Kisan Success Story: साइकिल पर अचार बेचने वाली ‘किसान चाची’ से पद्म श्री तक – राजकुमारी देवी की प्रेरणादायक कहानी
बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के एक छोटे से गाँव आनंदपुर की एक महिला ने अपने हौसले और मेहनत से वो कर दिखाया,
जिसकी कल्पना उस दौर में गाँव की महिलाएँ कर भी नहीं सकती थीं। पति के साथ तंबाकू की खेती से परिवार का गुजारा
मुश्किल से चल रहा था, लेकिन राजकुमारी देवी ने खेत की मिट्टी को ही अपनी मंजिल बना लिया। आज वे ‘किसान चाची’ के
नाम से जानी जाती हैं, और उनकी कहानी हर उस महिला के लिए प्रेरणा है जो गरीबी और सामाजिक बंधनों के बीच अपने सपनों को जीना चाहती है।
गरीबी और बंधनों भरा बचपन और वैवाहिक जीवन
राजकुमारी देवी का जन्म बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के एक आर्थिक रूप से कमजोर परिवार में हुआ था। गरीबी के कारण
उनकी शादी कम उम्र में ही कर दी गई, और विवाह के बाद उनका जीवन घर की चारदीवारी तक सीमित हो गया। पति अवधेश कुमार
चौधरी के साथ उनकी जिंदगी संयुक्त परिवार में सिमट गई थी, जहाँ घर के कामकाज और सास-ससुर की सेवा के अलावा उनका कोई और
दायरा नहीं था। कुछ वर्षों बाद परिवार का बँटवारा हुआ और पति के हिस्से में लगभग ढाई एकड़ जमीन आई, जिस पर तब तंबाकू
की खेती होती थी। पाँच सदस्यों वाले परिवार के लिए तंबाकू की खेती से होने वाली आय इतनी कम थी कि दो वक्त का खाना भी
मुश्किल हो जाता था। उसी दौर में राजकुमारी देवी ने शादी के बाद अपनी मैट्रिक की पढ़ाई पूरी की, क्योंकि शिक्षा के प्रति उनकी ललक कभी खत्म नहीं हुई थी।
जिंदगी बदलने वाला फैसला – खुद खेत में उतरना
गरीबी से तंग आकर राजकुमारी देवी ने वो कदम उठाया जिसकी गाँव में किसी महिला ने कभी कल्पना नहीं की थी। उन्होंने
फैसला किया कि वे खुद खेती करेंगी और घर की आमदनी बढ़ाएँगी। इसके लिए वे डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि
विश्वविद्यालय से उन्नत खेती का प्रशिक्षण लेने पहुँचीं, जहाँ उन्होंने वैज्ञानिक तरीकों से खेती करना सीखा। साल 1990
के आसपास उन्होंने अपनी छोटी सी जमीन पर पपीता और अरवी (तारो) जैसी फसलें उगाना शुरू किया, जिनकी बाजार में अच्छी माँग
थी। लेकिन असली बदलाव तब आया जब उन्होंने सोचा कि फसल बेचने से ज्यादा फायदा उस फसल से बने उत्पाद बेचने में है। यहीं
से उनके जीवन का नया अध्याय शुरू हुआ – अचार, मुरब्बा, जैम, जेली और स्क्वैश बनाना।
संघर्ष के दिन – तानों और साइकिल के पहियों पर
राजकुमारी देवी का संघर्ष सिर्फ आर्थिक नहीं था, बल्कि सामाजिक बंधनों से भी था। जब वे अचार बेचने के लिए बाजार
जाने लगीं, तो गाँव के लोगों ने उन्हें ताने मारे और यहाँ तक कि समाज से बाहर करने की धमकी भी मिली। उस दौर में किसी
महिला का घर से बाहर निकलकर बाजार में सामान बेचना बड़ी बगावत माना जाता था। सबसे बड़ी चुनौती थी गाँव से बाजार तक का
सफर, क्योंकि उनके पास कोई वाहन नहीं था। 40 साल की उम्र में उन्होंने साइकिल चलाना सीखा, और फिर रोजाना साइकिल पर सवार
होकर गाँव-गाँव और हाट-बाजारों में अपने अचार और उत्पाद बेचने लगीं। बारिश हो या धूप, उनकी साइकिल कभी नहीं रुकी, और
धीरे-धीरे उनके बनाए उत्पादों की गुणवत्ता की चर्चा फैलने लगी। साल 2013 में गुजरात के एक किसान मेले में तत्कालीन
मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें ‘किसान चाची’ कहकर संबोधित किया, और वही नाम उनकी पहचान बन गया।
सफलता की रणनीति
राजकुमारी देवी की सफलता किसी चमत्कार का नतीजा नहीं थी, बल्कि सोची-समझी रणनीति और कड़ी मेहनत का फल थी। उन्होंने
खेती से लेकर बाजार तक की हर कड़ी को खुद संभाला और बीच के बिचौलियों को पूरी तरह हटा दिया। आइए जानते हैं उनकी
