Kisan Success Story: बंजर रेत पर अकेले उगाया 550 हेक्टेयर का जंगल – जादव ‘मोलाई’ पायेंग की प्रेरणादायक कहानी

Kisan Success Story: बंजर रेत पर अकेले उगाया 550 हेक्टेयर का जंगल – जादव ‘मोलाई’ पायेंग की प्रेरणादायक कहानी

जादव पायेंग को आज पूरी दुनिया ‘फॉरेस्ट मैन ऑफ इंडिया’ के नाम से जानती है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यह खिताब किसी सरकार ने एक दिन में नहीं दिया। इसके पीछे एक आदमी के चालीस साल से भी ज्यादा लंबे अकेले संघर्ष की कहानी है, जिसमें न तो कोई बड़ी संस्था साथ थी, न कोई फंडिंग और न ही शुरुआत में कोई पहचान। असम के एक छोटे से गाँव का यह साधारण युवक ब्रह्मपुत्र नदी के बंजर रेत के टापू पर अकेला पेड़ लगाता रहा, और आज वहीं सेंट्रल पार्क, न्यूयॉर्क से भी बड़ा घना जंगल खड़ा है। यह कहानी सिर्फ पेड़ लगाने की नहीं है, यह उस धुन की कहानी है जो एक इंसान को अकेले ही पहाड़ हिला देने की ताकत दे देती है।

माजुली के मिशिंग समुदाय का साधारण लड़का

जादव पायेंग का जन्म 31 अक्टूबर 1959 को असम के जोरहाट जिले में हुआ था। वे असम के मूलनिवासी मिशिंग (मिसिंग) समुदाय से आते हैं, जिनका जीवन ब्रह्मपुत्र नदी और उसकी धरती से गहरा जुड़ा हुआ है। बचपन में जादव का उपनाम ‘मोलाई’ था, और यही नाम बाद में उनके बनाए जंगल की पहचान बन गया। उनका परिवार कोई अमीर या प्रभावशाली परिवार नहीं था; पिता भैंसों का व्यापार करते थे और घर की जिंदगी सादगी से भरी थी। बचपन से ही जादव को खुला नीला आसमान, ऊँचे पेड़, पक्षियों की चहचहाहट और जानवरों से गहरा लगाव था। प्रकृति से यह मोहब्बत कोई सिखाई हुई चीज़ नहीं थी, बल्कि उनके खून में बसी हुई थी। गाँव की गलियों में खेलते-कूदते यह लड़का कभी नहीं जानता था कि एक दिन उसकी यही मोहब्बत पूरी दुनिया के लिए मिसाल बन जाएगी।

1979 की बाढ़: वो दिन जिसने सब बदल दिया

साल 1979 में ब्रह्मपुत्र नदी में आई भीषण बाढ़ ने असम के कई इलाकों को तबाह कर दिया था। बाढ़ का पानी उतरने के बाद जादव एक दिन नदी के किनारे रेतीले टापू पर घूम रहे थे, तभी उन्होंने एक ऐसा दृश्य देखा जिसने उनके दिल को झकझोर कर रख दिया। बाढ़ में बहकर आए सैकड़ों साँप उस बंजर रेतीले टापू पर पड़े थे, और छाँव न मिलने और तेज धूप की वजह से वे सब मर चुके थे। वह नज़ारा देखकर जादव की आँखों में आँसू आ गए और उनके मन में एक ही सवाल गूँजने लगा कि अगर यहाँ पेड़ होते, तो शायद ये बेज़ुबान जानवर बच जाते। यही वो पल था जिसने एक साधारण लड़के के अंदर पर्यावरण के सिपाही को जगा दिया। उन्होंने ठान लिया कि वे इस बंजर टापू को हरा-भरा करके रहेंगे, चाहे उन्हें यह काम अकेले ही क्यों न करना पड़े।

