Kisan Success Story: दिल्ली यूनिवर्सिटी की डिग्री छोड़ खेत में उतरे, 80 हज़ार किसानों के गुरु बने – भारत भूषण त्यागी की प्रेरणादायक कहानी

Kisan Success Story: दिल्ली यूनिवर्सिटी की डिग्री छोड़ खेत में उतरे, 80 हज़ार किसानों के गुरु बने – भारत भूषण त्यागी की प्रेरणादायक कहानी

दिल्ली यूनिवर्सिटी से साइंस ग्रेजुएट एक युवक, जिसके सामने नौकरी और शहरी जीवन के सारे दरवाजे खुले थे, उसने उन सबको पीछे छोड़कर गांव की मिट्टी से दोस्ती कर ली। बुलंदशहर के बीहटा गांव के रहने वाले भारत भूषण त्यागी ने 1997 में वो फैसला लिया, जिसे उस समय के हिसाब से पागलपन कहा जाता था — रासायनिक खेती छोड़कर पूरी तरह जैविक खेती की ओर मुड़ना। लोग हंसे, रिश्तेदारों ने समझाया, लेकिन आज वही फैसला उन्हें देश के 80 हज़ार से ज़्यादा किसानों का गुरु बना चुका है। उनकी गिनती देश के सबसे प्रगतिशील किसानों में होती है, और 2019 में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें कृषि के क्षेत्र में पद्म श्री से सम्मानित किया।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

भारत भूषण त्यागी का जन्म 1954 में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के बीहटा गांव में एक खेतीबाड़ी वाले परिवार में हुआ था। बचपन से ही खेत-खलिहान उनकी दुनिया थे, और किसान परिवार के संघर्षों को उन्होंने बेहद करीब से देखा था। लेकिन पढ़ाई-लिखाई में भी उनका मन लगा, और गांव से निकलकर उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से साइंस में स्नातक की डिग्री हासिल की। उस दौर में दिल्ली से डिग्री लेकर लौटना गांव के लिए एक बड़ी बात थी, और सभी को उम्मीद थी कि भारत भूषण किसी अच्छी सरकारी नौकरी में लगेंगे। लेकिन विज्ञान की पढ़ाई ने उन्हें कुछ और ही सोचने पर मजबूर कर दिया — उन्होंने रसायनों और खेती के बीच का गहरा रिश्ता समझ लिया था, और मन ही मन तय कर लिया था कि वे खेत में वापस जाकर कुछ अलग करेंगे। पिता की खेती को आगे बढ़ाने की इच्छा के साथ वे गांव लौट आए।

बदलाव का निर्णायक क्षण

1976 के आसपास जब भारत भूषण ने खेती में कदम रखा, तब हरित क्रांति की लहर अपने चरम पर थी। हर तरफ रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का शोर था, और ज़्यादा उपज के नाम पर ज़मीन को ज़हर पिलाया जा रहा था। उन्होंने देखा कि रसायनों से शुरुआती पैदावार तो बढ़ती है, लेकिन लागत दिन-ब-दिन बढ़ती जाती है और मिट्टी की सेहत बिगड़ती जाती है। किसान बीज, खाद और दवाओं के लिए बाज़ार पर पूरी तरह निर्भर होता जा रहा था, और मुनाफा बिचौलियों की जेब में जा रहा था। इसी को देखकर 1997 में उन्होंने एक बड़ा और साहसिक फैसला लिया — वे रासायनिक खेती को पूरी तरह छोड़कर जैविक खेती की राह पर चल पड़े। उन्होंने महसूस किया कि प्रकृति के साथ काम करना ही टिकाऊ और लाभदायक रास्ता है, और उसी दिन से उनकी असली यात्रा शुरू हुई।

