Kisan Success Story: रेगिस्तान में एक लीटर पानी से 50 हज़ार पेड़ – सुंडाराम वर्मा की प्रेरणादायक कहानी
रेगिस्तान की तपती धरती पर जहाँ पानी की एक बूँद भी नसीब नहीं होती, वहाँ कोई कहे कि पेड़ सिर्फ़ एक लीटर पानी से पनप सकता है, तो सुनने वाला हैरान रह जाएगा। लेकिन राजस्थान के सीकर जिले के दांता गाँव के किसान सुंडाराम वर्मा ने इस हैरानी को हकीकत में बदलकर दिखाया है। उन्होंने शुष्क भूमि में एक ऐसी वानिकी तकनीक विकसित की है, जिससे एक पौधे को ज़िंदगी भर सिर्फ़ एक लीटर पानी देना पड़ता है, और आज तक वे पचास हज़ार से ज़्यादा पेड़ लगा चुके हैं। इस अद्भुत योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2020 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया। उनकी कहानी इस बात की जीती-जागती मिसाल है कि हुनर और हौसला हो, तो रेगिस्तान भी हरा-भरा हो सकता है।
बचपन और शुरुआती जीवन
सुंडाराम वर्मा का जन्म राजस्थान के सीकर जिले के दांता (रामगढ़) गाँव में एक साधारण परिवार में हुआ। बचपन से ही उन्होंने रेगिस्तान की मुश्किल ज़िंदगी को करीब से देखा था — पानी की कमी, सूखी फसलें और बंजर होती ज़मीन। शिक्षा के प्रति वे गंभीर थे और उन्होंने स्नातक की पढ़ाई पूरी की, लेकिन किताबों से ज़्यादा उनकी रुचि धरती और पेड़-पौधों में थी। सन 1972 में ग्रेजुएशन के बाद उनके सामने सरकारी नौकरी का रास्ता खुला था, मगर उन्होंने आरामदायक नौकरी ठुकराकर खेती को ही अपना जीवन बनाने का फ़ैसला किया। गाँव के लोगों ने उस समय इस फ़ैसले को पागलपन कहा था, क्योंकि पढ़ा-लिखा नौजवान जब सरकारी कुर्सी छोड़कर खेत की ओर जाता है, तो समाज की नज़रें सवाल पूछती हैं।
टर्निंग पॉइंट: एक लीटर पानी का सपना
खेती शुरू करने के बाद सुंडाराम ने महसूस किया कि शेखावाटी की ज़मीन पर पेड़ लगाना सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि यहाँ पानी की भारी किल्लत रहती है। साधारण तरीकों से लगाए गए पौधे गर्मी में जल जाते या सूख जाते थे। इसी दर्द ने उन्हें नई तकनीक की तलाश में धकेल दिया। उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) के माध्यम से नई दिल्ली के भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में शुष्क भूमि खेती का अध्ययन किया और खुद भी प्रयोग शुरू कर दिए। दस साल की मेहनत और असंख्य प्रयोगों के बाद उन्होंने ‘ड्रायलैंड एग्रोफॉरेस्ट्री’ नाम की तकनीक विकसित की — ऐसी विधि जिसमें पौधे को एक बार सिर्फ़ एक लीटर पानी दिया जाता है और फिर वह अपनी जड़ों की ताकत से बढ़ता रहता है।
संघर्ष और चुनौतियाँ
सुंडाराम वर्मा का सफ़र आसान नहीं था। शुरुआती दौर में उनके प्रयोग बार-बार असफल होते थे — हज़ारों पौधे सूख जाते, पैसा और समय दोनों डूब जाते। गाँव वालों की हँसी और ताने भी सुनने पड़े, क्योंकि लोग कहते थे कि जो काम वैज्ञानिक नहीं कर पाए, वह एक गाँव का किसान कैसे करेगा। आर्थिक तंगी भी उनके सामने बड़ी दीवार थी, मगर उन्होंने हार मानने से इनकार कर दिया। हर असफल पौधे से उन्होंने सीखा और अपनी विधि में सुधार करते चले गए। धीरे-धीरे उनके प्रयोग कामयाब होने लगे और जहाँ पहले एक भी पेड़ नहीं टिकता था, वहाँ हरियाली फैलने लगी।
सफलता की रणनीति
सुंडाराम वर्मा की ‘ड्रायलैंड एग्रोफॉरेस्ट्री’ तकनीक दिखने में सरल लगती है, लेकिन इसके पीछे गहरा वैज्ञानिक चिंतन है। उनकी रणनीति के मुख्य स्तंभ ये हैं:
