Kisan Success Story: बेबी कॉर्न से बदल दी तकदीर, गांव का साधारण किसान बना करोड़ों का उद्यमी – कंवल सिंह चौहान की प्रेरणादायक कहानी
जब कोई किसान पारंपरिक फसलों से निकलकर कुछ नया सोचता है, तो उसके खेत का नक्शा ही नहीं, पूरी जिंदगी की तस्वीर बदल जाती है। हरियाणा के सोनीपत जिले के अटेरना गांव के किसान कंवल सिंह चौहान की कहानी इसी बदलाव का जीता-जागता उदाहरण है। कभी धान की खेती में नुकसान झेलने वाले इस साधारण किसान ने बेबी कॉर्न की खेती से न सिर्फ अपनी किस्मत बदली, बल्कि पूरे इलाके के किसानों को एक नई राह दिखाई। आज कंवल सिंह चौहान किसान के साथ-साथ एक सफल उद्यमी के रूप में भी जाने जाते हैं, और कृषि में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 2019 में पद्म श्री से सम्मानित किया।
बचपन और पारिवारिक पृष्ठभूमि
कंवल सिंह चौहान का जन्म हरियाणा के सोनीपत जिले के अटेरना गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ। बचपन से ही उनका नाता खेत-खलिहान से जुड़ा रहा, और महज 16 साल की उम्र में ही उन्होंने खेती की कमान अपने हाथों में संभाल ली थी। उस दौर में गांव के ज्यादातर किसान गेहूं और धान की पारंपरिक फसलों पर निर्भर थे, और कंवल सिंह भी उसी राह पर चले। उनके परिवार के पास करीब 20 एकड़ जमीन थी, जिस पर वे सालों तक पारंपरिक तरीके से खेती करते रहे। लेकिन खेती की लागत बढ़ने और फसल के भाव में उतार-चढ़ाव के कारण मुनाफा लगातार घटता जा रहा था।
खेती के काम में डूबे रहने के बावजूद कंवल सिंह हमेशा कुछ नया सीखने और आजमाने के शौकीन रहे। उन्हें खेतों में काम करना अदालत-कचहरी के काम से ज्यादा पसंद था, यही वजह है कि उन्होंने पढ़ाई के बाद खुद को पूरी तरह खेती से जोड़ लिया। धान की खेती से हुए भारी नुकसान ने उन्हें झकझोर दिया, और उन्होंने ठान लिया कि अब उसी लीक पर नहीं चलेंगे जिस पर पूरा गांव चल रहा था। यहीं से उनके जीवन का सबसे बड़ा प्रयोग शुरू हुआ।
टर्निंग पॉइंट: बेबी कॉर्न की खेती का फैसला
1997-98 के आसपास कंवल सिंह चौहान को एक साथी के जरिए बेबी कॉर्न की खेती के बारे में पता चला। उस समय भारत में शायद ही कोई बेबी कॉर्न उगा रहा था, और यह सब्जी थाईलैंड से आयात होकर बड़े होटलों और रेस्टोरेंटों तक ही सीमित थी। किसी ने उन्हें बताया कि इस फसल से आय लगभग तीन गुना तक बढ़ सकती है, और यह बात उनके दिमाग में घर कर गई। गांव के लोगों ने उन्हें खूब समझाया कि गेहूं-धान छोड़कर इस अजीब सी फसल के पीछे न भागें, लेकिन कंवल सिंह अपने फैसले पर अडिग रहे।
उन्होंने अपनी जमीन के एक हिस्से में बेबी कॉर्न की खेती का प्रयोग शुरू किया, और नतीजे उम्मीद से बढ़कर निकले। जब पहली फसल हाथ आई, तो वे खुद दिल्ली पहुंचे और वहां के बड़े बाजारों, पांच सितारा होटलों तक में अपना बेबी कॉर्न बेचना शुरू किया। दिल्ली के खान मार्केट, सरोजनी मार्केट और बाद में आजादपुर मंडी में उनकी फसल की मांग बढ़ने लगी। यह देखकर आस-पास के गांवों के किसानों ने भी बेबी कॉर्न बोना शुरू किया, और धीरे-धीरे 15 से 20 गांवों में इस फसल का विस्तार हो गया।
संघर्ष के कठिन दिन
सफलता का रास्ता कभी सीधा नहीं होता, और कंवल सिंह चौहान के साथ भी यही हुआ। 1999 में एक ऐसा दौर आया जब बाजार में बेबी कॉर्न की मांग अचानक घट गई और कोई भी किसान से यह फसल खरीदने को तैयार नहीं था। खेतों में फसल तैयार खड़ी थी, लेकिन उसे बेचने का कोई ठिकाना नहीं था। यह वह मोड़ था जहां ज्यादातर लोग हार मान लेते हैं, लेकिन कंवल सिंह ने हार मानने के बजाय समस्या का समाधान खुद निकालने की ठानी। उन्होंने फैसला किया कि अब वे सिर्फ किसान नहीं रहेंगे, बल्कि अपनी खुद की फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री खड़ी करेंगे।
प्रोसेसिंग यूनिट लगाने के लिए पूंजी, तकनीक और बाजार की समझ — तीनों ही चुनौतियां उनके सामने थीं। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और धीरे-धीरे 2009 में अपनी पहली प्रोसेसिंग यूनिट तैयार की। इसके बाद 2012 में दूसरी, 2016 में तीसरी और 2019 में चौथी यूनिट लगाई गई। इन यूनिटों में बेबी कॉर्न के साथ-साथ स्वीट कॉर्न, मशरूम, टमाटर और मक्के से तरह-तरह के खाद्य उत्पाद बनाए जाने लगे। इस तरह जो किसान कभी बाजार पर निर्भर था, वह खुद बाजार बन गया।
सफलता की रणनीति
एकीकृत खेती प्रणाली (इंटीग्रेटेड फार्मिंग)
कंवल सिंह चौहान की सबसे बड़ी खासियत है उनकी एकीकृत खेती प्रणाली, जिसमें फसल के साथ-साथ कई अन्य काम एक साथ चलते हैं। वे बेबी कॉर्न और स्वीट कॉर्न के साथ-साथ मशरूम की खेती, गेहूं, धान, टमाटर और ब्रोकली की जैविक खेती भी करते हैं। खेतों में बायोगैस स्लरी का इस्तेमाल खाद के रूप में किया जाता है, जिससे मिट्टी की सेहत बनी रहती है और रसायनों पर निर्भरता घटती है। धान और गन्ने के अवशेषों को मशरूम की खेती और ईंधन के रूप में इस्तेमाल कर वे फसल के हर हिस्से से मूल्य निकालते हैं।
फसल से बाजार तक की पूरी श्रृंखला
कंवल सिंह चौहान ने किसानों की सबसे बड़ी समस्या — मंडी में वाजिब दाम न मिलना — का हल खुद निकाला। उन्होंने खेत से ही उपज की प्रोसेसिंग और पैकेजिंग की व्यवस्था कर ली, जिससे बिचौलिए खत्म हो गए। 2012 में उन्होंने सब्जियों की कैनिंग और बिक्री के लिए प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित की, जिससे बर्बादी कम हुई और उपज का बेहतर मूल्य मिलने लगा। उन्होंने गांव में खुद एक मंडी जैसा बाजार भी खड़ा किया, जहां किसानों को उनकी उपज का उचित दाम मिलता है। आज उनके मॉडल से सीखकर 10 हजार से ज्यादा किसान बेबी कॉर्न की खेती कर रहे हैं और उपज विदेशी बाजारों तक पहुंच रही है।
रोजगार सृजन और किसानों का मार्गदर्शन
कंवल सिंह चौहान की सफलता सिर्फ उनकी नहीं, बल्कि हजारों लोगों की रोजी-रोटी से जुड़ी है। 1998 में जब उन्होंने बेबी कॉर्न की खेती शुरू की थी, तब वे अकेले किसान थे, लेकिन आज उनके खेतों में लगभग 400 मजदूर काम करते हैं, जिनमें ज्यादातर महिलाएं हैं। आस-पास के गांवों के किसान उनसे तकनीक सीखकर शानदार मुनाफा कमा रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार बेबी कॉर्न की खेती में प्रति एकड़ करीब 7 हजार रुपये की लागत आती है और बदले में 30 से 40 हजार रुपये तक की आय मिलती है, और यही फायदा पूरे इलाके के किसानों तक पहुंचा है।
सफलता का मुकाम: पद्म श्री तक का सफर
कंवल सिंह चौहान की मेहनत और नवाचार को देश ने खुलकर सराहा। 2010 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने उन्हें कृषि विविधीकरण के लिए एन.जी. रंगा किसान पुरस्कार से सम्मानित किया। इसके बाद 2015 में महिंद्रा कृषि सम्राट पुरस्कार और 2017 में अखिल भारतीय किसान गठबंधन का प्रगतिशील किसान पुरस्कार भी उनके नाम हुआ। लेकिन सबसे बड़ा सम्मान 2019 में आया, जब भारत सरकार ने कृषि में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें पद्म श्री से अलंकृत किया। आज वे सोनीपत के प्रगतिशील किसान क्लब के अध्यक्ष भी हैं।
उनके कारोबार की कहानी भी किसी सपने से कम नहीं है। रिपोर्टों के अनुसार वे बेबी कॉर्न की खेती से सालाना 4.5 से 5 करोड़ रुपये तक का टर्नओवर करते हैं। देश के प्रधानमंत्री ने भी प्रगतिशील किसानों के उदाहरण के रूप में उनका उल्लेख किया है। आज बेबी कॉर्न की खेती उनके गांव और आस-पास के 10 गांवों में करीब 2 हजार एकड़ में फैली हुई है, और सोनीपत देश में बेबी कॉर्न उत्पादन का सबसे बड़ा क्षेत्र बन गया है।
युवाओं के लिए संदेश
कंवल सिंह चौहान की कहानी युवा पीढ़ी को एक बड़ा संदेश देती है — खेती घाटे का सौदा नहीं, बल्कि सही सोच और नवाचार के साथ एक सुनहरा करियर है। उनका मानना है कि युवा किसानों को पारंपरिक फसलों के साथ-साथ नई और ज्यादा मूल्य वाली फसलों की ओर बढ़ना चाहिए। बाजार की मांग को समझकर, प्रोसेसिंग और मूल्य संवर्धन जोड़कर खेती को एक सफल व्यवसाय में बदला जा सकता है। उन्होंने यह भी साबित किया है कि जोखिम लेने से डरने के बजाय उसे समझदारी से प्रबंधित करना चाहिए।
निष्कर्ष
कंवल सिंह चौहान की जिंदगी इस बात का प्रमाण है कि खेत की मिट्टी में भी अरबों के सपने देखे जा सकते हैं, बशर्ते सोच में नयापन और मेहनत में निरंतरता हो। 16 साल की उम्र में हल चलाने वाले एक युवा किसान का सफर बेबी कॉर्न के बागान से होते हुए पद्म श्री तक पहुंचा, और रास्ते में उसने हजारों किसानों को साथ लेकर चला। उनकी कहानी हर उस युवा के लिए प्रेरणा है, जो अपने गांव और अपने खेत से बड़ा सपना देखता है।