वन विभाग की सलाह और अकेली शुरुआत

जादव अपनी इस ठान के साथ सबसे पहले वन विभाग के अधिकारियों के पास पहुँचे और उनसे मदद माँगी। लेकिन अधिकारियों ने उन्हें एक सीधी सी सलाह दी — कि यह काम अगर करना है, तो तुम्हें खुद ही करना होगा। किसी ने यह नहीं सोचा था कि एक अकेला युवक इस बात को इतनी गंभीरता से ले लेगा। जादव निराश होने के बजाय और दृढ़ हो गए। उन्होंने 1979 में ही उस रेतीले टापू पर 20 बाँस के पौधे लगाकर अपनी मुहिम की शुरुआत कर दी। रेत में पेड़ लगाना आसान काम नहीं था; तेज धूप, बाढ़ का खतरा और पोषण की कमी — हर कदम पर प्रकृति ही सबसे बड़ी चुनौती थी। लेकिन जादव हर सुबह जंगल की ओर निकल पड़ते और पूरे दिन पौधों की देखभाल में लगे रहते, जैसे वे उनके अपने बच्चे हों।

कठिनाइयों भरा लंबा सफर

जादव के सामने मुश्किलें एक नहीं, अनेक थीं। सबसे पहली चुनौती थी लोगों की हँसी — गाँव के लोग उन्हें पागल कहने लगे थे, क्योंकि कोई नहीं समझ पा रहा था कि रेत पर पेड़ लगाने से क्या होगा। दूसरी बड़ी चुनौती थी पैसे की कमी; जादव के पास न तो कोई सरकारी अनुदान था, न ही कोई संस्था का सहारा। वे अपनी छोटी-मोटी कमाई से बीज खरीदते और दिन-रात मेहनत करते। ब्रह्मपुत्र की बाढ़ हर साल उनके लगाए कई पौधों को बहा ले जाती, और उन्हें फिर से शुरुआत करनी पड़ती। एक समय ऐसा भी आया जब हाथियों के झुंड ने उनके लगाए पेड़ों को नुकसान पहुँचाना शुरू कर दिया, और कुछ लोगों ने हाथियों को भगाने की माँग भी की। लेकिन जादव ने कभी हार नहीं मानी; उनका मानना था कि जंगल जानवरों का घर है, और अगर जंगल होगा तो जानवर आएँगे ही।

सफलता की रणनीति

जादव की सफलता किसी चमत्कार का नतीजा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी और धैर्य भरी रणनीति का फल है। उन्होंने प्रकृति को करीब से समझा और उसी के नियमों के हिसाब से काम किया।

सही पौधों का चुनाव

जादव ने शुरुआत बाँस से की, क्योंकि बाँस तेजी से बढ़ता है और रेतीली मिट्टी में भी जड़ें जमा लेता है। जब बाँस की जड़ें मिट्टी को बाँधने लगीं, तो उन्होंने धीरे-धीरे बरगद, पीपल, अर्जुन, सिमलू और बेल जैसे स्थानीय पेड़ लगाना शुरू किया। वे हमेशा उन्हीं प्रजातियों को चुनते जो असम की जलवायु और मिट्टी के अनुकूल थीं, ताकि पौधों को कृत्रिम देखभाल की ज्यादा जरूरत न पड़े। धीरे-धीरे जब पेड़ों से बीज गिरने लगे, तो जादव को बाहर से बीज लाने की जरूरत ही नहीं पड़ी — जंगल खुद अपनी अगली पीढ़ी तैयार करने लगा।

रोज़ की निरंतरता

जादव की सबसे बड़ी रणनीति थी — रुकना नहीं। वे हर दिन भोर में उठकर जंगल पहुँच जाते और घंटों पौधों की देखभाल करते। चाहे बारिश हो, धूप हो या बाढ़ का मौसम, उनका यह नियम कभी नहीं टूटा। उन्होंने कभी एक दिन में सैकड़ों पेड़ लगाने का दिखावा नहीं किया; बल्कि हर दिन थोड़ा-थोड़ा करके, सालों तक लगातार काम किया। यही निरंतरता वह जादू थी जिसने बंजर रेत को 550 हेक्टेयर के घने जंगल में बदल दिया। आज भी वे इसी नियम पर चलते हैं और नए इलाकों में हरियाली फैलाने के काम में लगे हैं।

