UPSC Success Story: पूरी तरह सुन नहीं पाए, फिर भी 3 बार क्रैक किया UPSC, 15 साल बाद बने IAS – मनीराम शर्मा की प्रेरणादायक कहानी

UPSC Success Story: पूरी तरह सुन नहीं पाए, फिर भी 3 बार क्रैक किया UPSC, 15 साल बाद बने IAS – मनीराम शर्मा की प्रेरणादायक कहानी

कई बार ज़िंदगी हमें ऐसी चुनौतियां देती है, जिनके सामने बड़े से बड़ा हौसला भी डगमगा जाए। लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो हर मुसीबत को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लेते हैं। मनीराम शर्मा भी ऐसी ही एक प्रेरक शख्सियत हैं, जिनकी कहानी आज देश के लाखों युवाओं के लिए एक मिसाल बन चुकी है। राजस्थान के अलवर जिले के छोटे से गांव बड़नगढ़ी में जन्मे मनीराम ने महज़ पांच साल की उम्र में सुनने की क्षमता खोना शुरू किया और नौ साल तक आते-आते वे पूरी तरह से बहरे हो गए थे। इसके बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी और पढ़ाई को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया। अगर आप भी सिविल सेवा का सपना देखते हैं, तो सबसे पहले अपनी eligibility UPSC Eligibility Calculator से जांचें और फिर पूरे जोश के साथ तैयारी में जुट जाएं।

खामोशी भरा बचपन और पढ़ाई का जुनून

मनीराम के माता-पिता दोनों ही अनपढ़ खेत-मज़दूर थे और उनके पास बेटे के कान के इलाज के लिए पैसे नहीं थे। गांव बड़नगढ़ी इतना छोटा था कि वहां स्कूल तक नहीं था, इसलिए मनीराम रोज़ाना पांच किलोमीटर पैदल चलकर पढ़ने जाते थे। बचपन से ही उन्होंने किताबों से गहरी दोस्ती कर ली थी और सुन न पाने की कमी को उन्होंने पढ़ाई के ज़रिए पूरा करने का फैसला किया। कक्षा दसवीं में उन्होंने राजस्थान बोर्ड में पांचवां स्थान हासिल किया, जबकि बारहवीं में वे सातवें स्थान पर रहे। यह उपलब्धि इसलिए और भी बड़ी थी, क्योंकि उन्हें सुनाई न देने की वजह से कक्षा में शिक्षकों की बातें समझने के लिए दोगुनी मेहनत करनी पड़ती थी।

चपरासी की नौकरी से ठुकराए जाने का दर्द

मनीराम के पिता चाहते थे कि बेटे को कहीं कोई छोटी-मोटी सरकारी नौकरी मिल जाए, ताकि घर का गुज़ारा आसान हो सके। उन्होंने ब्लॉक विकास अधिकारी के दफ़्तर में चपरासी के पद के लिए मनीराम की अर्जी लगवाई, लेकिन अधिकारी ने यह कहकर अर्जी खारिज कर दी कि जो सुन नहीं सकता, वह इस काम के लायक नहीं है। यह ठुकरावा मनीराम के दिल पर गहरा घाव कर गया, लेकिन उन्होंने इसे अपनी हार नहीं, बल्कि अपने संकल्प की आग बना लिया। उसी दिन उन्होंने ठान लिया कि अब वे ऐसी जगह पहुंचेंगे, जहां कोई उन्हें इस तरह ठुकरा न सके। यह दर्द ही आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा बन गया और उन्होंने UPSC की तैयारी को ही अपना लक्ष्य मान लिया।

क्लर्क से लेक्चरर और PhD तक का लंबा सफ़र

कॉलेज के दूसरे साल में ही मनीराम ने राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) की परीक्षा पास कर क्लर्क-कम-टाइपिस्ट की नौकरी हासिल कर ली थी। नौकरी के साथ-साथ वे पढ़ाई भी करते रहे और अंतिम वर्ष में उन्होंने राजनीति शास्त्र में विश्वविद्यालय में टॉप किया। इसके बाद उन्होंने NET परीक्षा भी पास की और क्लर्क की नौकरी छोड़कर कॉलेज लेक्चरर बन गए, फिर जूनियर रिसर्च फेलो बनकर राजनीति शास्त्र में PhD पूरी की। PhD के दौरान वे राजस्थान विश्वविद्यालय में MPhil और MA के छात्रों को पढ़ाते भी रहे। इतनी उपलब्धियों के बाद उन्होंने राजस्थान प्रशासनिक सेवा (RAS) की परीक्षा भी पास कर ली, लेकिन उनका असली सपना तो UPSC ही था। उन्होंने RAS की नौकरी के दौरान ही सिविल सेवा की तैयारी शुरू कर दी थी।

सफलता की रणनीति

अपने मजबूत विषय पर पूरी पकड़

मनीराम की सबसे बड़ी रणनीति थी अपने वैकल्पिक विषय राजनीति शास्त्र पर पूरी तरह से पकड़ बनाना। उन्होंने ग्रेजुएशन से लेकर PhD तक इसी विषय की गहराई में उतरकर काम किया, जिसकी वजह से मेन्स परीक्षा में उन्हें हमेशा बढ़त मिली। वे मानते थे कि अगर एक विषय में आप दूसरों से एक कदम आगे हैं, तो पूरी परीक्षा में आत्मविश्वास बना रहता है। इसके साथ ही उन्होंने सामान्य अध्ययन के सभी पेपरों को बराबर समय दिया और NCERT की किताबों को बार-बार दोहराया।

असफलता के बाद भी न रुकने वाला हौसला

मनीराम ने पहली बार 2005 में UPSC परीक्षा पास की और श्रवण बाधित श्रेणी में टॉप भी किया, लेकिन सरकारी नीति की आड़ में उन्हें IAS के बजाय पोस्ट व टेलीग्राफ खातों की सेवा दी गई। उन्होंने 2006 में फिर परीक्षा पास की, लेकिन उसी बाधा का सामना करना पड़ा। आम इंसान ऐसी दोहरी निराशा के बाद टूट जाता, लेकिन मनीराम ने कान के ऑपरेशन (कॉक्लियर इम्प्लांट) का रास्ता चुना और 2009 में तीसरी बार परीक्षा पास करके आखिरकार IAS में जगह बनाई। उनकी यह कहानी साबित करती है कि लगातार प्रयास करने वाले को सफलता एक न एक दिन ज़रूर मिलती है।

निरंतरता और अनुशासन

मनीराम ने कभी एक दिन भी पढ़ाई से दूरी नहीं बनाई, चाहे वे नौकरी में हों या पढ़ाई के बीच में कोई व्यवधान आए। वे हर विषय के नोट्स खुद बनाते थे और नियमित रूप से पुराने प्रश्नपत्र हल करते थे। साक्षात्कार के दौरान तो उन्होंने यह कमाल कर दिखाया कि 300 में से 220 अंक हासिल किए, जो उस साल के टॉप 50 इंटरव्यू स्कोर में से एक था। यह सब उनकी तैयारी की निरंतरता और गहरे आत्मविश्वास का नतीजा था, जो उन्हें बाकी अभ्यर्थियों से अलग बनाता था।

सफलता का पल: 15 साल का संघर्ष रंग लाया

साल 2009 में जब मनीराम तीसरी बार सिविल सेवा परीक्षा में सफल हुए, तो उनके लिए यह सिर्फ एक नौकरी नहीं, बल्कि 15 साल के लंबे संघर्ष का मीठा फल था। सरकारी नीति के चलते श्रवण बाधित अभ्यर्थियों के लिए IAS का रास्ता लगभग बंद था, लेकिन मनीराम ने न तो कोर्ट के दरवाज़े खटखटाने से परहेज़ किया और न ही अपने कान के महंगे ऑपरेशन से पीछे हटे। करीब साढ़े सात लाख रुपये के इस ऑपरेशन के लिए उन्हें सांसद और समाज के लोगों का सहयोग भी मिला था। आखिरकार जब IAS में चयन की खबर आई, तो वे खुद अपने गांव बड़नगढ़ी जाकर परिवार और गांव वालों को यह खुशखबरी सुनाना चाहते थे। उनका कहना था कि जिस गांव ने उनका संघर्ष देखा है, वही गांव उनकी सफलता का जश्न भी मनाएगा।

युवाओं के लिए संदेश

मनीराम शर्मा का मानना है कि शारीरिक कमी कभी भी सफलता की राह में रुकावट नहीं बन सकती, अगर इंसान के इरादे मज़बूत हों। वे अक्सर कहते हैं कि जिस दिन उन्हें चपरासी की नौकरी से ठुकराया गया था, उसी दिन उन्होंने अपने भीतर एक नया इंसान खोजा था। उनका संदेश है कि असफलता से डरने की बजाय उससे सीखना चाहिए और हर बार पहले से ज़्यादा मेहनत के साथ मैदान में उतरना चाहिए। जो युवा आर्थिक तंगी, शारीरिक चुनौती या सामाजिक दबाव से जूझ रहे हैं, उनके लिए मनीराम की कहानी एक जीता-जागता सबूत है कि मंज़िल उन्हीं को मिलती है जो चलते रहने का हौसला रखते हैं।

निष्कर्ष

मनीराम शर्मा की कहानी सिर्फ एक IAS अफसर की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह इंसानी जज़्बे और धैर्य की एक महान गाथा है। बहरेपन जैसी गंभीर चुनौती, गरीबी, ठुकरावा और सरकारी नीतियों की दीवारों के बावजूद उन्होंने 15 साल तक अपना लक्ष्य नहीं छोड़ा और आखिरकार जीत हासिल की। आज उनकी कहानी देश के हर उस युवा के लिए प्रेरणा है, जो किसी न किसी कमी या कठिनाई को अपनी हार का बहाना बनाता है। मनीराम ने साबित कर दिया कि कान सुनते हों या न हों, लेकिन अगर सपनों की आवाज़ दिल में गूंजती रहे, तो कोई भी मंज़िल दूर नहीं रहती।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *