Sports Success Story: हवाई जहाज़ में उड़ने के ख्वाब से रियो ओलंपिक के पोडियम तक – साक्षी मलिक की प्रेरणादायक कहानी
रोहतक के छोटे से गांव मोखरा में बारह साल की एक लड़की जब कुश्ती के अखाड़े में कदम रखती है, तो गांव वाले हंसते हैं, ताने कसते हैं और कहते हैं कि ये खेल लड़कियों के लिए नहीं है। लेकिन वही लड़की बारह साल की मेहनत के बाद 2016 के रियो ओलंपिक में भारत की पहली महिला पहलवान बनकर ओलंपिक पदक जीतती है। ये कहानी है साक्षी मलिक की – एक ऐसे सफर की, जिसमें समाज के ताने, संसाधनों की कमी और हार का डर, सब कुछ था, लेकिन हौसला उन सब से बड़ा था।
बचपन – मोखरा गांव की वो लड़की
साक्षी मलिक का जन्म 3 सितंबर 1992 को हरियाणा के रोहतक जिले के मोखरा गांव में हुआ था। पिता सुखबीर मलिक और मां सुदेश का एक साधारण सा परिवार था, जहां खेल का मतलब सिर्फ गांव के मैदानों में कबड्डी और क्रिकेट खेलना था। बचपन में साक्षी ने कबड्डी और क्रिकेट दोनों आज़माए, लेकिन असली कुश्ती तो उन्हें तब पसंद आई जब वो दांव-पेंच में जीतने लगीं। घर में एक बड़ा भाई था – सचिन, जो उनसे दो साल बड़ा था और जिसका नाम क्रिकेट के दिग्गज सचिन तेंदुलकर पर रखा गया था। सचिन जब उन्हें क्रिकेट खेलने के लिए बुलाते, तो साक्षी अक्सर मना कर देतीं और आसमान में उड़ते हवाई जहाज़ों को देखती रहतीं। एक बार उन्होंने खुद कहा था कि वो जानती भी नहीं थीं कि ओलंपिक क्या होता है – बस इतना सपना था कि खिलाड़ी बनकर हवाई जहाज़ में उड़ना है।
बारह साल की उम्र में अखाड़े का दरवाज़ा
साक्षी की ज़िंदगी का सबसे बड़ा फैसला तब आया, जब महज 12 साल की उम्र में उन्होंने रोहतक के छोटू राम स्टेडियम स्थित अखाड़े में प्रशिक्षण शुरू किया। उनके कोच थे ईश्वर दहिया, जो 1993 से पहलवानों को तैयार कर रहे थे। लेकिन हरियाणा जैसे राज्य में, जहां उस दौर में लड़कियों का कुश्ती में आना लगभग वर्जित माना जाता था, एक लड़की को अखाड़े में ट्रेनिंग देना आसान नहीं था। गांव और आसपास के लोगों ने इसका विरोध किया, लेकिन कोच दहिया अपने फैसले पर अडिग रहे और साक्षी के साथ खड़े रहे। साक्षी के माता-पिता ने भी उन पर कभी कोई दबाव नहीं डाला और बेटी के सपने को पूरा समर्थन दिया। अखाड़े में लड़कियों की कमी थी, इसलिए साक्षी को अभ्यास के लिए लड़कों से ही कुश्ती लड़नी पड़ती थी – और यही वो आग थी, जो आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।
संघर्ष के साल – ताने, कमी और हिम्मत
ओलंपिक पदक तक का रास्ता किसी परीकथा जैसा आसान नहीं था। साक्षी के सामने संसाधनों की कमी थी, समाज के ताने थे और एक लड़की के लिए अखाड़े की मिट्टी को अपनाने का संघर्ष था। लेकिन उन्होंने 12 साल तक रोज़ाना की मेहनत जारी रखी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहली बड़ी कामयाबी 2010 में आई, जब उन्होंने जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता। इसके बाद 2014 में उन्होंने डेव शुल्ज़ इंटरनेशनल टूर्नामेंट में स्वर्ण पदक अपने नाम किया और उसी साल ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में रजत पदक जीता। 2015 में दोहा एशियाई चैंपियनशिप में कांस्य और नई दिल्ली राष्ट्रीय चैंपियनशिप में स्वर्ण जीतकर उन्होंने साबित कर दिया कि वो बड़े मंच की खिलाड़ी हैं। हर पदक के पीछे गांव के तानों को चुप कराने वाली एक जिद छिपी थी।
सफलता की रणनीति
साक्षी मलिक की सफलता अचानक नहीं मिली – इसके पीछे सालों की सोची-समझी मेहनत और एक मज़बूत मानसिकता थी। उनके सफर से हर युवा खिलाड़ी के लिए कई सबक छिपे हैं।
लंबे समय का अनुशासन
साक्षी ने खुद कहा था कि इस एक पदक के लिए उन्होंने 12 साल मेहनत की थी। रोज़ सुबह अखाड़े की मिट्टी, घंटों का अभ्यास और डाइट पर नियंत्रण – यही उनका रूटीन था। बड़ी सफलता एक दिन में नहीं मिलती, ये बात उनके करियर से साफ झलकती है। जो युवा जल्दी हार मान लेते हैं, उनके लिए साक्षी का 12 साल का इंतज़ार सबसे बड़ा जवाब है।
