Kisan Success Story: सूखे गांव को हरा-भरा बनाने वाले झारखंड के ‘वॉटरमैन’ – साइमन ओरांव की प्रेरणादायक कहानी
झारखंड के पहाड़ी इलाकों में बरसात आती तो थी, लेकिन उसका पानी टिकता नहीं था। ढलानों से बहकर सारा पानी नालों में चला जाता था और बाकी साल गांव पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसता रहता था। खेत बंजर पड़े रहते थे, कुएं सूख जाते थे और रोजी-रोटी की तलाश में लोगों को शहरों की ओर पलायन करना पड़ता था। ऐसे ही एक गांव में रहने वाले साइमन ओरांव ने सोचा कि अगर पानी रोक लिया जाए, तो किस्मत भी बदल सकती है। लोग उन्हें आज ‘सिमोन बाबा’ और ‘झारखंड का वॉटरमैन’ कहते हैं, लेकिन एक समय था जब उनकी बात को कोई गंभीरता से नहीं लेता था।
बचपन और गांव की तकलीफ
साइमन ओरांव का जन्म झारखंड के रांची-लोहरदगा क्षेत्र के एक साधारण आदिवासी किसान परिवार में हुआ था। बचपन से ही उन्होंने देखा था कि उनके गांव और आसपास के इलाकों में पानी की कितनी किल्लत रहती है। गर्मियों में तालाब सूख जाते थे, खेतों में फसल लगाने के लिए पानी नहीं मिलता था और पीने के पानी के लिए महिलाओं को मीलों दूर जाना पड़ता था। गांव के नौजवान काम की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर जाते थे, जिससे बस्तियां धीरे-धीरे वीरान होती जा रही थीं। यह दृश्य देखकर साइमन के मन में बार-बार एक ही सवाल उठता था कि जब बारिश इतना पानी देती है, तो वह हमारी जमीन पर क्यों नहीं टिकता।
वह फैसला जिसने जिंदगी बदल दी
1960 के दशक में साइमन ओरांव ने एक ऐसा फैसला लिया, जिसे सुनकर गांव के लोग हंस पड़े। उन्होंने ठान लिया कि वह बारिश के बहते पानी को रोकेंगे और अपनी जमीन पर ही उसे सहेजेंगे। उस समय उनके पास न तो कोई सरकारी योजना थी, न पैसे और न ही कोई इंजीनियरिंग की डिग्री। उनके पास था तो बस प्रकृति का गहरा अनुभव और पारंपरिक तरीकों का ज्ञान, जो पीढ़ियों से आदिवासी समाज में चला आ रहा था। उन्होंने अपनी जमीन के बहाव को समझा और मिट्टी खोदकर छोटे-छोटे बांध और तालाब बनाने शुरू कर दिए, ताकि बरसात का पानी वहीं रुक सके।
संघर्ष का लंबा दौर
शुरुआत के साल सबसे कठिन थे। साइमन अकेले या दो-चार साथियों के साथ सुबह से शाम तक मिट्टी खोदते और नहरें बनाते थे। कोई मशीन नहीं थी, कोई मजदूरी नहीं मिलती थी, और सरकारी दफ्तरों से भी कोई मदद नहीं मिली। गांव के कुछ लोग उनका मजाक उड़ाते थे और कहते थे कि मिट्टी के बांध पहली ही तेज बारिश में बह जाएंगे। कई बार बनाई गई संरचनाएं टूट भी गईं, लेकिन साइमन ने हर असफलता से कुछ नया सीखा और काम को और मजबूत तरीके से दोहराया। धीरे-धीरे कुछ ग्रामीणों को उनकी लगन दिखने लगी और वे भी उनके साथ जुड़ने लगे।
सफलता की रणनीति
साइमन ओरांव ने पानी की समस्या को एक समग्र योजना के तहत सुलझाया। उन्होंने सिर्फ बांध नहीं बनाए, बल्कि पानी, मिट्टी और जंगल को एक साथ बचाने का काम किया। उनकी रणनीति के मुख्य स्तंभ आज भी जल संरक्षण के विशेषज्ञों के लिए मिसाल हैं।
1. बारिश के पानी को रोकने के चेक डैम
साइमन ने नालों और ढलानों पर छोटे-छोटे चेक डैम बनाए, ताकि बरसात का पानी बहकर दूर न जाए और जमीन में रिसकर भूजल स्तर को बढ़ाए। इन डैमों को उन्होंने स्थानीय मिट्टी और पत्थरों से बनाया, जिससे खर्चा न के बराबर आया और मरम्मत भी गांव के लोग खुद कर सकें। धीरे-धीरे इन इलाकों में कुओं का पानी बढ़ने लगा और जो खेत साल में एक फसल भी नहीं दे पाते थे, वहां दो-तीन फसलें होने लगीं।
2. तालाबों और कुओं का पुनर्जीवन
गांवों में जो पुराने तालाब और कुएं मिट्टी से भरकर बेकार हो चुके थे, साइमन ने उन्हें खोदकर फिर से जीवित किया। उन्होंने समझा था कि पानी सिर्फ नई संरचनाओं से नहीं, बल्कि पुरानी जल-व्यवस्था को बचाकर भी मिल सकता है। इन तालाबों में बरसात का पानी जमा होने लगा, जिससे मवेशियों को पानी मिला और खेतों की सिंचाई आसान हो गई।
3. पेड़ लगाना और जंगलों की रक्षा
साइमन जानते थे कि जंगल कटेंगे तो पानी भी नहीं रुकेगा, इसलिए उन्होंने हजारों पेड़ लगाए और वनों की कटाई रोकने के लिए गांव में कड़े सामाजिक नियम बनवाए। पेड़ों की जड़ें मिट्टी को बांधे रखती हैं और बारिश के पानी को जमीन में उतारने में मदद करती हैं। उनके इस काम से इलाके का पर्यावरण सुधरा और वन्य जीवन को भी सहारा मिला।
4. लोगों को साथ जोड़ना
साइमन की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि उन्होंने काम को अकेले नहीं, बल्कि पूरे समुदाय का काम बना दिया। उन्होंने ग्रामीणों को समझाया कि पानी सबका है, तो इसे बचाने की जिम्मेदारी भी सबकी है। धीरे-धीरे गांव-गांव में लोग उनके साथ जुड़ते गए और जल संरक्षण एक जन आंदोलन बन गया। यही वजह है कि उनकी बनाई व्यवस्था आज भी गांव के लोग मिलकर संभालते हैं।
सफलता का वह क्षण
दशकों की मेहनत का फल 2016 में मिला, जब भारत सरकार ने साइमन ओरांव को पद्म श्री से सम्मानित किया। जल संरक्षण और जंगल बचाने के उनके असाधारण काम को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली और वे ‘झारखंड के वॉटरमैन’ के नाम से पूरे देश में जाने जाने लगे। हाल ही में लोहरदगा के सांसद सुखदेव भगत खुद उनसे मिलने उनके आवास पहुंचे और उनके योगदान की सराहना की। उनकी जिंदगी से प्रेरित होकर हाल में ‘वॉटरमैन’ नाम का एक माइक्रो-ड्रामा भी बना है, जिसकी शूटिंग झारखंड में ही हुई है, ताकि नई पीढ़ी उनकी कहानी से जुड़ सके।
युवाओं के लिए संदेश
साइमन ओरांव की जिंदगी युवाओं को सिखाती है कि बड़ी डिग्री या सरकारी मदद के बिना भी बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। उन्होंने साबित किया कि अपने गांव की समस्या को समझना और उसके लिए लगातार काम करना ही असली शिक्षा है। उनका मानना है कि पानी की जरूरत और उसके महत्व को समझकर ही सामूहिक रूप से बदलाव लाया जा सकता है। अगर युवा अपनी जमीन, अपने पानी और अपने जंगल से जुड़ जाएं, तो पलायन की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। जब उनसे उनकी उपलब्धियों के बारे में पूछा जाता है, तो वह मुस्कुराकर कहते हैं कि यह सब तो भगवान की देन है।
निष्कर्ष
साइमन ओरांव की कहानी सिर्फ एक किसान की कहानी नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के साथ जीने की कला की कहानी है। उन्होंने दिखाया कि मिट्टी, पानी और पेड़ों को बचाकर इंसान अपनी तकदीर खुद लिख सकता है। एक अकेले व्यक्ति के संकल्प ने सूखे गांवों को हरा-भरा कर दिया और हजारों किसानों की जिंदगी बदल दी। आज जब जलवायु परिवर्तन और पानी की कमी पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है, तब सिमोन बाबा का काम और भी प्रासंगिक हो गया है। उनकी जिंदगी हर भारतीय को यह संदेश देती है कि बदलाव के लिए शुरुआत छोटी हो सकती है, बस इरादा बड़ा होना चाहिए।