UPSC Success Story: 9 साल की उम्र में लिया था कलेक्टर बनने का संकल्प – रोहिणी भाजिभाकरे की प्रेरणादायक कहानी
कहते हैं कि सपने वही देखता है जिसकी आँखों में हिम्मत होती है, और हिम्मत उसी में होती है जो मुश्किलों से लड़ना जानता है। महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के एक छोटे से गाँव उपलई में जन्मी रोहिणी रामदास भाजिभाकरे की कहानी बिल्कुल ऐसी ही है — एक मामूली किसान की बेटी, जिसने नौ साल की छोटी सी उम्र में जिला कलेक्टर बनने का सपना देखा और एक दिन सच में तमिलनाडु के सलेम जिले की पहली महिला कलेक्टर बनकर इतिहास रच दिया। साल 2008 बैच की IAS अधिकारी रोहिणी ने यह मुकाम न किसी महँगी कोचिंग से हासिल किया और न ही किसी बड़े शहर की सुविधाओं से — उनकी पूरी पढ़ाई सरकारी स्कूल और सरकारी कॉलेज में हुई। अगर आप भी सिविल सेवा का सपना देखते हैं तो शुरुआत से ही अपनी स्थिति साफ रखें — UPSC Eligibility Calculator से आप यह जान सकते हैं कि उम्र, प्रयास और श्रेणी के हिसाब से आप परीक्षा के लिए पात्र हैं या नहीं, ताकि आपकी तैयारी सही दिशा में आगे बढ़ सके।
बचपन और पारिवारिक पृष्ठभूमि
रोहिणी का जन्म महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के उपलई गाँव में हुआ, जिसकी आबादी तीन हज़ार से भी कम है और जहाँ ज़्यादातर लोग खेती से ही अपना गुज़ारा चलाते हैं। उनके पिता रामदास दो एकड़ से भी कम ज़मीन पर ज्वार की खेती करते थे और ज़मीन से जुड़े कामों में अधिकारियों से मिलने के लिए उन्हें अक्सर दर-दर भटकना पड़ता था। परिवार की ज़िम्मेदारियों के कारण रामदास को कक्षा 11 के बाद अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी, इसलिए उन्होंने ठान रखा था कि उनके पाँचों बच्चों को अच्छी शिक्षा ज़रूर मिलेगी। रोहिणी की बहनों ने स्नातकोत्तर तक पढ़ाई की, एक भाई डॉक्टर और IPS अधिकारी बना, तो दूसरा भाई MBA करके अपना स्टार्टअप चलाने लगा। ऐसे माहौल में रोहिणी के लिए शिक्षा सिर्फ पढ़ाई नहीं, बल्कि परिवार के सपनों को पूरा करने का ज़रिया थी।
नौ साल की उम्र में लिया गया संकल्प
रोहिणी जब नौ साल की थीं, तब एक दिन उन्होंने अपने पिता को किसानों के लिए घोषित सरकारी योजनाओं का लाभ पाने के लिए एक दफ़्तर से दूसरे दफ़्तर के चक्कर काटते देखा। यह दृश्य उनके छोटे से दिल पर गहरी छाप छोड़ गया और उन्होंने पिता से पूछा कि किसानों को उनका हक़ दिलाने की असली ज़िम्मेदारी किसकी है। पिता ने तुरंत जवाब दिया — “डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर” की। उसी पल रोहिणी ने ठान लिया कि एक दिन वह ख़ुद जिला कलेक्टर बनेंगी। पिता भी बचपन से ही बच्चों को सिखाते थे कि IAS अधिकारी बनना देश की सबसे बड़ी सेवा है, क्योंकि एक ईमानदार अधिकारी लाखों लोगों की ज़िंदगी बदल सकता है। पिता की यह बात रोहिणी के मन में इस कदर बस गई कि आगे की सारी मेहनत का केंद्रबिंदु यही एक लक्ष्य बन गया।
संघर्ष और पढ़ाई का सफ़र
रोहिणी ने गाँव के सरकारी स्कूल से कक्षा 10 की पढ़ाई पूरी की और फिर आगे की पढ़ाई के लिए सोलापुर शहर चली गईं, जहाँ उन्होंने जूनियर कॉलेज किया। इसके बाद उन्होंने पुणे के Government Engineering College से कंप्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की — और यह सब बिना किसी प्राइवेट कोचिंग के। सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के दौरान उनके पिता की एक सीख हमेशा उनके साथ रही — “तुम्हारी मेज़ पर बहुत सी फाइलें आएँगी, उन्हें सिर्फ कागज़ मत समझना; तुम्हारे एक हस्ताक्षर से या तो लाखों लोगों का भला होगा या उनकी ज़िंदगी बदतर हो जाएगी, इसलिए हमेशा लोगों के हित के बारे में सोचना।” यही सोच रोहिणी की तैयारी की नींव बनी और उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ UPSC परीक्षा पास करके 2008 बैच की IAS अधिकारी बनने का गौरव हासिल किया।
सफलता की रणनीति
रोहिणी की कामयाबी के पीछे कोई जादुई फॉर्मूला नहीं था, बल्कि सालों की लगन, अनुशासन और सही दिशा में की गई मेहनत थी। उनकी रणनीति के तीन अहम पहलू आज भी UPSC की तैयारी कर रहे हर युवा के लिए प्रेरणा का काम करते हैं।
मज़बूत बुनियाद और आत्म-अनुशासन
