Kisan Success Story: लाखों किसानों को मुफ्त बीज बांटने वाले ‘किसान बाबा’ – प्रकाश सिंह रघुवंशी की प्रेरणादायक कहानी
बनारस के पास एक छोटे से गाँव में एक ऐसा किसान रहता है, जिसे लोग प्यार से ‘किसान बाबा’ कहते हैं। उसके पास ज़मीन सिर्फ़ साढ़े तीन एकड़ है, आँखें कमज़ोर हैं और जेब हमेशा खाली रहती है, लेकिन उसका दिल इतना बड़ा है कि वह आज देशभर के एक लाख से ज़्यादा किसानों को मुफ़्त में बीज बाँट चुका है। यह कहानी है प्रकाश सिंह रघुवंशी की — उस शख़्स की जिसने खुद की मेहनत से गेहूँ, धान, अरहर और सरसों की ऐसी किस्में विकसित कीं, जिनकी पैदावार बाज़ार के बीजों से 20-40 फ़ीसदी ज़्यादा है।
बचपन और पृष्ठभूमि: टांडिया गाँव का साधारण किसान
प्रकाश सिंह रघुवंशी का जन्म वाराणसी से लगभग बीस किलोमीटर दूर टांडिया गाँव में हुआ, जहाँ उनके परिवार की ज़िंदगी हमेशा खेती के इर्द-गिर्द घूमती रही। उनके पास कुल साढ़े तीन एकड़ ज़मीन है, जिस पर वे गेहूँ, धान और अरहर की खेती करते थे, लेकिन गाँव में बेहतर किस्म के बीज उपलब्ध ही नहीं थे। हर किसान महंगे हाइब्रिड बीजों पर निर्भर था, पैदावार कम मिलती थी और लागत ज़्यादा जाती थी, जिससे ज़िंदगी मुश्किलों से भरी रहती थी। प्रकाश सिंह की औपचारिक शिक्षा ज़्यादा नहीं हो पाई और आँखों की रौशनी भी कमज़ोर थी, लेकिन प्रकृति को देखने की उनकी नज़र हमेशा से सबसे तेज़ थी। वे अक्सर खेतों में लाखों पौधों के बीच से अलग और मज़बूत दिखने वाले पौधों को चुनकर रख लेते थे, बिना यह जाने कि यही आदत एक दिन उनकी ज़िंदगी बदल देगी।
मोड़ का फैसला: 1995 में खुद बीज बनाने की ठान ली
साल 1995 में प्रकाश सिंह की मुलाक़ात बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर डॉ. महतिम सिंह से हुई, जो बाद में जीबी पंत कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति भी बने। डॉ. सिंह ने उन्हें एक ऐसी बात कही जो उनके दिल में उतर गई — कि अगर किसान खुद अपने खेतों से बेहतर बीज विकसित कर लें, तो देश के लाखों किसानों की तकदीर बदल सकती है। बस यहीं से प्रकाश सिंह ने ठान लिया कि वे अब बाज़ार के महंगे बीजों के भरोसे नहीं रहेंगे और खुद नई किस्में विकसित करेंगे। उन्होंने अपने खेत को ही प्रयोगशाला बना लिया और ‘मास सेलेक्शन’ विधि से — यानी पौधों की खूबियों को देखकर बार-बार चयन करके — नई किस्में बनाने का काम शुरू कर दिया। गाँव के लोगों ने पहले इसे पागलपन कहा, लेकिन प्रकाश सिंह ने अपना काम नहीं छोड़ा।
संघर्ष: कर्ज़, कमज़ोर आँखें और हर तरफ से ताने
प्रकाश सिंह का रास्ता फूलों भरा बिल्कुल नहीं था। प्रयोगों के लिए पैसा चाहिए था, इसलिए उन्होंने बैंकों और दोस्तों से कर्ज़ लिया और एक बार तो बैंक ने 75 हज़ार रुपये न चुकाने पर ज़मीन नीलाम करने का नोटिस तक भेज दिया। उनकी आँखें पहले से कमज़ोर थीं और लंबे समय तक खेतों में काम करने से तबीयत भी बिगड़ती रही, फिर भी वे सुबह से शाम तक पौधों के बीच ही दिखते थे। शुरुआती सालों में उनके प्रयोग बार-बार नाकाम हुए, लोग हँसते थे कि एक छोटा किसान वैज्ञानिक बनने चला है। ज़िंदगी ने निजी मोर्चे पर भी बड़ी चोट दी — उनकी पत्नी शकुंतला सिंह गंभीर बीमारी के कारण लंबे समय तक अस्पताल में रहीं और इलाज में लाखों रुपये खर्च हो गए, यहाँ तक कि उन्हें पत्नी के गहने तक बेचने पड़े। लेकिन इन तमाम मुश्किलों के बीच प्रकाश सिंह ने बीज बनाने का काम एक दिन भी नहीं रोका, क्योंकि उनका मानना था कि ईश्वर ने उन्हें किसानों की सेवा के लिए चुना है।
सफलता की रणनीति: खुद का बीज, खुद का स्वाद
1. चुनने की कला — मास सेलेक्शन विधि
प्रकाश सिंह की सबसे बड़ी रणनीति उनकी आँखें थीं। वे लाखों पौधों के बीच से उन चुनिंदा पौधों को पहचान लेते थे, जिनमें ज़्यादा बालियाँ, मज़बूत डंठल और बीमारी से लड़ने की ताक़त दिखती थी। इन्हीं पौधों के बीजों को वे बार-बार बोते, चुनते और सुधारते गए, जब तक कि एक स्थिर और बेहतर किस्म तैयार न हो गई। इस विधि से उन्होंने गेहूँ की कुदरत-9 और कुदरत-17, धान की कुदरत-5 और कुदरत-1, अरहर की कुदरत-3 और कुदरत गीता सरसों जैसी किस्में विकसित कीं। हनी बी नेटवर्क के मुताबिक उनकी किस्मों से प्रति एकड़ गेहूँ में लगभग 27 क्विंटल, धान में 30 क्विंटल और अरहर में 12 क्विंटल तक पैदावार मिली, जो आसपास की पारंपरिक किस्मों से कहीं ज़्यादा थी।