प्रकृति के साथ दोस्ती, लड़ाई नहीं

जादव ने कभी प्रकृति से लड़ने की कोशिश नहीं की, बल्कि उसके साथ चलना सीखा। जब हाथी उनके जंगल में आने लगे, तो उन्होंने उन्हें भगाने के बजाय उनका स्वागत किया। आज मोलाई वन हाथियों का नियमित गलियारा है, जहाँ हर साल हाथियों के झुंड महीनों तक रहते हैं और वहाँ बच्चों को भी जन्म देते हैं। इसी तरह बाढ़ से बहने वाले पौधों को उन्होंने असफलता नहीं, बल्कि प्रकृति का हिस्सा माना और हर बार नए पौधे लगाए। यह सोच ही उन्हें बाकी सबसे अलग बनाती है — वे जंगल के मालिक नहीं, उसके सेवक बनकर रहे।

मोलाई वन: रेत से जंगल तक का चमत्कार

जादव की चार दशक से ज्यादा की मेहनत का नतीजा आज ‘मोलाई वन’ के रूप में दुनिया के सामने है। ब्रह्मपुत्र के किनारे जोरहाट के कोकिलामुख के पास स्थित यह जंगल करीब 1,360 एकड़ यानी 550 हेक्टेयर में फैला है — जो न्यूयॉर्क के सेंट्रल पार्क से भी बड़ा है। इस जंगल में आज बंगाल टाइगर, एक सींग वाले गैंडे, हिरण, बंदर, खरगोश और सैकड़ों प्रजातियों के पक्षी रहते हैं। बाढ़ के मौसम में यह जंगल गैंडों के लिए शरणस्थली बन जाता है, और प्रवासी पक्षियों के लिए सुरक्षित ठिकाना है। साल 2008 में जब करीब 100 हाथियों का झुंड इस जंगल में पहुँचा, तब जाकर वन विभाग और मीडिया की नज़र इस अनोखे जंगल पर पड़ी। इसके बाद जादव की कहानी पर ‘फॉरेस्ट मैन’ नाम से डॉक्यूमेंट्री बनी, जो कान फिल्म फेस्टिवल 2014 में भी दिखाई गई। साल 2015 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया, और पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने उन्हें ‘फॉरेस्ट मैन ऑफ इंडिया’ की उपाधि दी।

युवाओं के लिए संदेश

जादव पायेंग युवाओं से अक्सर एक ही बात कहते हैं — पेड़ लगाओ, धरती बचाओ। उनका मानना है कि पर्यावरण की रक्षा के लिए किसी बड़े पद या बड़ी रकम की जरूरत नहीं होती; जरूरत होती है सिर्फ सच्ची नीयत और रोज़ की छोटी-छोटी मेहनत की। वे कहते हैं कि इंसानों ने उनकी जिंदगी नहीं बदली, बल्कि पेड़ों ने उन्हें पहनने को कपड़े दिए और पक्षियों ने उन्हें सात समंदर पार पहुँचाया। उनका संदेश साफ है — अगर एक अकेला आदमी बंजर रेत पर जंगल खड़ा कर सकता है, तो हम सब मिलकर धरती को फिर से हरा-भरा कर सकते हैं। वे युवाओं से अपील करते हैं कि अपने गाँव, अपने शहर में जहाँ भी खाली ज़मीन दिखे, वहाँ एक पौधा जरूर लगाएँ और उसकी देखभाल करें।

निष्कर्ष

जादव ‘मोलाई’ पायेंग की कहानी हमें सिखाती है कि बड़ा बदलाव लाने के लिए बड़ी शुरुआत की जरूरत नहीं होती — जरूरत होती है एक सच्चे इरादे और उसे निभाने के धैर्य की। जिस टापू पर 1979 में साँप धूप में मर गए थे, आज वहीं बाघ, गैंडे और हाथी आज़ादी से घूमते हैं। यह बदलाव किसी सरकार, किसी कंपनी या किसी अभियान ने नहीं किया; यह एक अकेले इंसान के हाथों और उसके दिल की लगन से हुआ है। आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन से जूझ रही है, जादव पायेंग की कहानी हर भारतीय के लिए गर्व और प्रेरणा का स्रोत है। उनका जीवन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि अगर इरादा पक्का हो, तो एक इंसान भी धरती का नक्शा बदल सकता है।

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