1. ज़मीन का समतलन
पहला कदम है खेत की ज़मीन को पूरी तरह समतल करना, ताकि बरसात का पानी बहकर बाहर न चला जाए और मिट्टी में ही समा जाए। यह छोटा-सा उपाय नमी को लंबे समय तक बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाता है। रेगिस्तानी इलाकों में जहाँ बारिश ही कम होती है, वहाँ की हर बूँद को बचाना ज़िंदगी और मौत का सवाल होता है।
2. बार-बार जुताई
दूसरा कदम है खेत की कई बार जुताई करना, जिससे खरपतवार और मिट्टी की बारीक नलियाँ (कैपिलरी) टूट जाएँ। इससे नीचे की नमी ऊपर आकर वाष्पित नहीं होती और जड़ों तक पहुँचती है। यह तरीका पौधे को धरती की गहराई से पानी खींचने की आदत डालता है, जिससे वह सूखे से लड़ने में मज़बूत बनता है।
3. गहरे और चौड़े गड्ढे
तीसरा कदम है पौधों को सामान्य से गहरे और चौड़े गड्ढों में लगाना। गहरे गड्ढे में जड़ें नीचे की ठंडी और नम मिट्टी तक पहुँच जाती हैं, जहाँ सूरज की गर्मी का असर कम होता है। इसी गड्ढे में एक बार एक लीटर पानी डाला जाता है, और फिर पौधे को अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है — प्रकृति बाकी काम खुद कर लेती है।
4. फसलों की उन्नत किस्में
पेड़ों के साथ-साथ सुंडाराम ने फसलों की उन्नत किस्में भी विकसित कीं। उनकी काबुली चना SR-1 किस्म मध्यम मोटे दानों वाली, ज़्यादा उपज देने वाली और कीट-रोग से लड़ने में सक्षम है, जिसे प्लांट वैरायटी प्रोटेक्शन अथॉरिटी में पंजीकृत किया गया। इसके अलावा उन्होंने ग्वार SR-23 और मोठ SR-1 जैसी ज़्यादा उपज वाली किस्में भी तैयार कीं, जो शुष्क इलाकों के किसानों के लिए वरदान साबित हो रही हैं।
सफलता का पल
सबसे बड़ा सम्मान उन्हें 2020 में मिला, जब भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से नवाज़ा। यह पुरस्कार उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने प्रदान किया था, और पूरे देश ने उस किसान को सलाम किया जिसने एक लीटर पानी से पचास हज़ार पेड़ उगा दिए। भारत सरकार के नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन (NIF) ने उनकी तकनीक को ‘रेगिस्तान को हरा-भरा बनाने’ की पहल के तहत देश भर में फैलाया। PIB के मुताबिक उनकी तकनीक में पौधों की जीवित रहने की दर सौ फ़ीसदी बताई गई। आज सुंडाराम वर्मा सिर्फ़ किसान नहीं, बल्कि उन हज़ारों किसानों के गुरु हैं जो सूखी ज़मीन पर हरियाली का सपना देखते हैं।
युवाओं के लिए संदेश
सुंडाराम वर्मा की ज़िंदगी युवाओं को सिखाती है कि डिग्री का मतलब सिर्फ़ नौकरी पाना नहीं होता, बल्कि अपने ज्ञान को समाज के काम में लगाना भी होता है। उन्होंने साबित किया कि खेती पिछड़ेपन का नहीं, बल्कि नवाचार का मैदान हो सकती है। अगर आपके पास एक विचार है और उसे साकार करने की लगन है, तो कोई भी रेगिस्तान आपको रोक नहीं सकता। पर्यावरण के संकट के इस दौर में उनकी तकनीक हर उस नौजवान के लिए रास्ता है जो धरती के लिए कुछ बड़ा करना चाहता है।
निष्कर्ष
सुंडाराम वर्मा की कहानी सिर्फ़ एक किसान की कहानी नहीं है, यह धरती से प्रेम करने वाले हर इंसान की कहानी है। उन्होंने दिखाया कि बड़ी समस्याओं के समाधान अक्सर सरल विचारों में छिपे होते हैं — बस उन्हें आज़माने की हिम्मत चाहिए। आज जब जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया के लिए चुनौती बना हुआ है, तब एक लीटर पानी से पेड़ उगाने की उनकी तकनीक आशा की किरण है। ऐसे ही किसान भारत की असली ताकत हैं।