Kisan Success Story: दोनों टांगों में पोलियो, फिर भी बने ‘अनार दादा’ – गेनाभाई पटेल की प्रेरणादायक कहानी
गुजरात के बनासकांठा जिले के छोटे से गांव सरकारी गोलिया में रहने वाले गेनाभाई दरगाभाई पटेल को आज पूरे देश में ‘अनार दादा’ के नाम से जाना जाता है। दोनों टांगों में पोलियो की वजह से दिव्यांग होने के बावजूद उन्होंने वो करके दिखाया, जो हज़ारों सामान्य किसान सोच भी नहीं पाते। पानी की भारी किल्लत वाले इलाके में उन्होंने 2005 में अनार की खेती का प्रयोग शुरू किया और कुछ ही सालों में अपने गांव को देश का सबसे बड़ा अनार उत्पादक क्षेत्र बना दिया। उनकी इस उपलब्धि के लिए 2017 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया। उनकी कहानी हर उस इंसान के लिए प्रेरणा है, जो मुश्किलों को अपनी कमजोरी मानकर हार मान लेता है।
बचपन और संघर्ष की शुरुआत
गेनाभाई पटेल का जन्म गुजरात के बनासकांठा जिले के सरकारी गोलिया गांव में एक सामान्य किसान परिवार में हुआ था। बचपन में ही पोलियो ने उनकी दोनों टांगों को अपंग बना दिया था, जिसकी वजह से खेतों में रोज़ाना की कड़ी मेहनत करना उनके लिए बहुत मुश्किल था। फिर भी उन्होंने बारहवीं तक पढ़ाई पूरी की और परिवार के साथ पारंपरिक खेती में हाथ बंटाने का फैसला किया। उनके परिवार में गेहूं, जीरा, अरंडी और बाजरा जैसी फसलें उगाई जाती थीं, लेकिन सालभर की मेहनत के बाद महज 50-80 हज़ार रुपये की आमदनी होती थी। इतनी कम कमाई में पूरे परिवार का गुज़ारा चलाना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा था।
दिक्कत सिर्फ आमदनी की नहीं थी, बल्कि उससे भी बड़ी चुनौती थी पानी की। बनासकांठा के इस इलाके में ज़मीन के नीचे पानी करीब 1,000 फीट की गहराई पर मिलता था और बारिश भी बहुत कम होती थी। पारंपरिक फसलें इतनी सूखी ज़मीन पर अच्छी पैदावार नहीं दे पाती थीं, और गेनाभाई की शारीरिक दिव्यांगता की वजह से सब्ज़ियों जैसी नाज़ुक फसलों की रोज़ाना देखभाल करना उनके लिए संभव नहीं था। गेनाभाई खुद कहते हैं कि ऐसे हालात में हर किसान को पारंपरिक फसलों और पुराने तरीकों से आगे सोचने की ज़रूरत होती है। यही सोच उन्हें एक ऐसे प्रयोग की तरफ ले गई, जो बाद में पूरे इलाके की किस्मत बदलने वाला था।
टर्निंग पॉइंट: अनार की खेती का फैसला
साल 2005 गेनाभाई के जीवन का सबसे अहम मोड़ साबित हुआ। कृषि विश्वविद्यालय और राज्य सरकार के कृषि मेले से उन्होंने अनार की खेती के बारे में जाना, और उन्हें समझ आया कि अनार को कम पानी की ज़रूरत होती है और यह सूखे इलाकों के लिए एकदम सही फसल है। सबसे बड़ी बात यह थी कि अनार के पेड़ों की देखभाल के लिए खेत में लगातार झुकना या भाग-दौड़ नहीं करनी पड़ती, जो उनकी दिव्यांगता के साथ भी संभव था। उस वक़्त उनके इलाके में कोई भी किसान अनार नहीं उगा रहा था, लेकिन गेनाभाई ने जोखिम उठाने का फैसला किया।
