UPSC Success Story: दिव्यांगता को बनाया सबसे बड़ी ताकत, चौथे प्रयास में बनीं UPSC टॉपर – इरा सिंघल की प्रेरणादायक कहानी

UPSC Success Story: दिव्यांगता को बनाया सबसे बड़ी ताकत, चौथे प्रयास में बनीं UPSC टॉपर – इरा सिंघल की प्रेरणादायक कहानी

दुनिया अक्सर हमें यह बता देती है कि क्या संभव है और क्या नहीं। लेकिन कभी-कभी एक शख्सियत ऐसी निकलकर आती है, जो इन सारी परिभाषाओं को तोड़कर रख देती है। इरा सिंघल भी उन्हीं में से एक हैं — एक ऐसी लड़की, जिसे उसकी दिव्यांगता के कारण सरकारी नौकरी देने से इनकार कर दिया गया था, और जो चार साल की कानूनी लड़ाई के बाद UPSC में ऑल इंडिया रैंक 1 लाकर सबका मुंह बंद कर चुकी हैं। उनकी कहानी सिर्फ सफलता की नहीं, बल्कि अड़ियल इरादों और असंभव को संभव बनाने की कहानी है।

बचपन और दिव्यांगता के बीच की ज़िंदगी

इरा सिंघल का जन्म 1983 में मेरठ में हुआ था और उनका बचपन दिल्ली में बीता। उन्हें बचपन से ही स्कोलियोसिस नामक एक रीढ़ की बीमारी है, जिसमें रीढ़ की हड्डी टेढ़ी हो जाती है और हाथों की हरकत सीमित हो जाती है। उनकी दिव्यांगता का प्रतिशत 62 है, यानी वे शारीरिक रूप से बहुत सीमित स्थितियों में जीवन जीती थीं। लेकिन उनके माता-पिता ने कभी भी उनकी इस स्थिति को उनके सपनों के आड़े नहीं आने दिया। घर का माहौल ऐसा था कि इरा को कभी यह महसूस ही नहीं हुआ कि वे किसी से कम हैं।

पढ़ाई में इरा बचपन से ही बेहद तेज़ थीं। उन्होंने दिल्ली के नेताजी सुभाष इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (NSIT) से कंप्यूटर इंजीनियरिंग में बीई किया और फिर दिल्ली विश्वविद्यालय के फैकल्टी ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज (FMS) से मार्केटिंग और फाइनेंस में MBA की डिग्री हासिल की। यह उपलब्धियां ही अपने आप में बड़ी थीं, लेकिन इरा ने जो राह चुनी थी, वह तो इनसे कहीं आगे जाने वाली थी। उनकी शिक्षा ने उन्हें सिर्फ डिग्री नहीं दी, बल्कि यह विश्वास दिया कि मेहनत और लगन से कोई भी मंज़िल पाई जा सकती है।

कॉर्पोरेट करियर छोड़कर सिविल सेवा का सपना

पढ़ाई पूरी करने के बाद इरा ने कैडबरी इंडिया में स्ट्रैटेजी मैनेजर के तौर पर काम किया और कोका-कोला कंपनी में मार्केटिंग इंटर्न भी रहीं। उन्होंने एक साल तक स्पेनिश भाषा भी पढ़ाई। कॉर्पोरेट जीवन में अच्छा पैकेज और आरामदायक नौकरी थी, लेकिन इरा के दिल में कहीं न कहीं यह सवाल उठता था कि क्या यह काम समाज के लिए कुछ कर रहा है। मोटे वेतन के बावजूद उन्हें लगता था कि उनका काम सीधे तौर पर लोगों की ज़िंदगी नहीं बदल रहा।

यहीं से उनके मन में सिविल सेवा की ओर कदम बढ़ाने का विचार आया। उन्होंने ठान लिया कि वे एक ऐसी नौकरी करेंगी, जहां वे समाज के कमज़ोर वर्गों के लिए वास्तव में कुछ कर सकें। दिव्यांगता के बावजूद उन्होंने कोटा या आरक्षण का लाभ कभी नहीं लिया — हर बार उन्होंने जनरल कैटेगरी से ही परीक्षा दी। यह फैसला ही उनकी शख्सियत की सबसे बड़ी पहचान बन गया कि वे किसी भी तरह की छूट नहीं चाहती थीं, वे सिर्फ बराबरी का मौका चाहती थीं।