रणनीति के वो अहम पहलू जिनसे वे गरीबी से करोड़ों के कारोबार तक पहुँचीं।
1. फसल से आगे सोचना – मूल्य संवर्धन की राह
राजकुमारी देवी ने बहुत जल्दी समझ लिया था कि कच्ची फसल बेचने से ज्यादा मुनाफा उस फसल से बने तैयार उत्पाद में है।
उन्होंने आम, आँवला, अमरूद जैसे स्थानीय फलों से अचार, मुरब्बा, जैम, जेली और स्क्वैश बनाना शुरू किया। अरवी से उन्होंने
अचार और आटा दोनों बनाए। घर पर ही स्वच्छता और पैकेजिंग का पूरा ध्यान रखा, जिससे उनके उत्पादों की गुणवत्ता बाजार में
अलग पहचान बनाने लगी। यही मूल्य संवर्धन (value addition) की सोच उनके कारोबार की नींव बनी।
2. महिलाओं को साथ लेकर स्वयं सहायता समूह
उनकी सफलता को देखकर गाँव की कई महिलाएँ उनसे जुड़ने लगीं। राजकुमारी देवी ने अगले दो दशकों में 36 स्वयं सहायता
समूह (SHG) बनाए, जिनके जरिए सैकड़ों महिलाएँ खेती और खाद्य प्रसंस्करण से जुड़कर आत्मनिर्भर बनीं। उन्होंने महिलाओं को
सफाई, प्रसंस्करण और पैकेजिंग का प्रशिक्षण दिया, ताकि हर महिला एक सूक्ष्म उद्यमी बन सके। आज उनके कारोबार में नियमित रूप
से 25-30 महिलाएँ काम करती हैं, और आम के मौसम में यह संख्या 50-60 तक पहुँच जाती है।
3. सीधी बिक्री – बिचौलियों को हटाना
राजकुमारी देवी ने शुरू से ही अपने उत्पाद सीधे बाजार, हाट-बाजार और मेलों में बेचे। साइकिल पर घूम-घूमकर बेचने से
उन्होंने बिचौलियों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया, जिससे मुनाफा सीधे उनके और समूह की महिलाओं के हाथ में आया। धीरे-धीरे
उनके उत्पाद ‘किसान चाची का अचार’ के नाम से पूरे देश में मशहूर हो गए, और आज बिहार के सरकारी मॉल समेत कई बाजारों में उनके उत्पाद बिकते हैं।
सफलता का पल – पद्म श्री सम्मान
वर्ष 2019 में भारत सरकार ने राजकुमारी देवी को देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री से नवाजा। राष्ट्रपति
भवन में जब तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें यह सम्मान दिया, तो उस पल ने बिहार के हर गाँव की महिला के चेहरे
पर मुस्कान ला दी। इससे पहले बिहार सरकार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी उन्हें ‘किसान श्री’ सम्मान से सम्मानित कर चुके
थे। वह महिला जिसे कभी समाज से बाहर करने की धमकी मिली थी, आज राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जानी-मानी शख्सियत है।
उनके उत्पाद अब विदेशों तक पहुँच रहे हैं, और वे आज भी 70 पार की उम्र में साइकिल पर गाँव-गाँव घूमकर महिलाओं को ‘ज्ञान बाँटने’ का काम करती हैं।
युवाओं के लिए संदेश
राजकुमारी देवी का जीवन युवाओं को सिखाता है कि हालात चाहे जैसे भी हों, हौसला और मेहनत हर मुश्किल को आसान कर देती
है। उन्होंने 40 की उम्र में साइकिल चलाना सीखा, 50 की उम्र के बाद कारोबार खड़ा किया और 60 पार करने के बाद पद्म श्री
पाया – यानी सफलता की कोई उम्र नहीं होती। वे अक्सर कहती हैं कि महिला होने के नाते उन्होंने जो बंधन तोड़े, वो हर
लड़की तोड़ सकती है, बस जरूरत है अपने सपनों पर भरोसे की। युवा पीढ़ी को उनसे यह भी सीखना चाहिए कि खेती सिर्फ गुजारा
नहीं, बल्कि नवाचार और उद्यमिता का बड़ा मंच है – अगर सोच बड़ी हो तो खेत की मिट्टी से भी सोना निकाला जा सकता है।
निष्कर्ष
राजकुमारी देवी यानी ‘किसान चाची’ की कहानी गरीबी से समृद्धि, बंधन से आजादी और तानों से सम्मान तक का सफर है।
उन्होंने न सिर्फ अपने परिवार का भाग्य बदला, बल्कि सैकड़ों ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाकर सामाजिक बदलाव की अलख
जगाई। मुजफ्फरपुर की गलियों में आज भी उनकी साइकिल की घंटी सुनाई देती है, जो हर गुजरने वाली महिला से कहती है –
‘तुम भी कर सकती हो’। ऐसी प्रेरणादायक शख्सियतों की कहानियाँ ही असली भारत की ताकत हैं।