लड़कों से लड़ने की हिम्मत
अखाड़े में लड़कियों की कमी के कारण साक्षी को अभ्यास में लड़कों से कुश्ती लड़नी पड़ती थी। ये शुरुआत में मजबूरी थी, लेकिन आगे चलकर यही उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गई। जब आप रोज़ खुद से मज़बूत प्रतिद्वंद्वी से लड़ते हैं, तो असली मुकाबले में डर खत्म हो जाता है। रियो में 0-5 से पिछड़ने के बाद जो वापसी उन्होंने की, उसकी नींव इन्हीं अखाड़ों में पड़ी थी।
हार से न घबराने का जज़्बा
रियो ओलंपिक के क्वार्टर फाइनल में साक्षी रूस की पहलवान से हार गई थीं। आम खिलाड़ी यहां टूट जाता, लेकिन साक्षी ने रेपेचेज के नियम से मिले दूसरे मौके को दोनों हाथों से पकड़ा। उनका मानना था कि जब तक आखिरी दांव नहीं लगता, तब तक लड़ाई खत्म नहीं होती। यही मानसिकता उन्हें कांस्य पदक के मुकाबले तक ले गई।
पढ़ाई के साथ खेल का संतुलन
साक्षी ने खेल के साथ-साथ पढ़ाई भी जारी रखी और महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक से शारीरिक शिक्षा में मास्टर डिग्री हासिल की। बाद में वो इसी विश्वविद्यालय में कुश्ती निदेशक बनीं और भारतीय रेलवे में राजपत्रित अधिकारी के पद पर नियुक्त हुईं। उनका करियर साबित करता है कि खेल और शिक्षा एक-दूसरे के दुश्मन नहीं, बल्कि पूरक हैं।
रियो 2016 – वो ऐतिहासिक मुकाबला
17 अगस्त 2016 की वो रात भारतीय खेल इतिहास में हमेशा याद रखी जाएगी। 119 सदस्यों के भारतीय दल को 12 दिनों से पदक का इंतज़ार था और सारी उम्मीदें पहलवानों पर टिकी थीं। क्वार्टर फाइनल में हार के बाद रेपेचेज से कांस्य पदक के मुकाबले में पहुंचीं साक्षी का सामना किर्गिस्तान की ऐसुलू तिनिबेकोवा से था। मुकाबले में एक समय साक्षी 0-5 से पिछड़ रही थीं और लगा कि पदक हाथ से निकल जाएगा। लेकिन आखिरी लम्हों में उन्होंने जबरदस्त वापसी की और 8-5 से जीत दर्ज करके कांस्य पदक अपने नाम कर लिया। इस जीत के साथ साक्षी मलिक ओलंपिक पदक जीतने वाली भारत की पहली महिला पहलवान बन गईं और कर्णम मल्लेश्वरी, मैरी कॉम और साइना नेहवाल के बाद ओलंपिक पोडियम पर पहुंचने वाली चौथी भारतीय महिला एथलीट बनीं। उस रात रोहतक में ढोल-बाजे बजे और पूरा देश जश्न में डूब गया।
युवाओं के लिए संदेश
साक्षी मलिक की कहानी हर उस लड़की के लिए संदेश है, जिसे कहा जाता है कि फलां खेल तुम्हारे लिए नहीं है। उन्होंने साबित किया कि सपने जेंडर नहीं देखते – बस मेहनत देखते हैं। माता-पिता के लिए भी उनका सफर एक सबक है कि बेटियों के सपनों पर पाबंदी लगाने की बजाय उन्हें पंख देने चाहिए, क्योंकि साक्षी के माता-पिता के समर्थन के बिना ये कहानी अधूरी रहती। और सबसे बड़ी बात – वो हवाई जहाज़ वाला बचपन का सपना भी पूरा हुआ, क्योंकि आज साक्षी दुनिया भर में प्रतियोगिताओं के लिए उड़ान भरती हैं। जो सपना एक दिन आसमान की ओर देखकर देखा गया था, वो आज ज़मीन पर पदकों में बदल चुका है।
निष्कर्ष
मोखरा गांव के अखाड़े से रियो ओलंपिक के पोडियम तक का साक्षी मलिक का सफर सिर्फ एक पदक की कहानी नहीं है, बल्कि समाज की सोच बदलने की कहानी है। 2016 में उन्हें राजीव गांधी खेल रत्न से सम्मानित किया गया, 2017 में पद्म श्री मिला और 2022 के बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेलों में उन्होंने स्वर्ण पदक जीतकर फिर साबित किया कि उनकी आग अभी बुझी नहीं है। आज वो भारतीय रेलवे में अधिकारी हैं और नई पीढ़ी की पहलवान लड़कियों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। साक्षी की कहानी कहती है – ताने सुनो, मिट्टी से दोस्ती करो और एक दिन ऐसा दांव लगाओ कि पूरा देश तालियां बजाए।