सरकारी स्कूल में पढ़ने के बावजूद रोहिणी ने कभी अपनी बुनियाद को कमज़ोर नहीं होने दिया, क्योंकि उनका मानना है कि सरकारी स्कूलों में अच्छे शिक्षक होते हैं, बस बुनियादी ढाँचे की कमी होती है। उन्होंने रोज़ की पढ़ाई को एक अनुशासन की तरह निभाया और सिलेबस के हर विषय को गहराई से समझने पर ज़ोर दिया। रटने की बजाय अवधारणाओं को साफ करना और नियमित रूप से लिखकर अभ्यास करना उनकी तैयारी का सबसे मज़बूत हथियार था। यही अनुशासन उन्हें इंजीनियरिंग की पढ़ाई से लेकर सिविल सेवा की परीक्षा तक हर मोड़ पर काम आया।
बिना कोचिंग के स्व-अध्ययन
रोहिणी ने सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी किसी महँगी कोचिंग के बिना, पूरी तरह स्व-अध्ययन से की — यह उनके सफ़र का सबसे प्रेरणादायक पहलू है। उनका अनुभव बताता है कि सही मार्गदर्शन के लिए हज़ारों रुपये खर्च करना ज़रूरी नहीं, बल्कि मानक पुस्तकों, अख़बारों और नियमित अभ्यास से भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। उन्होंने अपनी कमज़ोरियों को खुद पहचाना और उन्हीं पर सबसे ज़्यादा मेहनत की। आज जब हज़ारों युवा कोचिंग की फीस के बोझ तले दबे हैं, रोहिणी की कहानी उन्हें याद दिलाती है कि असली कोचिंग तो अपने भीतर का अनुशासन है।
नई भाषा और नई ज़मीन को अपनाना
IAS बनने के बाद रोहिणी की पहली पोस्टिंग तमिलनाडु के मदुरै में असिस्टेंट कलेक्टर के रूप में हुई, जहाँ अंग्रेज़ी और हिंदी से काम नहीं चलता था — तमिल सीखना ज़रूरी था। शुरुआती पाँच-छह महीनों में लोगों से जुड़ना मुश्किल रहा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और तमिल भाषा सीखकर आम लोगों के दिलों में जगह बनाई। बाद में वह मदुरै में ही अतिरिक्त कलेक्टर (विकास) और जिला ग्रामीण विकास एजेंसी की परियोजना अधिकारी भी रहीं। उनकी यह सीख हर युवा अधिकारी के लिए महत्वपूर्ण है — जिस ज़मीन पर काम करना है, उसकी भाषा और संस्कृति को अपनाना ही सच्ची सेवा की पहली शर्त है।
सफलता का ऐतिहासिक पल
साल 2018 में रोहिणी भाजिभाकरे को तमिलनाडु के सलेम जिले का कलेक्टर नियुक्त किया गया — और इसके साथ ही इतिहास रच गया, क्योंकि साल 1790 से अब तक सलेम में 170 कलेक्टर आए थे, लेकिन उनमें एक भी महिला नहीं थी। रोहिणी सलेम की 171वीं और पहली महिला कलेक्टर बनीं, और एक महाराष्ट्र के किसान की बेटी ने तमिलनाडु की इस पुरुष-प्रधान परंपरा को तोड़ दिया। कलेक्टर बनते ही उन्होंने स्वच्छता और स्वास्थ्य को अपनी पहली प्राथमिकता बनाया — डेंगू के खतरे के बीच वह सरकारी अस्पतालों का अचानक निरीक्षण करतीं और नर्सों को सलाह देतीं कि दो बीमार बच्चों को एक ही बिस्तर पर न लिटाएँ। इसके साथ ही उन्होंने तमिलनाडु सरकार की प्रमुख योजना के तहत तालाबों की सिल्ट सफाई की निगरानी की और ग्रामीण इलाकों में जाकर लोगों की शिकायतें खुद सुनीं। एक बार स्कूल निरीक्षण के दौरान जब शिक्षक हड़ताल पर थे, तो उन्होंने खुद कक्षा 1 से 3 के बच्चों को तमिल और अंग्रेज़ी पढ़ाना शुरू कर दिया — यही उनकी सेवा-भावना की असली पहचान है।
युवाओं के लिए संदेश
रोहिणी का मानना है कि महिलाएँ अपनी चुनौतियों से ही सशक्त होती हैं — जब वे अपने आरामदायक दायरे से बाहर निकलकर नेतृत्व करती हैं, तब उन्हें समझ आता है कि सफलता के लिए क्या चाहिए। उनका संदेश साफ है कि हालात चाहे जैसे भी हों, शिक्षा और ईमानदारी से बड़ी कोई ताकत नहीं होती। उन्होंने यह भी साबित किया कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे भी देश की सबसे कठिन परीक्षा पास कर सकते हैं, बस ज़रूरत है तो सही सोच और निरंतर मेहनत की। पिता की वह सीख — “फाइलों को सिर्फ कागज़ मत समझना” — आज भी उनके हर फैसले का मार्गदर्शन करती है और हर युवा अधिकारी को याद दिलाती है कि पद नहीं, सेवा ही असली सम्मान है।
निष्कर्ष
उपलई के खेतों से सलेम के कलेक्टर कार्यालय तक का रोहिणी भाजिभाकरे का सफ़र सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि हर उस बेटी की कहानी है जो बड़े सपने देखने की हिम्मत रखती है। उन्होंने साबित कर दिया कि गरीबी, भाषा की दीवार और लिंग की बाधाएँ — कोई भी रुकावट उस इरादे के आगे नहीं टिकती जो सेवा के लिए धड़कता है। आज जब वह सलेम के लोगों की सेवा में जुटी हैं, तो उनके पिता के वे शब्द सच हो रहे हैं कि एक ईमानदार अधिकारी लाखों ज़िंदगियाँ बदल सकता है। रोहिणी की कहानी हर युवा से यही कहती है — सपना देखो, मेहनत करो और कभी हार मत मानो, क्योंकि मंज़िल उन्हीं को मिलती है जो रुकते नहीं।