संघर्ष का दौर

जैविक खेती की शुरुआत आसान बिल्कुल नहीं थी। पहले कुछ सालों में उपज घटी, और आसपास के किसानों ने उनकी हंसी उड़ाई कि डिग्रीधारी बाबू खेती नहीं कर पाएंगे। रासायनिक खेती के आदि हो चुके खेतों की मिट्टी को फिर से जीवंत करने में समय लगा, और धैर्य की इस परीक्षा में कई बार टूटने का मन हुआ। लेकिन भारत भूषण ने हार नहीं मानी; उन्होंने प्रयोगशाला की तरह अपने खेत को इस्तेमाल किया, हर फसल के साथ नए तरीके आज़माए और परिणाम दर्ज किए। धीरे-धीरे मिट्टी की सेहत सुधरने लगी, कीटों से लड़ने वाले प्राकृतिक तरीके काम करने लगे, और लागत इतनी कम हो गई कि कम उपज पर भी मुनाफा रासायनिक खेती से ज़्यादा होने लगा। 1998 से उन्होंने जैविक खेती पर शोध को एक सुनियोजित रूप दिया, और इसी शोध से ‘सामक’ (सह-अस्तित्व मूलक आवर्तशील कृषि) जैसी समग्र खेती पद्धति का विकास हुआ।

सफलता की रणनीति

भारत भूषण त्यागी की सबसे बड़ी ताकत उनकी वैज्ञानिक सोच और प्रयोगधर्मिता रही है। उन्होंने खेती को सिर्फ मेहनत नहीं, बल्कि एक बुद्धिमान व्यवसाय की तरह देखा, और इसी सोच ने उन्हें बाकी किसानों से अलग खड़ा किया। आइए उनकी रणनीति के प्रमुख पहलुओं को एक-एक करके समझते हैं, क्योंकि इन्हीं में उनकी सफलता का असली राज छिपा है।

1. मल्टी-लेयर फार्मिंग का अनोखा मॉडल

भारत भूषण ने ‘आसमान में खाली पड़ी जगह’ का इस्तेमाल करने का सपना देखा था, और इसी से मल्टी-लेयर फार्मिंग का मॉडल जन्मा। एक ही खेत में उन्होंने पहली पंक्ति में मकाओ (मैक्सिकन सूर्यमुखी जैसी फसल) के पौधे लगाए, उसके बगल में केला, उसके साथ गन्ना और सबसे नीचे हल्दी की खेती शुरू की। मकाओ को छोड़कर बाकी तीनों फसलें साल में एक बार कटती हैं, लेकिन एक दशक में मकाओ के पौधों से अच्छी-खासी आमदनी होती है और पर्यावरण का संरक्षण भी खेती के साथ-साथ होता रहता है। एक ही ज़मीन से चार-चार स्तर की आमदनी — यह मॉडल आज देशभर के किसानों के लिए प्रेरणा बन चुका है।

2. मिश्रित और सहफसली खेती से तिगुनी कमाई

उनका कहना है कि अगर किसान कुछ बातों का ध्यान रखें, तो ‘खेती घाटे का सौदा है’ यह बात कहीं सुनाई ही नहीं देगी। मिश्रित और सहफसली खेती से वे सालाना एक एकड़ से तीन से चार लाख रुपये कमाते हैं। एक ही खेत में कई फसलों का संयोजन न सिर्फ ज़मीन की उर्वरता बढ़ाता है, बल्कि बाज़ार के उतार-चढ़ाव का जोखिम भी कम करता है — अगर एक फसल का दाम गिरा, तो दूसरी संभाल लेती है। यही विविधता उनकी आर्थिक मज़बूती की नींव बनी।

3. उत्पादन से बाज़ार तक का पूरा फॉर्मूला

भारत भूषण हमेशा कहते हैं कि किसान सिर्फ उत्पादन तक सिमट कर रह जाता है, और यही उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी है। उनके मुताबिक खेती में चार घटक अहम हैं — उत्पादन, प्रसंस्करण, प्रमाणीकरण और बाज़ारीकरण। जब तक किसान इन चारों को समझकर नहीं चलेगा, उसकी मेहनत की कमाई सस्ते में लुटती रहेगी। उन्होंने जैविक उत्पादों के प्रमाणीकरण और सीधे बाज़ार तक पहुंच पर ज़ोर दिया, ताकि बिचौलियों के बिना किसान को उपज का सही दाम मिल सके। इसी फॉर्मूले से उन्होंने साबित किया कि जैविक खेती से किसान नौकरी की तलाश किए बिना स्वावलंबी बन सकता है।

