Kisan Success Story: मिट्टी के घर से पद्म श्री तक – ‘बीज माता’ राहिबाई सोमा पोपरे की प्रेरणादायक कहानी

Kisan Success Story: मिट्टी के घर से पद्म श्री तक – ‘बीज माता’ राहिबाई सोमा पोपरे की प्रेरणादायक कहानी

भारत के गाँवों में ऐसी अनगिनत कहानियाँ बसी हुई हैं, जो कभी अखबारों की सुर्खियाँ नहीं बन पातीं, लेकिन जिनमें इंसानियत की सच्ची ताकत छिपी होती है। महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के अकोले तहसील के एक छोटे से गाँव कोंभालणे में रहने वाली राहिबाई सोमा पोपरे की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। वह महिला, जिसने कभी स्कूल का दरवाज़ा नहीं देखा, जो लिखना-पढ़ना भी नहीं जानती, आज देश की ‘बीज माता’ के नाम से जानी जाती है। देसी बीजों के संरक्षण के उनके असाधारण काम के लिए उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री से नवाज़ा गया, और उनकी यह यात्रा हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है जो मानता है कि बदलाव के लिए बड़ी डिग्री की नहीं, बल्कि बड़े हौसले की ज़रूरत होती है।

गरीबी में बीता बचपन और खेती से जुड़ाव

राहिबाई सोमा पोपरे का जन्म 1964 में महाराष्ट्र की महादेव कोली आदिवासी समुदाय में हुआ था। उनका गाँव कोंभालणे अहमदनगर जिले के अकोले तहसील में स्थित है, जहाँ जीवन की रफ्तार आज भी शहरों से कहीं धीमी और प्रकृति से गहरे जुड़ाव वाली है। परिवार की आर्थिक हालत इतनी कमज़ोर थी कि राहिबाई को स्कूल भेजना मुमकिन ही नहीं हो सका, और महज़ 10 साल की छोटी उम्र में ही उन्हें खेतों में मज़दूरी करने और गाय-भैंसों को चराने के काम में लगना पड़ा। परिवार की पूरी आजीविका खेती पर ही टिकी थी, इसलिए खेत-खलिहान ही उनकी पाठशाला बन गए, और प्रकृति ही उनकी सबसे बड़ी शिक्षिका। जब वह केवल 17 साल की थीं, तब उनकी शादी सोमा पोपरे से कर दी गई, जो खुद भी अनपढ़ थे। शादी के बाद भी जीवन का संघर्ष जरा भी कम नहीं हुआ, बल्कि परिवार की ज़िम्मेदारियों ने उनके कंधों पर और बोझ डाल दिया।

लेकिन इसी संघर्ष भरे जीवन में राहिबाई ने अनजाने में वह ज्ञान हासिल कर लिया, जो किसी किताब में नहीं मिलता। खेतों में काम करते-करते उन्होंने मिट्टी की खुशबू को पहचानना सीखा, फसलों के मौसम को समझा, और जंगली खाद्य संसाधनों व पारंपरिक संस्कृति के बारे में व्यावहारिक अनुभव से गहरा ज्ञान अर्जित किया। उन्हें पता था कि कौन-सा बीज किस मौसम में बोना चाहिए, कौन-सी जड़ी-बूटी किस बीमारी में काम आती है, और प्रकृति के साथ कैसे तालमेल बिठाया जाए। यह ज्ञान उन्हें किसी विश्वविद्यालय से नहीं, बल्कि दशकों की मेहनत और धरती के साथ रहने से मिला था। उस समय शायद उन्हें खुद भी अंदाज़ा नहीं था कि यही अनुभव एक दिन उन्हें देशभर में पहचान दिलाएगा।

वह मोड़ जिसने राह बदल दी

लगभग 25 साल पहले राहिबाई के जीवन में एक ऐसी घटना घटी, जिसने उनकी सोच और जीवन की दिशा ही बदल दी। उनका पोता अचानक बीमार पड़ गया, और राहिबाई को गहरा यकीन हो गया कि बाज़ार से खरीदी जा रही हाइब्रिड बीजों से उगाई गई सब्ज़ियों और अनाजों में मिले रसायनों और कीटनाशकों के ‘ज़हर’ ने ही बच्चे को बीमार किया है। उन्होंने अपने बेटे से आग्रह किया कि वह बाज़ार से ऐसी सब्ज़ियाँ और अनाज खरीदना बंद करे, और घर में ही देसी बीजों से शुद्ध भोजन उगाया जाए। यह एक साधारण दादी की चिंता भर नहीं थी; यह एक ऐसे आंदोलन की शुरुआत थी, जिसने बाद में हज़ारों किसानों की सोच बदल दी।

