Kisan Success Story: खेत में तालाब खोदकर सिंघाड़ा उगाया, पद्म श्री जीतने वाले किसान – सेठपाल सिंह की प्रेरणादायक कहानी

Kisan Success Story: खेत में तालाब खोदकर सिंघाड़ा उगाया, पद्म श्री जीतने वाले किसान – सेठपाल सिंह की प्रेरणादायक कहानी

आज हम आपको उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के नंदी फिरोजपुर गांव के एक ऐसे किसान की कहानी सुनाने जा रहे हैं, जिन्होंने परंपरागत खेती से हटकर नए-नए प्रयोग किए और पूरे देश के लिए मिसाल बन गए। सेठपाल सिंह कभी गेहूं, धान और गन्ने की उसी पुरानी खेती में उलझे थे, जिससे ज़्यादातर किसानों को सिर्फ़ लागत और परेशानी ही मिलती है। लेकिन कृषि विज्ञान केंद्र से जुड़कर उन्होंने खेती को एक नए नज़रिए से देखना सीखा। आज उनके खेत में गन्ने के साथ सब्जियां, तालाब में मछली, खेत में ही सिंघाड़ा और मशरूम की खेती हो रही है। यही प्रयोग उन्हें राष्ट्रपति भवन तक ले गए, जहां 21 मार्च 2022 को तत्कालीन राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने उन्हें पद्म श्री सम्मान से नवाज़ा।

बचपन और पढ़ाई: खेती के संस्कार

सेठपाल सिंह का जन्म और परवरिश सहारनपुर के नंदी फिरोजपुर गांव में हुई, जहां खेती ही जीवन का केंद्र है। बचपन से ही उन्होंने खेतों में काम देखा और मिट्टी से उनका जुड़ाव गहरा होता गया। खेती को सिर्फ़ परंपरा नहीं, विज्ञान के तौर पर समझने के लिए उन्होंने बीएससी एग्रीकल्चर की पढ़ाई की। इस पढ़ाई ने उनकी सोच में बड़ा बदलाव लाया, क्योंकि अब वे हर समस्या का कारण मिट्टी, मौसम और फसल चक्र के नज़रिए से समझने लगे थे। डिग्री लेकर जब वे वापस अपने खेत पर लौटे, तो उनके पास किताबी ज्ञान के साथ खेत का व्यावहारिक अनुभव भी था, जो आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।

घाटे की खेती ने तोड़ा भरोसा

पढ़ाई के बाद सेठपाल सिंह ने भी वही किया जो उनके आसपास के हज़ारों किसान करते थे — गेहूं, धान और गन्ने की खेती। लेकिन कुछ ही सालों में उन्हें एहसास हो गया कि यह खेती घाटे का सौदा है, जिसमें लागत बढ़ती जाती है और आमदनी घटती जाती है। रासायनिक खादों और कीटनाशकों का खर्च हर साल बढ़ रहा था, जबकि मिट्टी की उर्वरता घटती जा रही थी। यही वह दौर था जब उन्होंने तय किया कि अगर खेती को फायदेमंद बनाना है, तो उसे पुराने ढर्रे से बाहर निकालना होगा। उन्होंने सहारनपुर के कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) से संपर्क किया, जहां वैज्ञानिकों ने उन्हें कृषि विविधीकरण के बारे में जानकारी दी, और वहीं से उनकी नई सोच वाली खेती की शुरुआत हुई।

संघर्ष और प्रयोग के दिन

नए प्रयोग आसान नहीं थे। जब सेठपाल सिंह ने तालाब की बजाय खेत में सिंघाड़ा उगाने की बात कही, तो गांव के लोगों को यह अजीब लगा, क्योंकि सिंघाड़ा तो हमेशा तालाबों और गहरे पानी में ही होता आया था। उन्होंने अपने खेत में ही गड्ढा खोदकर पानी भरा और उसमें सिंघाड़े की फसल उगाई — और प्रयोग सफल रहा। इसके बाद उन्होंने कमल के फूल, मशरूम, मछली पालन और पशुपालन को भी अपनी खेती से जोड़ दिया। हर नया प्रयोग अपने साथ जोखिम, लागत और समय लाता था, लेकिन वे डरते नहीं थे। कृषि वैज्ञानिकों का भी कहना है कि सेठपाल सिंह की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वे किसी भी नए प्रयोग से घबराते नहीं, क्योंकि उनका मानना है कि बिना कुछ नया किए किसान आगे नहीं बढ़ सकता।

सफलता की रणनीति: एक साथ कई फसलें

सेठपाल सिंह की पूरी रणनीति कृषि विविधीकरण पर टिकी है — यानी एक ही खेत से पूरे साल आमदनी। वे मल्टी क्रॉपिंग और रिले क्रॉपिंग करते हैं, जिसमें एक फसल कटते ही दूसरी फसल की बुवाई हो जाती है। उदाहरण के तौर पर सब्जियों में वे करेला, फिर लौकी और फिर पालक उगाते हैं — इस तरह एक ही साल में एक के बाद एक सब्जी उगाकर वे लगभग चार लाख रुपये प्रति एकड़ तक का मुनाफ़ा कमाते हैं। गन्ने के साथ वे फ्रेंच बीन्स, उड़द, मूंग, प्याज, सौंफ, आलू, सरसों, मसूर और हल्दी जैसी सह-फसलें भी उगाते हैं। इस बहुफसलीय प्रणाली को देखकर आसपास के कई किसानों ने भी उनकी नकल शुरू कर दी, जिससे पूरे इलाके में बदलाव की लहर आई।