4. 80 हज़ार किसानों का गुरु बनना

अपनी सफलता को खुद तक सीमित न रखकर भारत भूषण ने बुलंदशहर में किसानों के लिए साप्ताहिक प्रशिक्षण सत्र शुरू किए। अब तक वे 80 हज़ार से ज़्यादा किसानों को जैविक खेती का प्रशिक्षण दे चुके हैं, और उनके फार्म पर मंत्री से लेकर शासन के अफसर तक जैविक खेती सीखने पहुंचते हैं। राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र, कृषि मंत्रालय और नाबार्ड जैसे संस्थानों के साथ काम करके उन्होंने अपने ज्ञान को संस्थागत रूप भी दिया। एक किसान से गुरु बनने की यह यात्रा ही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।

सफलता का क्षण

दशकों की मेहनत और त्याग का सबसे मीठा फल 2019 में मिला, जब राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भारत भूषण त्यागी को कृषि के क्षेत्र में देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री से सम्मानित किया। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें ‘प्रगतिशील किसान पुरस्कार’ से सम्मानित कर चुके थे, और उत्तर प्रदेश सरकार व केंद्र सरकार कई बार उनके काम की सराहना कर चुकी थी। पद्म श्री की घोषणा के बाद उन्होंने कहा था कि यह सम्मान उनके लिए एक ज़िम्मेदारी है, और जैविक खेती अपनाकर किसान गैर-जैविक खेती से ज़्यादा पैदावार और कई गुना ज़्यादा मूल्य पाकर स्वावलंबी बन सकते हैं। गांव के बाहर खेतों पर परिवार के साथ घर बनाकर प्रकृति की गोद में रहने वाला यह शख्स आज युवाओं के लिए किसी हीरो से कम नहीं है।

युवाओं के लिए संदेश

भारत भूषण त्यागी युवाओं से साफ शब्दों में कहते हैं कि खेती को घाटे का सौदा समझना सबसे बड़ी भूल है। उनका मानना है कि अगर उत्पादन से लेकर प्रसंस्करण, प्रमाणीकरण और बाज़ारीकरण तक की पूरी श्रृंखला को समझा जाए, तो किसान को नौकरी की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी — वह खुद स्वावलंबी बन जाएगा। वे युवाओं को सलाह देते हैं कि खेती को वैज्ञानिक नज़रिए से देखें, प्रकृति के साथ काम करें और रसायनों की गुलामी से बाहर निकलें। उनका अपना जीवन इसका जीता-जागता सबूत है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी की डिग्री के बाद भी खेत में उतरकर कोई देश के लाखों किसानों का गुरु बन सकता है। वे कहते हैं कि गांव और प्रकृति के रिश्ते को फिर से जोड़ना ही आने वाली पीढ़ी की सबसे बड़ी ज़रूरत है।

निष्कर्ष

भारत भूषण त्यागी की कहानी हमें सिखाती है कि सफलता का रास्ता भीड़ से अलग चलने वालों के लिए ही खुलता है। जिस समय सब रसायनों की ओर भाग रहे थे, उस समय उन्होंने प्रकृति की ओर कदम बढ़ाए — और आज प्रकृति ने उन्हें पद्म श्री जैसा सम्मान दिलाया। उनकी ‘सामक’ पद्धति, मल्टी-लेयर फार्मिंग का मॉडल और 80 हज़ार किसानों को दिया गया प्रशिक्षण यह साबित करता है कि एक व्यक्ति की सोच पूरे देश की खेती बदल सकती है। बुलंदशहर के बीहटा गांव से शुरू हुई यह यात्रा आज पूरे भारत के किसानों के लिए उम्मीद की किरण है। सच ही कहा गया है — मिट्टी से जुड़ा इंसान कभी हारता नहीं, वह तो सोना उगाता है।

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