सर्वोच्च अदालत का आधार से एडल्ट्री तक सुप्रीम एलान क्या है

देश की सर्वोच्च अदालत ने पिछले दो दिनों के अंदर चार ऐतिहासिक फैसले सुनाए हैं.आधार कार्ड, एससी,एसटी समुदाय के लोगों को नौकरी में प्रमोशन, कोर्ट की कार्यवाही का सीधा प्रसारण और एडल्ट्री के 158 साल पुराने कानून पर भी सुप्रीम कोर्ट ने अपनी मुहर लगा दी.सुप्रीम कोर्ट के विशिष्ट जजों ने ये फैसला बीते दो दिनों के अंदर सुनाया है.

कोर्ट के इन फैसलों के बाद अब आधार कार्ड कुछ सरकारी संस्थाओँ के अलावा जरूरी नहीं रहेगा. वहीं, क्रीमी लेयर के लोगों को छोड़कर एससी,एसटी समुदाय के लोगों को नौकरियों में आरक्षण जारी रहेगा. तो, राष्ट्रीय महत्व के मुकदमों की कार्यवाही को अब आम लोग अपने घर पर बैठकर देख सकेंगे.वहीं कोर्ट ने अपना चौथा फैसला महिलाओं की स्वतंत्रता पर सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट के इन अहम फैसलों को विस्तृत रूप में समझने का प्रयास करते हैं.

आधार कार्ड का फैसला

सर्वोच्च अदालत ने अपने पहले दिन के फैसले में देश के लोगों की जानकारी से जुड़ी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ये फैसला सुनाया.विवादों से घिरे आधार कार्ड पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वो सरकारी योजनाएं जिनमें सब्सिडी मिलती है उनके लिए आधार जरूरी होगा वहीं बैंक खाते, मोबाइल और स्कूलों में दाखिले आदि के लिए आधार जरूरी नहीं रहेगा.

वहीं आयकर रिटर्न और पैन कार्ड पाने के लिए भी आधार को जरूरी रखा गया है.बता दें कि कोर्ट का ये फैसला पांच जजों की बेंच ने सुनाया है. इस फैसले के दौरान मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा, एके सीकरी, एमएम खानविलकर और जस्टिस अशोक भूषण ने आधार कार्ड के फैसले पर मंजूरी दे दी. वहीं न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ ने इस कानून पर अपनी मंजूरी नहीं दी है.

एससी-एसटी आरक्षण

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को प्रोन्नति में आरक्षण के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने बुद्धवार को फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा कि एससी-एसटी को प्रोन्नति में क्रीमीलेयर के साथ ही आरक्षण दिया जाएगा.इसके लिए क्रीमी लेयर का सिद्धांत लागू होगा.

इसी के साथ कोर्ट ने राज्य और केंद्र सरकारों के आरक्षण देने से पहले पिछड़ेपन के आंकड़े जुटाने की शर्त रद्द कर दी.

कोर्ट का प्रसारण

सर्वोच्च अदालत ने बुद्धवार न्यायपालिका की पार्दर्शिता के मध्यनजर एक और फैसला लिया. मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने अपने इस फैसला में कोर्ट के प्रसारण के लिए अनुमति दे दी है.जिससे अब कोर्ट में जनसरोकार से जुड़े मामले सीधे जनता को दिखाए जाएंगे.कोर्ट का सीधा प्रसारण अभी प्रत्येक मामलों में नही होगा.

 

इसका प्रसारण सिर्फ उन मामलों में होगा जो देश के लिए महत्व रखते है. इन दौरान न्यायधीशों की पीठ ने कहा कि सीधा प्रसारण सेवा की शुरुआत वह अपने यहां से करेगा. वहीं, सीधा प्रसारण में करीब 70 सेकेंड की देरी भी रहेगी, जिससे अगर कभी कुछ गलत हुआ तो उसे वहीं रोका जा सके.

एडल्ट्री कानून रद्द

गुरुवार को सर्वोच्च अदालत ने अपने एक फैसले में 150 साल पुराने एडल्ट्री के कानून को खत्म कर दिया. कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा की पीठ ने ये फैसला आर्टिकल 14 (समता के अधिकार), 15 (धर्म, जाति, लिंग, भाषा अथवा जन्म स्थल में भेद नहीं) और अनुच्छेद 21 (जीने के अधिकार) के तहत सुनाया है. कोर्ट ने कहा की महिलाओं को पुरुषों की तरह बराबरी का हक मिलना चाहिए. बता दें कि पिछले एडल्ट्री कानून के तहत यदि कोई महिला शादी के बाद भी किसी पुरुष से प्रेम-प्रसंग करती थी तो महिला की पति की शिकायत पर उस पुरुष को 5 साल की जेल का प्रावधान था.वहीं शादी के बाद अगर कोई पुरुष किसी बालिग लड़की से संबंध बनाता था तो उसे अपराध नहीं माना जाता था.

बता दें कि इस 158 साल पुराने कानून में बदलाव करने के लिए इटली में रहने वाले एनआरआई जोसेफ शाइऩ ने कोर्ट में जनहित याचिका डाली थी. इस याचिका में उन्होंने कहा था की अगर महिला किसी से पुरुष से संबंध बनाती है तो वो भी बराबर की सजा की हकदार है. लेकिन पितृसत्तात्मक सोच महिला को दोषी नहीं मानती है लेकिन पति से मर्जी मिल जाए तो इस पर किसी को सजा नहीं मिलती है.जिस पर कोर्ट ने कहा कि धारा 497 महिला के सम्मान को खत्म करती है और महिलाओं को गरिमा से वंचित करती है.इसलिए इसे हटा दिया जाएगा.

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