Kisan Success Story: केमिकल खेती छोड़ प्रकृति से जुड़े – सुभाष शर्मा की प्रेरणादायक कहानी
महाराष्ट्र के यवतमाल जिले का नाम सुनते ही अक्सर लोगों के मन में किसान आत्महत्याओं की दुखद खबरें याद आ जाती हैं, लेकिन उसी धरती पर एक ऐसा किसान भी है जिसने प्रकृति के साथ तालमेल बैठाकर खेती को फिर से खुशहाल बना दिया। उनका नाम है सुभाष खेतुलाल शर्मा, जिन्हें जनवरी 2025 में प्राकृतिक खेती में अग्रणी कार्य के लिए पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह सम्मान इसलिए भी खास है, क्योंकि यवतमाल जिले के किसी व्यक्ति को यह पहला पद्म पुरस्कार मिला है। सुभाष शर्मा की कहानी बताती है कि जब किसान प्रकृति का साथी बन जाता है, तो मिट्टी, पानी और फसल — तीनों मुस्कुराने लगते हैं।
परिवार और बचपन: खेती से जुड़े जीवन की शुरुआत
सुभाष शर्मा का जन्म एक साधारण किसान परिवार में हुआ था, जहां पीढ़ियों से खेती ही जीवन का आधार रही थी। वे 1970 के दशक से ही खेत जोत रहे थे और उस दौर की आम सोच के साथ-साथ वे भी रासायनिक खाद और कीटनाशकों का बेरहमी से इस्तेमाल करते थे। उनका मानना था कि जितने ज्यादा रसायन, उतनी ज्यादा पैदावार, और इसी धारणा के चलते उन्होंने अपने खेतों से पेड़ तक कटवा दिए, ताकि खेती के लिए ज्यादा जमीन मिल सके। शुरुआत में रसायनिक खेती ने उन्हें अच्छी पैदावार भी दी और रिकॉर्ड उपज के लिए उन्हें पुरस्कार भी मिले, लेकिन यह सफलता ज्यादा दिन टिक न सकी। धीरे-धीरे उत्पादन लागत बढ़ने लगी, मिट्टी की सेहत बिगड़ने लगी और पैदावार घटने लगी, जिससे वे कर्ज के जाल में फंसते चले गए।
1994 का वह सवाल जिसने सब कुछ बदल दिया
साल 1994 में एक दिन सुभाष शर्मा ने खुद से एक सीधा सा सवाल पूछा — “अगर रसायनिक खेती इतनी ही अच्छी है, तो मैं कर्ज में क्यों हूं?” यह सवाल उनकी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट बन गया। उन्होंने ठान लिया कि अब वे प्रकृति के साथ लड़कर नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ मिलकर खेती करेंगे। उन्होंने रसायनों को अलविदा कहा और मिट्टी, पानी और पेड़-पौधों के बीच के पुराने संतुलन को वापस लाने का संकल्प लिया। इसके लिए उन्होंने अपनी ही जमीन को एक प्रयोगशाला बना दिया और पुराने पारंपरिक किसानों से सीखते हुए प्राकृतिक खेती के नए तरीके विकसित करने लगे। यह फैसला आसान नहीं था, क्योंकि आसपास के सभी किसान उन्हें अजीब नजरों से देखते थे, लेकिन सुभाष शर्मा को अपनी राह पर पूरा भरोसा था।
संघर्ष के दिन: जब लोग हंसते थे, तब मिट्टी सिखाती थी
शुरुआती दिनों में प्राकृतिक खेती में पैदावार रसायनिक खेती जितनी नहीं आती, और यह वह कठिन समय था जब सुभाष शर्मा को सबसे ज्यादा धैर्य की जरूरत थी। गांव के लोग उनके खेतों में फैले पेड़-पौधों और गाय-भैंसों को देखकर कहते थे कि यह खेती नहीं, जंगल है। कुछ लोगों ने तो यहां तक कह दिया कि वे पुराने जमाने की ओर लौट रहे हैं और बर्बाद हो जाएंगे। लेकिन सुभाष शर्मा ने हार नहीं मानी, क्योंकि वे जानते थे कि मिट्टी को ठीक होने में समय लगता है और प्रकृति का संतुलन धीरे-धीरे बनता है। उन्होंने अपने खेतों में पानी के लिए नालियां और तालाब बनवाए, पशुपालन शुरू किया और पेड़ लगाए, ताकि खेत एक पूरा पारिस्थितिक तंत्र बन जाए। लगभग छह साल के इस धैर्यपूर्ण संघर्ष के बाद धरती ने उनकी मेहनत का जवाब देना शुरू किया।
सफलता की रणनीति: प्रकृति के तीन स्तंभ
सुभाष शर्मा ने अपनी खेती को प्राकृतिक खेती के तीन बुनियादी सिद्धांतों — परस्पर निर्भरता, संतुलन और आत्मनिर्भरता — पर खड़ा किया। उन्होंने अपने खेत का सुनियोजित बंटवारा किया, जिसमें दो प्रतिशत जमीन पशुपालन के लिए, तीन प्रतिशत पानी के संरक्षण हेतु नालियों और तालाबों के लिए, तीस प्रतिशत पेड़ों के लिए और पैंसठ प्रतिशत फसलों के लिए रखी गई। इस व्यवस्था ने कमाल कर दिखाया — पशुओं से मिट्टी की उर्वरता बढ़ी, नालियों ने मिट्टी के कटाव और बारिश के पानी के बहाव को रोका, और पेड़ों ने उन पक्षियों को आकर्षित किया जो कीटों को नियंत्रित करते हैं। इस तरह बिना किसी रसायन के उनका खेत फलने-फूलने लगा और सिर्फ छह साल में उनकी पैदावार आठ गुना बढ़ गई।
