Kisan Success Story: नौकरी की चकाचौंध छोड़ खेत की मिट्टी से जुड़े, बनाया दाल का ‘वंदना’ ब्रांड – प्रमोद गौतम की प्रेरणादायक कहानी

Kisan Success Story: नौकरी की चकाचौंध छोड़ खेत की मिट्टी से जुड़े, बनाया दाल का ‘वंदना’ ब्रांड – प्रमोद गौतम की प्रेरणादायक कहानी

महाराष्ट्र के नागपुर के एक युवक ने वह काम किया जो आज के समय में बहुत कम लोग करने की हिम्मत दिखाते हैं। अच्छी-खासी इंजीनियरिंग की नौकरी, मोटी तनख्वाह और शहर की चकाचौंध भरी ज़िंदगी को छोड़कर वह अपने पैतृक गाँव वापस लौट आया और खेत की मिट्टी से जुड़ गया। शुरू में लोगों ने उसे हँसी का पात्र बना दिया, रिश्तेदारों ने ताने मारे और दोस्तों ने कहा कि इतनी पढ़ाई-लिखाई के बाद खेती कौन करता है। लेकिन प्रमोद गौतम ने किसी की नहीं सुनी। उन्होंने न सिर्फ खेती को एक मुनाफे वाला व्यवसाय बना दिया, बल्कि हज़ारों किसानों की किस्मत बदलने का रास्ता भी दिखाया। आज उनकी कहानी हर उस युवा के लिए प्रेरणा है जो डिग्री के बाद सिर्फ नौकरी को ही सफलता समझता है।

बचपन और इंजीनियरिंग की पढ़ाई

प्रमोद गौतम का जन्म और पालन-पोषण नागपुर शहर में हुआ, लेकिन बचपन का एक बड़ा हिस्सा वह अपने पैतृक गाँव वढोणा में बिताते थे। जैसा कि वह खुद बताते हैं, बचपन में वह पिता के साथ खेतों में काम करने जाते थे और मिट्टी की खुशबू, फसलों की हरियाली और खुले आसमान ने उनमें खेती के प्रति गहरा लगाव पैदा कर दिया था। हालांकि उस दौर में खेती को कोई करियर नहीं माना जाता था, और हर माता-पिता की तरह प्रमोद के पिता भी चाहते थे कि बेटा डॉक्टर बने या इंजीनियर, लेकिन किसान बिल्कुल न बने। पिता की इच्छा का सम्मान करते हुए प्रमोद ने नागपुर के यशवंतराव चव्हाण कॉलेज से ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल की और फिर एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी भी पा ली।

नौकरी का मोह और वापसी का फैसला

डिग्री मिलने के बाद प्रमोद को एक प्रतिष्ठित कंपनी में नौकरी मिल गई, जिसकी तनख्वाह उस समय के हिसाब से काफी अच्छी थी। लेकिन कुछ ही समय में ऑफिस की चारदीवारी और एक जैसा रोज़ाना का रूटीन उन्हें बेचैन करने लगा। मशीनों और कागज़ों के बीच बैठकर उन्हें बार-बार खेतों की वह खुली हवा याद आती थी, जहाँ उन्होंने बचपन में अपने पिता के साथ पसीना बहाया था। नौकरी छोड़कर उन्होंने कुछ समय तक गाड़ियों के स्पेयर पार्ट्स का अपना व्यवसाय चलाया, लेकिन खेती की तड़प इतनी गहरी थी कि वह व्यवसाय भी टिक नहीं पाया। आखिरकार 2006 में प्रमोद ने जिंदगी का सबसे बड़ा और सबसे साहसिक फैसला लिया — उन्होंने इंजीनियरिंग को पूरी तरह अलविदा कह दिया और अपने पैतृक गाँव वढोणा में 26 एकड़ पैतृक ज़मीन पर खेती करने का मन बना लिया।

शुरुआती संघर्ष और असफलता

खेती शुरू करने के बाद प्रमोद को जिन मुश्किलों का सामना करना पड़ा, वे किसी के भी हौसले को तोड़ सकती थीं। उन्होंने शुरुआत में पूरे खेत में सफेद मूंगफली और हल्दी की फसल लगाई, लेकिन उससे कोई खास मुनाफा नहीं हुआ और पैसा लगभग डूब गया। सबसे बड़ी दिक्कत मज़दूरों की कमी थी, क्योंकि गाँव के मज़दूर काम की तलाश में शहरों की फैक्ट्रियों की ओर पलायन कर रहे थे और खेत में हाथ बँटाने वाला कोई नहीं मिलता था। इन नाकामियों को देखकर आस-पास के लोग उन्हें मज़ाक का निशाना बनाने लगे — एक ऑटोमोबाइल इंजीनियर जो अच्छी नौकरी छोड़कर किसान बन गया था। लेकिन प्रमोद ने इन तानों को अपनी कमज़ोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने ठंडे दिमाग से सोचा और महसूस किया कि खेती की उनकी पद्धति ही गलत है, फसल बदलनी होगी और तरीका भी बदलना होगा।

सफलता की रणनीति

नुकसान से सबक लेकर प्रमोद ने 2007-08 में पारंपरिक खेती छोड़कर बागवानी की ओर रुख किया, और यही फैसला उनकी ज़िंदगी का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। उन्होंने खेत में संतरे, अमरूद, नींबू, मौसंबी, कच्चे केले और तूर दाल के पौधे लगाए। बागवानी का सबसे बड़ा फायदा यह था कि पौधे एक बार लगाने के बाद कपास या सोयाबीन जैसी पारंपरिक फसलों की तुलना में बहुत कम देखभाल और मज़दूरी माँगते हैं, और सरकार की योजनाओं के तहत बागवानी करने वाले किसानों को हर तीन साल में लगाया गया पूरा निवेश वापस भी मिल जाता है। फलों की फसल तैयार होने पर प्रमोद उसे नागपुर की कलमना मंडी में बेचते थे और धीरे-धीरे उनकी आमदनी स्थिर होने लगी।

किसानों की असली तकलीफ को समझना

दालों की खेती और बिक्री के दौरान प्रमोद ने किसानों की सबसे बड़ी तकलीफ को अपनी आँखों से देखा। किसान अपनी दालें बहुत कम कीमत पर मिल मालिकों को बेच देते थे, और वही मिल मालिक दालों को पॉलिश करके लगभग दोगुनी कीमत पर उन्हीं किसानों को वापस बेच देते थे। ऊपर से मिलें खेतों से बहुत दूर होती थीं, जिससे ढुलाई का खर्च भी किसानों की जेब पर पड़ता था और उनकी कमाई नाममात्र की रह जाती थी। इस शोषण को देखकर प्रमोद के मन में एक बड़ा विचार आया — क्यों न गाँव में ही अपनी दाल मिल लगाई जाए, ताकि किसानों को दूर न जाना पड़े और उन्हें उनकी फसल का सही दाम भी मिले।

खुद की दाल मिल और ‘वंदना’ ब्रांड

कई विशेषज्ञों से सलाह लेने के बाद पता चला कि मिल लगाने में करीब 25 लाख रुपये का खर्च आएगा, जबकि प्रमोद के पास सिर्फ डेढ़ लाख रुपये थे। लेकिन पैसों की कमी ने उनका हौसला नहीं तोड़ा — उन्होंने बैंक से कर्ज़ लिया और गाँव में अपनी दाल मिल खड़ी कर दी। आज उनकी मिल में किसान सिर्फ 4.5 रुपये प्रति किलो की दर पर अपनी दाल की प्रोसेसिंग करवाते हैं और हर क्विंटल पर उन्हें 65 किलो तैयार दाल मिल जाती है, जिससे उन्हें पूरे साल घर के लिए मुफ्त दाल भी मिलती है और बेचने पर दोगुना मुनाफा भी होता है। प्रमोद बिना पॉलिश की यह दाल ‘वंदना’ ब्रांड नाम से बेचते हैं, और आज बोरगाँव, वढोणा और मडसावंगी समेत 35 पड़ोसी गाँवों के करीब 2500 किसान रोज़ उनकी मिल में अपनी दाल की प्रोसेसिंग करवाने आते हैं।

सफलता का पल

आज प्रमोद गौतम की दाल मिल हर साल करीब 2500 क्विंटल दालों की प्रोसेसिंग करती है, मिल में गाँव के 8 युवाओं को रोज़गार मिला हुआ है, और शुरुआती निवेश, बिजली और कर्मचारियों के वेतन का खर्च निकालने के बाद भी उन्हें मिल से 40 फीसदी का शुद्ध मुनाफा होता है। बागवानी और दाल मिल से होने वाली उनकी सालाना आमदनी उस तनख्वाह से कहीं ज़्यादा है जो वह इंजीनियरिंग की नौकरी में कमाते थे। जो लोग कभी उन पर हँसते थे, वही आज उनकी मिल में अपनी दाल प्रोसेस करवाने आते हैं और उन्हें अपना भाई मानते हैं। इंजीनियरिंग की डिग्री छोड़कर खेती अपनाने वाला यह युवक आज न सिर्फ खुद कामयाब है, बल्कि हज़ारों किसान परिवारों की आमदनी बढ़ाने का ज़रिया भी बन गया है।

युवाओं के लिए संदेश

प्रमोद गौतम का मानना है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था को किताबी पढ़ाई के साथ-साथ कौशल विकास पर भी ज़ोर देना चाहिए, ताकि युवा डिग्री के बाद सिर्फ नौकरी के पीछे न भागें बल्कि खेती जैसे क्षेत्रों में भी अपना भविष्य देख सकें। वह कहते हैं कि खेती आज के युवाओं के लिए एक शानदार करियर विकल्प हो सकती है, बशर्ते उसे आधुनिक तकनीक, सही योजना और व्यवसायिक सोच के साथ किया जाए। उनका यह भी मानना है कि खेती बच्चों के पर्यावरण और व्यवहार से जुड़ी समस्याओं का समाधान भी कर सकती है, क्योंकि मिट्टी से जुड़ा बच्चा ज़मीन से जुड़ा रहता है।

निष्कर्ष

प्रमोद गौतम की कहानी इस भ्रम को तोड़ती है कि खेती सिर्फ मजबूरी का काम है और पढ़ा-लिखा युवा खेत में सफल नहीं हो सकता। उन्होंने साबित कर दिया कि सही फसल का चुनाव, किसानों की समस्या को समझना और व्यवसायिक सोच के साथ काम करना किसी भी खेत को सोने की खान में बदल सकता है। उनके शब्दों में, “हमारे समाज को यह समझना होगा कि खेती सबसे महत्वपूर्ण पेशा है और किसान का सम्मान होना चाहिए।” नौकरी की चकाचौंध छोड़कर मिट्टी से जुड़ने वाले इस इंजीनियर-किसान की कहानी हर उस युवा को राह दिखाती है जो अपने सपनों के पीछे भागने की हिम्मत रखता है।

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