जैविक खेती और मिट्टी की सेहत

सेठपाल सिंह कभी पराली नहीं जलाते, जो आज के समय में एक बहुत बड़ी बात है। वे अपने खेत में ही वर्मी कंपोस्ट और नाडेप कंपोस्ट की इकाइयां लगाकर जैविक खाद तैयार करते हैं और उसे खेत में इस्तेमाल करते हैं। इससे फसलों का उत्पादन अच्छा होने के साथ-साथ मिट्टी में जीवांश कार्बन की मात्रा भी बनी रहती है। उनका साफ़ मानना है कि मिट्टी ही किसान की असली पूंजी है, और अगर मिट्टी स्वस्थ रहेगी तो खेती लंबे समय तक फायदेमंद रहेगी। उन्होंने ऑर्गेनिक खेती में भी हाथ आजमाया और साबित किया कि बिना रसायनों के भी अच्छी पैदावार ली जा सकती है।

मछली पालन और विविध आय के स्रोत

सेठपाल सिंह के खेत के पास बने तालाब में साढ़े चार फीट पानी में रोहू, कतला और नैन जैसी तीन प्रजातियों की मछलियां पाली जाती हैं। इसके अलावा पशुपालन, कमल के फूल और मशरूम की खेती भी उनकी आमदनी का हिस्सा है। इस तरह उन्होंने एक ऐसा सिस्टम तैयार किया है जिससे किसान की रोज़ आमदनी हो — किसी एक फसल पर पूरी निर्भरता नहीं रहती। अगर एक फसल का भाव गिर जाए या मौसम खराब हो जाए, तो दूसरी फसलें नुकसान की भरपाई कर देती हैं। यही वह फार्मूला है जो उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों की मदद से इजाद किया और आज आसपास के किसानों को भी सिखा रहे हैं।

सफलता का क्षण: पद्म श्री तक का सफ़र

सेठपाल सिंह के प्रयोगों को सबसे पहले राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने पहचाना। उन्हें 2012 में जगजीवन राम अभिनव किसान पुरस्कार मिला, और इसके बाद 2014 और 2020 में भी ICAR के पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। लेकिन सबसे बड़ा सम्मान तब आया जब 2022 के पद्म पुरस्कारों में उनका नाम पद्म श्री के लिए चुना गया। 21 मार्च 2022 को राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली में तत्कालीन राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने उन्हें यह सम्मान सौंपा। जब फरवरी में यह खबर उनके गांव पहुंची, तो पूरा नंदी फिरोजपुर खुशी से झूम उठा। सेठपाल सिंह ने कहा कि उन्होंने न सिर्फ़ आधुनिक खेती की, बल्कि दूसरे किसानों में भी जागरूकता पैदा की — और यही मेहनत और नई तकनीक का सम्मान पद्म श्री के रूप में मिला।

युवाओं और किसानों के लिए संदेश

सेठपाल सिंह आज भी मानते हैं कि खेती में बड़े बदलाव तभी संभव हैं जब किसान नई तकनीकें अपनाएं। उनका कहना है कि कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों की तकनीकों, आधुनिक उपकरणों और मिट्टी परीक्षण जैसे साधनों से खेती ज़्यादा लाभदायक और टिकाऊ बन सकती है। वे नैनो यूरिया और नैनो डीएपी जैसे नए उत्पादों का भी समर्थन करते हैं, जिनसे किसानों की लागत घटती है और मिट्टी की सेहत पर बुरा असर कम होता है। उनका संदेश साफ़ है — किसान को अपनी फसलों पर ध्यान देना चाहिए, प्रयोग से डरना नहीं चाहिए और सीखना कभी बंद नहीं करना चाहिए। वे आसपास के किसानों को नियमित प्रशिक्षण भी देते हैं, ताकि उनकी सीख सिर्फ़ उनके खेत तक सीमित न रहे।

निष्कर्ष

सेठपाल सिंह की कहानी यह सिखाती है कि खेती में असली तरक्की पुराने तरीकों को दोहराने से नहीं, बल्कि साहस करके नए प्रयोग करने से आती है। एक साधारण किसान से शुरू करके वे आज लाखों किसानों के प्रेरणा स्रोत बन गए हैं और पद्म श्री जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाज़े जा चुके हैं। उनका सफ़र साबित करता है कि अगर मिट्टी के साथ दोस्ती की जाए, विज्ञान को खेत तक लाया जाए और हार न मानी जाए, तो खेती भी उतनी ही फायदेमंद हो सकती है जितना कोई भी आधुनिक व्यवसाय। उनकी कहानी देश के हर उस किसान के लिए उम्मीद की किरण है, जो बदलते समय के साथ बदलने को तैयार है।

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