उन्होंने महाराष्ट्र से अनार के पौधे खरीदे और करीब 20 हेक्टेयर ज़मीन पर अनार का बाग लगाया। पानी की बचत के लिए उन्होंने खेत में ड्रिप इरिगेशन सिस्टम लगाया, ताकि बूंद-बूंद पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचे। शुरुआत में उन्होंने वैज्ञानिक तरीकों से खेती की — कृषि विशेषज्ञों की सलाह ली, कीटनाशकों की जगह बेहतर तकनीक अपनाई और यहां तक कि बाग की निगरानी के लिए सीसीटीवी कैमरे तक लगाए। दो साल बाद जब पेड़ों पर फल लगे, तो गेनाभाई की मेहनत ने रंग दिखाना शुरू कर दिया था।
संघर्ष के दिन: धैर्य की बड़ी परीक्षा
फल लगने के बाद भी असली संघर्ष खत्म नहीं हुआ था, बल्कि तब शुरू हुआ था। सही बाज़ार और सही दाम की जानकारी न होने की वजह से शुरुआती सालों में उनकी उपज को वो कीमत नहीं मिली, जिसकी उन्हें उम्मीद थी। उन्हें व्यापारियों से अच्छा सौदा करने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी, और यह दौर करीब 4-5 साल तक चला। इस दौरान कई बार उनका हौसला टूटा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और लगातार अपने अनुभव से सीखते रहे।
सबसे बड़ी मुश्किल यह थी कि गांव के दूसरे किसान उन्हें शक की निगाह से देखते थे। कोई भी यह मानने को तैयार नहीं था कि इस सूखी ज़मीन पर अनार जैसा फल उग सकता है। गेनाभाई ने आर्थिक जोखिम अपने सिर पर लिया और अपने खेत में सबके सामने सफलता साबित करने का ठान लिया। जब 4-5 साल बाद उन्हें अनार के अच्छे दाम मिलने लगे, तो गांव वालों की सोच बदलने लगी। कुछ ही सालों में पूरे गांव में अनार के बाग लगने लगे, और पड़ोसी राजस्थान के गांवों के किसान भी यह खेती अपनाने लगे।
सफलता की रणनीति
गेनाभाई की सफलता किसी चमत्कार का नतीजा नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का नतीजा थी। उन्होंने हर कदम पर वैज्ञानिक सोच और धैर्य से काम लिया। आइए जानते हैं उनके सफ़ल होने के अहम सूत्र, जिनसे दूसरे किसान भी सीख सकते हैं।
1. कम पानी वाली फसल का सही चुनाव
गेनाभाई ने अपने इलाके की सबसे बड़ी समस्या — पानी की कमी — को अपनी योजना की बुनियाद बनाया। उन्होंने ऐसी फसल चुनी, जिसे कम पानी चाहिए था, बजाय इसके कि वो पानी की कमी से जूझती फसलों को उगाते। अनार सूखी ज़मीन के लिए बिल्कुल उपयुक्त था, और उनकी दिव्यांगता को देखते हुए भी यह फसल आसान थी। आज उनकी तहसील में 9,000 हेक्टेयर से ज़्यादा ज़मीन पर अनार की खेती होती है। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, पंजाब और महाराष्ट्र के व्यापारी हर साल दिसंबर-जनवरी में खरीद के लिए यहां आते हैं, और जिले के अनार दुबई, श्रीलंका और बांग्लादेश तक निर्यात होते हैं।
2. ड्रिप इरिगेशन और वैज्ञानिक तकनीक
गेनाभाई ने पानी की एक-एक बूंद का हिसाब रखा। उन्होंने पूरे बाग में ड्रिप इरिगेशन लगाई, जिससे पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचता है और बर्बादी नहीं होती। इसके साथ ही उन्होंने कीटनाशकों के सही इस्तेमाल, खाद प्रबंधन और बाग की नियमित निगरानी पर भी पूरा ध्यान दिया। उनकी खेती में अनावश्यक खर्च नहीं था, जिससे लागत कम आई और मुनाफ़ा ज़्यादा हुआ।
3. ज्ञान बांटने की भावना
गेनाभाई की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि उन्होंने अपनी सफलता अपने तक सीमित नहीं रखी। उन्होंने अपने खेत के दरवाज़े सभी के लिए खोल दिए और खुले दिल से दूसरे किसानों को अनार की खेती सिखाई। अब तक करीब 70,000 किसान उनका खेत देखने और सीखने आ चुके हैं। इसी उदारता की वजह से उनका गांव आज देश का सबसे बड़ा अनार उत्पादक गांव माना जाता है, और उनकी सलाह से हज़ारों किसानों की आमदनी बढ़ी है।
सफलता का पल: पद्म श्री और प्रधानमंत्री की तारीफ़
गेनाभाई की मेहनत और दूरदर्शिता को राष्ट्रीय सम्मान मिला। 26 जनवरी 2017 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया। पुरस्कार की खबर मिलते ही गेनाभाई खुशी से फूले नहीं समाए थे — वो कुछ मिनट तक बोल ही नहीं पाए थे। उनके जैसे एक सामान्य गांव के किसान के लिए यह सम्मान सपने जैसा था। इसके अलावा उन्हें 18 से ज़्यादा राज्य स्तरीय और कई राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं।
उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बनासकांठा के दीसा में अपने भाषण में उनका नाम लेकर उनकी तारीफ़ की थी। कभी-कभी गेनाभाई कहते हैं कि किसानों को दूसरों के लिए काम करना चाहिए, क्योंकि अच्छाई लौटकर ज़रूर आती है। आज उनकी सालाना आमदनी एक करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच चुकी है, लेकिन उनकी सबसे बड़ी कमाई वो इज़्ज़त है, जो पूरे देश के किसान उन्हें ‘अनार दादा’ कहकर देते हैं।
युवाओं के लिए संदेश
गेनाभाई का मानना है कि किसानों को बाज़ार की मांग के हिसाब से फसलें उगानी चाहिए, ताकि उनकी उपज विदेशों तक बिक सके और वो डॉलर में कमा सकें। उनका सुझाव है कि हर किसान के पास कम से कम दो देसी गाय होनी चाहिए, ताकि वो खुद जैविक खाद बना सके और रसायनों पर अनावश्यक खर्च न करे। उनकी सलाह है कि खेती को सिर्फ़ परंपरा न समझकर एक व्यवसाय की तरह सोचें, जिसमें नई तकनीक और नए प्रयोग ही सफलता की चाबी हैं।
वे हंसते हुए कहते हैं कि अगर किसान अच्छी कमाई करेंगे, तो वो भी कॉलर उठाकर चल सकेंगे। उनका सपना एक ऐसे भारत का है, जहां किसान की सफलता कोई चमत्कार न होकर एक सामान्य बात हो। दिव्यांगता के बावजूद जिस इंसान ने एक पूरा गांव समृद्ध कर दिया, वो हर युवा के लिए यही संदेश देता है — परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन हों, सही दिशा में की गई मेहनत कभी बेकार नहीं जाती।
निष्कर्ष
गेनाभाई पटेल की कहानी सिर्फ़ एक किसान की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह साबित करती है कि दिव्यांगता शरीर की होती है, सोच की नहीं। जिस इंसान ने 2005 में अकेले एक प्रयोग शुरू किया था, आज उसी प्रयोग से हज़ारों किसान परिवारों की रोज़ी चल रही है। सूखी ज़मीन, पानी की किल्लत और शारीरिक अक्षमता — तीनों को उन्होंने अपनी ताकत बना लिया। आज जब बनासकांठा के अनार विदेशों के बाज़ारों में बिकते हैं, तो उनके पीछे खड़ा होता है एक ऐसा शख्स, जिसने कभी हार मानना नहीं सीखा।