परीक्षा पास की, पर पोस्टिंग से इनकार — सबसे बड़ी ठोकर

इरा ने 2010, 2011 और 2013 में UPSC सिविल सेवा परीक्षा पास की और तीनों ही बार उन्हें भारतीय राजस्व सेवा (IRS) में जगह मिली। लेकिन यहां उनके साथ कुछ ऐसा हुआ जो शायद ही किसी और के साथ हुआ हो। राजस्व विभाग ने उन्हें पोस्टिंग देने से इनकार कर दिया, क्योंकि अधिकारियों का कहना था कि वे “धक्का देने, खींचने और उठाने” में असमर्थ हैं। सोचिए, एक शख्स जो देश की सबसे कठिन परीक्षा पास कर चुका था, उसे सिर्फ उसकी शारीरिक स्थिति के कारण नौकरी से वंचित कर दिया गया।

यह किसी के लिए भी टूट जाने वाला पल था, लेकिन इरा ने टूटने की बजाय लड़ने का फैसला किया। उन्होंने 2012 में केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) में मामला दायर किया और चार साल तक कानूनी लड़ाई लड़ी। आखिरकार न्याय उनके पक्ष में आया और दिसंबर 2014 में उन्हें पोस्टिंग मिली। इस बीच उन्होंने अपनी तैयारी भी नहीं छोड़ी थी और 2014 की परीक्षा (जिसका परिणाम जुलाई 2015 में आया) में उन्होंने ऑल इंडिया रैंक 1 हासिल कर ली। पूरे देश में यह खबर गूंजी कि पहली बार कोई दिव्यांग महिला जनरल कैटेगरी में UPSC टॉपर बनी हैं।

सफलता की रणनीति

इरा की तैयारी की सबसे खास बात यह थी कि उन्होंने कभी भी हार को आखिरी नहीं माना। हर प्रयास के बाद वे अपनी गलतियों का विश्लेषण करतीं और अगली बार और बेहतर तैयारी के साथ उतरतीं। उन्होंने सिलेबस के हर छोटे-बड़े विषय को गहराई से समझने पर ज़ोर दिया, रट्टा मारने की बजाय कॉन्सेप्ट क्लीयर करने पर ध्यान दिया। वे कहती हैं कि परीक्षा की तैयारी में असफलता मिले तो घबराना नहीं चाहिए, बल्कि बार-बार प्रयास करते रहना चाहिए और खुद पर विश्वास बनाए रखना चाहिए।

विषय की गहरी समझ

इरा का मानना था कि किसी भी विषय को ऊपर-ऊपर से पढ़ने से काम नहीं चलता। उन्होंने अपने चुने हुए वैकल्पिक विषय और सामान्य अध्ययन के हर टॉपिक को जड़ से समझा। वे नोट्स बनातीं, किताबों को दोहरातीं और अखबार पढ़ने को रोज़ की आदत बनातीं। उनकी यह आदत ही उन्हें मेन्स परीक्षा में गहरी और संतुलित उत्तर लिखने में मदद करती थी। यही कारण है कि 2025 में कुल 1082 अंक हासिल करके वे पहले स्थान पर रहीं।

लिखने का अभ्यास और निरंतरता

UPSC मेंस में उत्तर लेखन की कला सबसे अहम होती है, और इरा ने इस पर खूब मेहनत की। वे नियमित रूप से आंसर राइटिंग प्रैक्टिस करतीं और अपने उत्तरों को स्वयं मूल्यांकित करतीं। तैयारी के दौरान नौकरी और कानूनी लड़ाई के दबाव के बावजूद उन्होंने रोज़ पढ़ाई का समय निकाला। उनकी निरंतरता ही उनकी असली ताकत बनी, क्योंकि चार प्रयासों तक बने रहना आसान काम नहीं होता।