राहिबाई ने फैसला किया कि वह अपने बचपन के ज्ञान का इस्तेमाल करके देसी बीज तैयार करेंगी और उन्हें दूसरे किसानों तक पहुँचाएँगी। उन्होंने अपने खेतों से पुराने देसी बीज इकट्ठा करने शुरू किए — ऐसे बीज जो पीढ़ियों से उनके पूर्वज बोते आए थे, लेकिन जिन्हें हाइब्रिड बीजों के चक्कर में किसान भूलते जा रहे थे। यह काम आसान नहीं था, क्योंकि उस दौर में हर कोई ज़्यादा उपज के लालच में हाइब्रिड बीजों की ओर भाग रहा था, और देसी बीजों की बात करने वाले को पिछड़ा समझा जाता था। लेकिन राहिबाई अपने इरादे पर अडिग रहीं, और धीरे-धीरे उनके इस जुनून ने उन्हें ‘बीज माता’ की उपाधि दिला दी।

संघर्ष के दिन: अनपढ़ता, ताने और संसाधनों की कमी

राहिबाई के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा उनकी अनपढ़ता थी। लिखना-पढ़ना न जानने की वजह से उन्हें हर काम दोगुनी मेहनत से करना पड़ता था, और कई बार लोग उनकी बातों को गंभीरता से भी नहीं लेते थे। उनके पास न तो कोई प्रयोगशाला थी, न कोई सरकारी मदद, और न ही कोई बड़ा खेत — सिर्फ़ उनका छोटा-सा मिट्टी का घर था, जिसे उन्होंने बीज बैंक में बदल दिया। उसी घर में वह देसी बीजों को सहेजतीं, उन्हें सुखातीं, उनका वर्गीकरण करतीं और ज़रूरतमंद किसानों को बाँटतीं। पैसों की तंगी हमेशा बनी रहती थी, लेकिन उन्होंने कभी अपने मिशन को पैसों की कमी से रुकने नहीं दिया।

शुरुआती दिनों में गाँव के कई लोग उनकी हाइब्रिड-विरोधी मुहिम पर हँसते भी थे। लोगों का मानना था कि देसी बीजों से कम उपज मिलती है और आधुनिक खेती ही तरक्की का रास्ता है। लेकिन राहिबाई जानती थीं कि हाइब्रिड बीज किसानों को हर साल बाज़ार का गुलाम बनाते हैं, जबकि देसी बीज सिर्फ़ हवा और पानी से उगाए जा सकते हैं और किसान को आत्मनिर्भर बनाते हैं। धीरे-धीरे जब किसानों ने देखा कि देसी बीजों से उगाई फसलें कम खर्च में अच्छी और सेहतमंद उपज दे रही हैं, तो उनका नज़रिया बदलने लगा। बाद में BAIF डेवलपमेंट रिसर्च फाउंडेशन जैसे संगठनों का साथ मिलने से उनके काम को वैज्ञानिक मान्यता और नई गति मिली।

सफलता की रणनीति

1. देसी बीजों का संरक्षण और बीज बैंक

राहिबाई की सबसे बड़ी उपलब्धि है उनका बीज संरक्षण अभियान। उन्होंने अपने छोटे-से मिट्टी के घर में एक बीज बैंक स्थापित किया, जहाँ वह देसी बीजों को सहेजतीं और फसल विविधता व जंगली खाद्य संसाधनों को पुनर्जीवित करतीं। आज उन्होंने 17 फसलों की लगभग 43 देसी किस्मों — जिनमें धान, सेम, मोटे अनाज, दालें और तिलहन शामिल हैं — का संरक्षण और संवर्धन किया है, और एक जर्मप्लाज्म संरक्षण केंद्र स्थापित किया है। वह खुद गाँव-गाँव जाकर किसानों को देसी बीज देतीं और उन्हें बतातीं कि इन बीजों को कैसे सहेजा जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इनका लाभ उठा सकें। उनका यह काम सिर्फ़ बीज बचाने का नहीं था, बल्कि भारत की कृषि जैव-विविधता को बचाने का एक बड़ा अभियान था।

2. जैविक खेती की तकनीकें अपनाना

राहिबाई ने सिर्फ़ बीज ही नहीं सहेजे, बल्कि खेती के तरीकों को भी बदला। वह धान की SRI (सिस्टम ऑफ राइस इंटेंसिफिकेशन) पद्धति की विशेषज्ञ बन गईं, और उन्होंने टमाटर व सेम की खेती की उन्नत पद्धतियाँ विकसित कीं। उन्होंने वर्मीकम्पोस्टिंग, वर्मीवॉश और प्राकृतिक कीट-नाशकों जैसी जैविक खेती की तकनीकें अपनाईं और नर्सरी स्थापना के गुर भी सीखे। इन तकनीकों से किसानों का रासायनिक खादों और कीटनाशकों पर होने वाला खर्च कम हुआ, मिट्टी की सेहत सुधरी और फसलें ज़्यादा पौष्टिक बनीं। राहिबाई का मानना था कि धरती माँ को ज़हर देने से खेती नहीं, बल्कि खेती की बर्बादी होती है, और यही सोच उन्होंने हर किसान तक पहुँचाई।

3. हज़ारों किसानों को प्रशिक्षण

राहिबाई ने अपना ज्ञान अपने तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने अहमदनगर जिले के 3500 से ज़्यादा किसानों को प्रशिक्षित किया और उन्हें सहभागी बीज चयन की पद्धति सिखाई। वह किसानों के खेतों में जातीं, उन्हें देसी बीजों की पहचान करना सिखातीं और बतातीं कि कैसे अच्छी किस्म के बीजों का चयन करके अगली फसल के लिए रखा जाए। उनका यह काम सिर्फ़ महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहा; वह राज्य से बाहर भी देसी बीजों के संरक्षण के लिए यात्राएँ करती रहीं। इसके साथ ही उन्होंने घर के आँगन में बारहमासी किचन गार्डन और जल संचयन संरचनाएँ भी बनाईं, ताकि परिवार को सालभर ताज़ी और शुद्ध सब्ज़ियाँ मिल सकें।

सफलता का पल: पद्म श्री और कांस तक का सफर

राहिबाई के दशकों के समर्पण को आखिरकार वह मान्यता मिली, जिसकी वह हकदार थीं। जनवरी 2020 में उनके नाम की घोषणा देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री के लिए हुई, और 8 नवंबर 2021 को राष्ट्रपति भवन में तत्कालीन राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने उन्हें यह सम्मान प्रदान किया। वह पल किसी सपने से कम नहीं था — वह महिला जो कभी स्कूल नहीं गई, वह देश के सर्वोच्च मंच पर खड़ी थी, और पूरा देश उसे ‘बीज माता’ के नाम से सलाम कर रहा था। इस सम्मान ने न सिर्फ़ राहिबाई का, बल्कि भारत के हर उस छोटे किसान का मान बढ़ाया, जो अपनी मेहनत से धरती की सेवा करता है।

पद्म श्री से पहले भी राहिबाई की कहानी दुनिया तक पहुँच चुकी थी। उनकी हाइब्रिड-विरोधी बीज मुहिम पर बनी तीन मिनट की एक लघु फिल्म ने 72वें कांस फिल्म महोत्सव में नेस्प्रेसो टैलेंट्स 2019 के अंतरराष्ट्रीय वर्ग में तीसरा स्थान हासिल किया था। एक गाँव की अनपढ़ महिला की कहानी का कांस जैसे वैश्विक मंच तक पहुँचना इस बात का सबूत था कि सच्चा काम किसी भाषा या डिग्री का मोहताज नहीं होता। आज राहिबाई सिर्फ़ एक किसान नहीं, बल्कि जैविक खेती, कृषि जैव-विविधता और जंगली खाद्य संसाधनों के बारे में जागरूकता फैलाने वाली एक राष्ट्रीय प्रेरणा हैं।

युवाओं के लिए संदेश

राहिबाई सोमा पोपरे की कहानी आज के युवाओं के लिए एक ज़बरदस्त संदेश लेकर आती है। वह साबित करती हैं कि शिक्षा सिर्फ़ किताबों और डिग्रियों तक सीमित नहीं है; अनुभव, लगन और प्रकृति से जुड़ाव भी उतनी ही बड़ी शिक्षा है। अगर एक अनपढ़ आदिवासी महिला अपने अनुभव के बल पर देश का सर्वोच्च सम्मान हासिल कर सकती है, तो संसाधनों से भरे आज के युवा तो कुछ भी कर सकते हैं। ज़रूरत है सिर्फ़ अपने काम के प्रति सच्ची निष्ठा और हार न मानने वाले जज़्बे की।

उनका दूसरा बड़ा संदेश प्रकृति और परंपरा के सम्मान का है। आज जब युवा पीढ़ी आधुनिकता की दौड़ में अपनी जड़ों से कटती जा रही है, राहिबाई याद दिलाती हैं कि हमारी परंपरागत ज्ञान-प्रणाली में अपार शक्ति है। देसी बीज, जैविक खेती और प्रकृति के साथ तालमेल — यही वह रास्ता है जो किसान को आत्मनिर्भर बनाता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए धरती को स्वस्थ रखता है। राहिबाई का जीवन कहता है कि बड़ा बदलाव लाने के लिए बड़ी शुरुआत की ज़रूरत नहीं होती; एक छोटे-से मिट्टी के घर से भी क्रांति की शुरुआत हो सकती है।

निष्कर्ष

राहिबाई सोमा पोपरे की कहानी सिर्फ़ एक किसान की सफलता की कहानी नहीं है; यह भारत की मिट्टी, उसके बीजों और उसकी परंपराओं को बचाने की कहानी है। उन्होंने साबित कर दिया कि ज्ञान की कोई उम्र नहीं होती, कोई डिग्री नहीं होती — बस धरती से सच्चा लगाव होना चाहिए। आज जब वह ‘बीज माता’ के नाम से जानी जाती हैं, तो उनके पीछे 43 देसी किस्मों का संरक्षण, 3500 से ज़्यादा प्रशिक्षित किसान और एक पद्म श्री सम्मान खड़ा है। उनकी यह यात्रा हर भारतीय के लिए गर्व और प्रेरणा का स्रोत है, और यह याद दिलाती है कि सच्ची सफलता वही है, जो दूसरों के काम आए।

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