती। जन्मजात विकृति वाले एक लड़के ने पहले इंजीनियर, फिर IAS अधिकारी और फिर पैरालिंपिक पदक विजेता बनकर दिखा दिया कि सपने देखने की कोई सीमा नहीं होती। आज वे उत्तर प्रदेश सरकार में युवा कल्याण विभाग के सचिव और महानिदेशक के रूप में सेवा दे रहे हैं और साथ ही विश्व स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। उनकी कहानी हर उस युवा के लिए प्रेरणा है जो कठिनाइयों के सामने हार मानने की सोचता है — क्योंकि असली जीत हालात से नहीं, हौसले से मिलती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *