Sports Success Story: सत्रह की उम्र में खोई टांग, फिर बना दो बार का पैरालिंपिक चैंपियन – सुमित अंतिल की प्रेरणादायक कहानी
सुमित अंतिल की कहानी उस लड़के की है, जिसकी ज़िंदगी सत्रह साल की उम्र में एक सड़क हादसे में थमती हुई दिखी, लेकिन उसने उसी मोड़ से नई ज़िंदगी शुरू कर दी। हरियाणा के सोनीपत के एक छोटे से गाँव खेवड़ा से निकलकर वह आज दुनिया का सबसे महान पैरा-भाला फेंक खिलाड़ी है। टोक्यो पैरालिंपिक 2020 में उसने स्वर्ण पदक जीता और फिर पेरिस 2024 में अपना खिताब बरकरार रखा। एक टांग कटने के बाद भाला फेंक में विश्व रिकॉर्ड पर विश्व रिकॉर्ड बनाना – यह कहानी हर उस इंसान के लिए है जो हालात के सामने हार मान चुका है।
सोनीपत के छोटे से गाँव का सपना
सुमित अंतिल का जन्म 7 जून 1998 को हरियाणा के सोनीपत जिले के खेवड़ा गाँव में हुआ था। उनके पिता भारतीय वायुसेना में जूनियर वारंट ऑफिसर थे, लेकिन सुमित जब सिर्फ सात साल के थे, तभी पिता का साया उनके सिर से उठ गया। माँ निर्मला देवी ने अकेले ही बच्चों को पाला और घर की हर खुशी उनके नाम कर दी। बचपन से ही सुमित को खेलों से बेइंतहा लगाव था और उनका सबसे बड़ा सपना था पहलवान बनना। उस दौर के हर हरियाणवी लड़के की तरह उनके आदर्श थे योगेश्वर दत्त, और वे भी भारतीय सेना में भर्ती होकर देश का नाम रोशन करना चाहते थे।
स्कूल के दिनों में सुमित की फुर्ती और ताकत देखकर सब कहते थे कि एक दिन यह लड़का कुछ बड़ा करेगा। घर की आर्थिक स्थिति साधारण थी, लेकिन माँ ने कभी बेटे के सपनों के आड़े पैसा नहीं आने दिया। ट्यूशन के बाद अखाड़े की मिट्टी में पसीना बहाना सुमित की रोज़ की दिनचर्या थी। किसी को नहीं पता था कि एक शाम सब कुछ बदल जाएगा और कुश्ती का यह सपना एक दर्दनाक हादसे में टूट जाएगा।
वो एक जनवरी, जो ज़िंदगी बदल गई
5 जनवरी 2015 की वह शाम सुमित की ज़िंदगी का सबसे काला दिन बन गई। ट्यूशन से साइकिल पर घर लौटते वक्त एक तेज़ रफ़्तार ट्रक/ट्रैक्टर ने पीछे से उनकी बाइक को टक्कर मार दी। सुमित सड़क पर गिरे और ट्रक का पहिया उनकी बाईं टांग पर चढ़ गया। उन्हें तुरंत वायुसेना के अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों के पास घुटने के नीचे से टांग काटने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। सत्रह साल की उम्र में एक टांग गंवाना किसी भी युवक के लिए मौत से कम नहीं था।
अस्पताल के बिस्तर पर लेटे सुमित के मन में एक ही सवाल घूमता था – अब कुश्ती का सपना कैसे पूरा होगा? महीनों तक वे बैसाखियों और नकली टांग के साथ जीना सीखते रहे, लेकिन मन टूटा हुआ था। दोस्त बाहर खेलते और वे कमरे में बंद रहते। माँ ने उन्हें समझाया कि ज़िंदगी रुकने का नाम नहीं है, और यही बात धीरे-धीरे सुमित के दिल में उतरने लगी। दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में बी.कॉम की पढ़ाई के दौरान ही उनकी मुलाकात एक पैरा-एथलीट राजकुमार से हुई, जिसने उनकी ज़िंदगी का रास्ता ही बदल दिया।
अँधेरे में रोशनी की तलाश
राजकुमार ने सुमित को पैरा-एथलेटिक्स की दुनिया से परिचित कराया और 2017 में सुमित ने भाला फेंक थाम लिया। शुरुआत में नई दिल्ली में पैरा-एथलेटिक्स कोच नितिन जयसवाल के मार्गदर्शन में उन्होंने ट्रेनिंग शुरू की, और फिर एशियाई खेलों के रजत पदक विजेता वीरेंद्र धांकड़ ने उन्हें दिल्ली के भाला कोच नवल सिंह से मिलवाया। हादसे के बाद सुमित ने लंबे समय से कोई व्यायाम नहीं किया था, इसलिए पहले उन्हें अपनी ताकत और सहनशक्ति को ज़ीरो से बनाना पड़ा। नकली टांग के साथ संतुलन बनाना और भाला फेंक की तकनीक सीखना दोनों ही पहाड़ जैसी चुनौतियाँ थीं।
2018 में जकार्ता एशियन पैरा गेम्स में अपने अंतरराष्ट्रीय डेब्यू में सुमित पाँचवें स्थान पर रहे, लेकिन यह शुरुआत उनके लिए सीख का खज़ाना थी। 2019 में गो-स्पोर्ट्स फाउंडेशन ने उन्हें अपने पैरा चैंपियंस प्रोग्राम में शामिल किया, जिससे ट्रेनिंग और सुविधाओं का स्तर बदल गया। उसी साल इटली में वर्ल्ड पैरा एथलेटिक्स ग्रांड प्रिक्स में सुमित ने 60.45 मीटर के थ्रो के साथ रजत पदक जीता और एफ64 श्रेणी का विश्व रिकॉर्ड तोड़ दिया। कुछ ही महीने बाद दुबई विश्व चैंपियनशिप में उन्होंने 62.88 मीटर फेंककर फिर से रजत जीता और अपना ही रिकॉर्ड तोड़ डाला।
सफलता की रणनीति
सुमित अंतिल की सफलता सिर्फ ताकत का खेल नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का नतीजा थी। उन्होंने हार को कभी रुकने की वजह नहीं बनाया, बल्कि हर हार से सबक सीखा और आगे बढ़े। आइए जानते हैं वे सिद्धांत, जिन पर चलकर एक दिव्यांग लड़का दुनिया का चैंपियन बना।
1. सही गुरु का चुनाव और पूरी श्रद्धा
सुमित समझते थे कि प्रतिभा अकेले मंज़िल नहीं दिलाती, उसके लिए सही राह दिखाने वाला गुरु चाहिए। नितिन जयसवाल से लेकर नवल सिंह तक, उन्होंने हर कोच की हर बात को पत्थर की लकीर की तरह माना। ट्रेनिंग में बताई गई छोटी-छोटी तकनीकी बारीकियों – पैरों का संतुलन, हाथ का कोण, दौड़ का रिदम – पर उन्होंने घंटों अभ्यास किया। जब गुरु पर अटूट भरोसा हो, तो शिष्य की मेहनत दोगुनी हो जाती है, और सुमित इसका जीवंत उदाहरण हैं।
2. रोज़ का अनुशासन और शरीर की देखभाल
प्रोस्थेटिक (नकली) टांग के साथ एथलीट बनने के लिए शरीर को दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है। सुमित ने रोज़ाना सुबह-शाम की ट्रेनिंग को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बना लिया, चाहे मौसम कैसा भी हो। उन्होंने अपनी डाइट, नींद और रिकवरी पर उतना ही ध्यान दिया जितना थ्रो पर। एक पैरा-एथलीट के लिए छोटी सी चोट भी बड़ा खतरा होती है, इसलिए उन्होंने फिजियोथेरेपी और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग को कभी नज़रअंदाज़ नहीं किया।
3. मानसिक मज़बूती – दर्द को ताकत में बदलना
सुमित की सबसे बड़ी जीत मैदान में नहीं, मन में हुई थी। हादसे के बाद का अवसाद, लोगों की तरस भरी नज़रें और खुद की कमज़ोरी का एहसास – इन सबको उन्होंने धीरे-धीरे अपनी ताकत बना लिया। वे कहते हैं कि जब आपने सबसे बुरा वक्त देख लिया हो, तो मैदान का दबाव आपको डराता नहीं है। टोक्यो फाइनल में विश्व रिकॉर्ड तोड़ते वक्त उनके चेहरे पर जो शांति थी, वह इसी मानसिक मज़बूती का नतीजा थी।
4. रिकॉर्ड से आगे का लक्ष्य
सुमित कभी अपने बनाए रिकॉर्ड से संतुष्ट नहीं हुए, उनका लक्ष्य हमेशा खुद को पीछे छोड़ना रहा। 2019 में 60.45 मीटर से शुरू हुआ सफर 62.88, 68.55, 70.83 और फिर 73.29 मीटर तक पहुँचा – हर बार उन्होंने अपना ही विश्व रिकॉर्ड तोड़ा। उनका सपना एक दिन सक्षम (able-bodied) ओलंपियनों के बराबर थ्रो करना है। यह “और आगे, और बेहतर” की सोच ही उन्हें बाकी खिलाड़ियों से अलग करती है।
टोक्यो से पेरिस तक – चैंपियन का सफर
2021 में हुए टोक्यो 2020 पैरालिंपिक खेलों में सुमित अंतिल ने इतिहास रच दिया। एफ64 भाला फेंक के फाइनल में उन्होंने तीन बार विश्व रिकॉर्ड तोड़ा और 68.55 मीटर के थ्रो के साथ स्वर्ण पदक अपने नाम किया। उस रात भारत का तिरंगा सबसे ऊँचा लहराया और सोनीपत के खेवड़ा गाँव में जश्न का माहौल बन गया। इसी प्रदर्शन के लिए उन्हें 2021 में मेजर ध्यानचंद खेल रत्न और 2022 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया।
लेकिन सुमित यहीं नहीं रुके। 2023 में पेरिस वर्ल्ड पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 70.83 मीटर और हांगझोउ एशियन पैरा गेम्स में 73.29 मीटर के विश्व रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण जीता। फिर 2024 के पेरिस पैरालिंपिक में उन्होंने 70.59 मीटर के थ्रो से अपना खिताब बरकरार रखा और लगातार दो पैरालिंपिक स्वर्ण जीतने वाले चुनिंदा भारतीयों में शामिल हो गए। आज सुमित एफ64 श्रेणी में दुनिया के बेताज बादशाह हैं और हर युवा एथलीट के लिए प्रेरणा का स्रोत।
युवाओं के लिए संदेश
सुमित अंतिल का युवाओं को सीधा संदेश है – “आपकी सबसे बड़ी दिव्यांगता आपका मन हो सकता है, शरीर नहीं।” वे कहते हैं कि ज़िंदगी में हादसे, असफलताएँ और रुकावटें आएँगी, लेकिन हार वही मानता है जो कोशिश करना छोड़ दे। अगर एक टांग गंवाकर भी कोई दुनिया का चैंपियन बन सकता है, तो आपके पास तो पूरी ताकत है। बस ज़रूरत है एक सपने की, एक गुरु की और रोज़ की ईमानदार मेहनत की।
वे यह भी कहते हैं कि दिव्यांगता को कभी शर्म की नज़र से न देखें, बल्कि उसे अपनी पहचान बनाने का मौका समझें। सुमित आज स्कूलों और खेल अकादमियों में जाकर बच्चों से मिलते हैं और उन्हें बताते हैं कि “असंभव” शब्द सिर्फ किताबों में होता है, मैदान में नहीं। उनकी कहानी हर उस बच्चे के लिए उम्मीद की किरण है, जो गरीबी, हादसे या किसी कमज़ोरी की वजह से अपने सपनों को दफ़न कर चुका है।
निष्कर्ष
सुमित अंतिल की कहानी हमें सिखाती है कि ज़िंदगी का सबसे बड़ा हादसा भी नई शुरुआत का दरवाज़ा खोल सकता है। खेवड़ा गाँव के उस लड़के ने, जिसने सत्रह साल की उम्र में अपनी टांग खो दी थी, आज भाला फेंक में ऐसे-ऐसे रिकॉर्ड बना दिए हैं जिन्हें तोड़ना दुनिया के लिए चुनौती है। टोक्यो और पेरिस के स्वर्ण, खेल रत्न और पद्म श्री – ये सब उसकी उस जिद का फल हैं, जो उसने अस्पताल के बिस्तर से उठते ही ठान ली थी। सुमित अंतिल सिर्फ एक खिलाड़ी नहीं, एक सोच हैं – कि हौसला हो तो मंज़िलें खुद रास्ता बना लेती हैं।