2. बीज दान महादान — मुफ़्त बीजों का अभियान
प्रकाश सिंह ने तय किया कि वे अपनी विकसित किस्मों के बीज किसी कंपनी को नहीं बेचेंगे, बल्कि ज़रूरतमंद किसानों को मुफ़्त में बाँटेंगे। इसके लिए उन्होंने ‘बीज दान महादान’ नाम का अभियान चलाया और देशभर में किसानों तक बीज पहुँचाने लगे। उनका नारा था — ‘अपनी खेती, अपना खाद, अपना बीज, अपना स्वाद’ — जो आत्मनिर्भर किसान की उनकी सोच को बयां करता है। नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन के अनुसार उनके बीज पंद्रह से ज़्यादा राज्यों में फैले और एक लाख से अधिक किसानों को फायदा पहुँचा, जिनमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, पंजाब और महाराष्ट्र के किसान शामिल हैं। आज भी उनके भाई की सीड कंपनी से जुड़े किसान उन्हीं की किस्मों को पसंद करते हैं।
3. देसी बीजों का संरक्षण
नई किस्में बनाने के साथ-साथ प्रकाश सिंह ने पुरानी देसी किस्मों को बचाने का भी बीड़ा उठाया। उन्होंने धान, गेहूँ, सरसों, अरहर, मूँग और लौकी की सौ से ज़्यादा किस्मों का संरक्षण किया, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह जैविक धरोहर बनी रहे। उनका मानना है कि देसी बीजों में ही असली स्वाद, खुशबू और पोषण छिपा है, और बाज़ार के हाइब्रिड बीज किसान को कर्ज़ के जाल में फँसाते हैं। यही सोच उन्हें पर्यावरण और टिकाऊ खेती के समर्थकों के बीच भी लोकप्रिय बनाती है। वे कृषि मेलों और वैज्ञानिकों के साथ लगातार संवाद करते हैं, ताकि उनका ज्ञान सिर्फ़ उनके खेत तक सीमित न रहे।
सफलता का क्षण: किसान बाबा को मिला राष्ट्रीय सम्मान
प्रकाश सिंह की मेहनत को देश ने पहचाना और 2007 में नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन ने उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया। इसके बाद उन्हें प्लांट जीनोम सेवर रिकग्निशन भी मिला, जो पौधों की किस्मों के संरक्षण और विकास में असाधारण योगदान के लिए दिया जाता है। मीडिया ने उन्हें ‘किसान बाबा’ की उपाधि दी और देश के बड़े अखबारों ने उनकी कहानी छापी, जिससे हज़ारों किसान खुद उनसे बीज माँगने लगे। जो आदमी कभी 75 हज़ार के कर्ज़ के नोटिस से डरा था, आज उसी की विकसित किस्में देश के कोने-कोने में लहलहा रही हैं। यह सफलता सिर्फ़ एक किसान की नहीं, बल्कि उस सोच की जीत है कि ज्ञान और मेहनत किसी डिग्री के मोहताज नहीं होते।
युवाओं के लिए संदेश
प्रकाश सिंह रघुवंशी का जीवन युवाओं को सिखाता है कि बड़ी डिग्री या बड़ी पूँजी के बिना भी बड़ा काम किया जा सकता है, बशर्ते नीयत साफ़ हो और हौसला न टूटे। उन्होंने एक बार कहा था कि वे खुद को ईश्वर का चुना हुआ मानते हैं, ताकि देश के किसानों की मदद कर सकें — और यही भावना उन्हें हर मुश्किल में आगे बढ़ाती रही। आज के युवा अगर खेती को पिछड़ापन समझकर छोड़ रहे हैं, तो उन्हें इस किसान बाबा से सीखना चाहिए कि खेत भी प्रयोगशाला हो सकता है और मिट्टी भी सोना उगा सकती है। सबसे बड़ी बात, उन्होंने जो कुछ कमाया, उसे दूसरों में बाँट दिया — यही असली सफलता है।
निष्कर्ष
साढ़े तीन एकड़ ज़मीन, कमज़ोर आँखें और खाली जेब — इन तीनों के बावजूद प्रकाश सिंह रघुवंशी ने वह कर दिखाया जो बड़ी-बड़ी कंपनियाँ नहीं कर पाईं। उन्होंने खुद की किस्में बनाईं, लाखों किसानों को मुफ़्त बीज दिए और देश को आत्मनिर्भर खेती का रास्ता दिखाया। उनकी कहानी हर उस किसान के लिए उम्मीद की किरण है, जो सोचता है कि बदलाव सिर्फ़ सरकार या बड़े लोग ही ला सकते हैं। सच तो यह है कि बदलाव मिट्टी से शुरू होता है — और प्रकाश सिंह रघुवंशी उसी मिट्टी के सच्चे सपूत हैं।