गांधीजी कहते थे कि साध्य के साथ साधन भी पवित्र होने चाहिए। क्या एक अधिकारी के लिए गलत साधन से सही लक्ष्य हासिल करना कभी उचित हो सकता है?
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सिफारिशित दृष्टिकोण
मेरा मानना है कि गलत साधन से मिला सही परिणाम भी लंबे समय में संस्था और समाज दोनों को नुकसान पहुंचाता है। अगर मैं झूठे आंकड़ों से कोई योजना सफल दिखाऊं तो आज प्रशंसा मिलेगी, लेकिन कल नीति गलत दिशा में जाएगी। अपवाद के तौर पर आपात स्थिति में नियमों में निहित लचीलापन इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन वह भी पारदर्शी और जवाबदेह तरीके से। साधन की पवित्रता ही लोकसेवा की नींव है।
क्यों?
यह दार्शनिक गहराई और व्यावहारिक प्रशासन के बीच संतुलन को परखता है।
मुख्य बिंदु
- साधन-साध्य की एकता
- दीर्घकालिक संस्थागत नुकसान की समझ
- आपात लचीलेपन और अनैतिकता में अंतर
- पारदर्शिता की शर्त
सामान्य गलतियाँ
- केवल सैद्धांतिक भाषण देना
- हर स्थिति में कठोरता दिखाना
संभावित फॉलो-अप प्रश्न
- कौटिल्य के अर्थशास्त्र में साधन के बारे में क्या कहा गया है?
- युद्ध जैसी आपात स्थिति में क्या सिद्धांत बदल जाते हैं?