पानी का चमत्कार: हर साल एक करोड़ लीटर बारिश का पानी
सुभाष शर्मा की खेती की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है जल संरक्षण, क्योंकि वे अपने खेतों में हर साल करीब एक करोड़ लीटर बारिश के पानी को बचाते हैं। उन्होंने सिर्फ छह एकड़ जमीन पर भूजल पुनर्भरण के ऐसे उपाय किए हैं, जिनसे लगभग छह करोड़ लीटर पानी जमीन के अंदर वापस जाता है। सूखाग्रस्त यवतमाल जैसे इलाके में जहां पानी की हर बूंद कीमती है, यह उपलब्धि किसी चमत्कार से कम नहीं है। वे मूंगफली, तुअर, हल्दी, कद्दू, मेथी, धनिया, टमाटर, मूली और बागवानी फसलों की मौसमी विविधता के साथ खेती करते हैं, जिससे मिट्टी की सेहत बनी रहती है और हर मौसम में आय होती है।
प्रकृति से सीखने का विज्ञान: ‘एग्रीकल्चर’ से ‘एग्रीकल्चर’
सुभाष शर्मा खेती को सिर्फ ‘एग्रीकल्चर’ नहीं, बल्कि ‘एग्रीकल्चर’ कहते हैं — यानी एक ऐसी व्यवस्था जिसमें जमीन, पानी और सभी जीवों के बीच संतुलन और सामंजस्य हो। उनका मानना है कि रसायनिक खेती विनाशकारी है, जबकि प्राकृतिक खेती सृजनात्मक है, और यह बात उनके खेत के नतीजे खुद साबित करते हैं। साल 2000 तक उनकी पैदावार 50 टन से बढ़कर 400 टन हो गई थी, और वह भी तब जब इनपुट लागत काफी कम हो गई थी। उनका यह सिद्धांत आज पूरे देश के किसानों के लिए एक जीवंत पाठशाला है, जिसे देखने भारत रत्न डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन, सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे और विदेशी विशेषज्ञ समेत कई गणमान्य लोग आ चुके हैं।
सफलता का पल: पद्म श्री और देशभर का सम्मान
जनवरी 2025 में जब भारत सरकार ने सुभाष शर्मा को पद्म श्री से सम्मानित करने की घोषणा की, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति का सम्मान नहीं था, बल्कि प्राकृतिक खेती की पूरी विचारधारा की जीत थी। यवतमाल जैसे जिले के लिए यह गर्व का पल था, जो अब तक किसान संकट की खबरों के लिए जाना जाता था और अब प्राकृतिक खेती के पहले पद्म श्री विजेता का घर बन गया। इससे पहले उन्हें महाराष्ट्र सरकार का कृषि भूषण पुरस्कार, एग्रोवन का स्मार्ट शेतकरी पुरस्कार और पंडित दीनदयाल उपाध्याय सेवा पुरस्कार जैसे कई सम्मान मिल चुके हैं। आज उनका 16 एकड़ का खेत देशभर के किसानों के लिए एक आदर्श मॉडल है, जहां हर साल हजारों किसान प्राकृतिक खेती सीखने आते हैं।
युवाओं के लिए संदेश: धरती मां का कर्ज चुकाइए
सुभाष शर्मा युवाओं से हमेशा कहते हैं कि खेती को छोड़ने की बजाय उसे प्रकृति के साथ जोड़कर देखो, क्योंकि यही भविष्य की सबसे सुरक्षित और सम्मानजनक आजीविका है। उनका संदेश स्पष्ट है — रसायनों के पीछे भागने से किसान कर्जदार बनता है, लेकिन प्रकृति के साथ चलने से वही किसान आत्मनिर्भर बन जाता है। वे युवाओं को सलाह देते हैं कि पहले अपनी मिट्टी को समझो, पानी को बचाओ और पेड़ों को अपना साथी बनाओ, फिर देखो कि धरती कैसे तुम्हारी झोली भर देती है। उनका जीवन इस बात का जीता-जागता सबूत है कि धैर्य, निरीक्षण और प्रकृति के प्रति सम्मान से कोई भी किसान अपनी तकदीर बदल सकता है।
निष्कर्ष: प्रकृति के साथ, प्रकृति के लिए
सुभाष खेतुलाल शर्मा की कहानी हमें सिखाती है कि खेती सिर्फ फसल उगाने का धंधा नहीं, बल्कि धरती के साथ एक रिश्ता है। 1994 में एक सवाल से शुरू हुआ उनका सफर आज पूरे देश के लिए प्रेरणा बन चुका है, और उनका पद्म श्री इस बात की मुहर है कि सही राह पर चलने वाले को देर से ही सही, सम्मान जरूर मिलता है। यवतमाल की उसी धरती पर जहां कभी निराशा की खबरें आती थीं, आज आशा की फसल लहलहा रही है। अगर हर किसान सुभाष शर्मा की तरह प्रकृति को अपना गुरु बना ले, तो भारत की खेती का भविष्य वाकई सुनहरा हो सकता है।