मानसिक मजबूती और सकारात्मक सोच

इरा की सबसे बड़ी रणनीति उनका मानसिक संतुलन था। पोस्टिंग से इनकार, लंबी कानूनी लड़ाई और सामाजिक पूर्वाग्रह — इन सबके बीच उन्होंने खुद को टूटने नहीं दिया। वे कहती हैं कि असफलता के पीछे ही सफलता की कुंजी छिपी होती है। उन्होंने अपनी दिव्यांगता को कभी बहाना नहीं बनाया, बल्कि उसे अपनी पहचान की ताकत बना लिया। यही सोच उन्हें हर बार परीक्षा हॉल में और भी मज़बूत बनाकर ले जाती थी।

वह पल जब AIR 1 बना

जुलाई 2015 में जब UPSC का परिणाम आया, तो इरा सिंघल ने ऑल इंडिया रैंक 1 हासिल की थी। कुल 2025 में से 1082 अंक पाकर उन्होंने न सिर्फ परीक्षा जीती, बल्कि एक इतिहास भी रचा — वे पहली दिव्यांग महिला थीं, जिन्होंने जनरल कैटेगरी में सिविल सेवा परीक्षा में पहला स्थान पाया। उस दिन की खुशी को शब्दों में बयां करना मुश्किल था। उनके परिवार की आंखों में आंसू थे, क्योंकि उन्होंने अपनी बेटी के संघर्ष को सबसे करीब से देखा था।

इसके बाद इरा भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में शामिल हुईं और उन्हें AGMUT कैडर मिला। दिल्ली के उत्तरी जिले के अलीपुर में एसडीएम के तौर पर अपनी पहली पोस्टिंग में उन्होंने एक साल के भीतर करीब 340 बाल और बंधुआ मज़दूरों को छुड़ाकर उनके परिवारों से मिलवाया। उन्होंने दिल्ली के किसी सरकारी दफ्तर में पहली बार किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति को पूर्णकालिक नौकरी भी दी। उनके इस काम ने साबित कर दिया कि उनकी जीत सिर्फ व्यक्तिगत नहीं थी, बल्कि समाज के लिए भी मायने रखती थी।

युवाओं के लिए इरा का संदेश

इरा सिंघल युवाओं से अक्सर कहती हैं कि अपनी कमज़ोरी को अपनी ताकत बनाओ। उनका कहना है कि तैयारी में विषय की गहराई, स्पष्ट कॉन्सेप्ट, सिलेबस के हर छोटे हिस्से पर ध्यान और लक्ष्य के प्रति समर्पण सबसे ज़रूरी है। असफलता मिलने पर निराश हुए बिना बार-बार प्रयास करो, लालची या अति आत्मविश्वासी मत बनो। और अगर एक राह बंद हो जाए, तो दूसरा विकल्प चुनने में भी कोई शर्म नहीं है।

वे यह भी कहती हैं कि दिव्यांगता या किसी भी तरह की कमी को अपने सपनों का हत्यारा मत बनने दो। उन्होंने खुद कभी दिव्यांग कोटा का इस्तेमाल नहीं किया और साबित किया कि बराबरी के मैदान पर भी जीता जा सकता है। आज वे भारत सरकार के दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग की ब्रांड एंबेसडर हैं और दिव्यांगों के अधिकारों तथा समावेशी शिक्षा के लिए आवाज़ उठाती हैं। उनका जीवन ही युवाओं के लिए सबसे बड़ा पाठ है।

निष्कर्ष

इरा सिंघल की कहानी हमें सिखाती है कि हालात चाहे जितने भी कठिन हों, इरादे अगर पक्के हों तो कोई दीवार बहुत ऊंची नहीं होती। परीक्षा पास करने के बाद पोस्टिंग से इनकार, चार साल की कानूनी लड़ाई और फिर टॉपर बनना — यह सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। लेकिन यह कहानी फिल्मी नहीं, बल्कि हकीकत है, और यही इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती है।

आज इरा सिंघल लाखों युवाओं, खासकर दिव्यांग युवाओं के लिए उम्मीद की किरण हैं। उनकी ज़िंदगी इस बात का जीता-जागता सबूत है कि सफलता का रास्ता कभी सीधा नहीं होता, लेकिन जो चलता रहता है, वह एक दिन मंज़िल ज़रूर पाता है। अगर आपके मन में भी कोई बड़ा सपना है, तो इरा की तरह हार मत मानिए — क्योंकि इतिहास वही रचते हैं, जो हारने से इनकार कर देते हैं।

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