Narayan Jaiswal IAS : एक ऐसे पिता की कहानी जिसने रिक्शा चलाकर बेटे को बनाया IAS अधिकारी, गरीबी में सूखी रोटी खाकर बेटे को पढ़ाया

Narayan jaiswal ias : कुछ कहानियां ऐसी होती है। जिनको पढ़कर आपके अंदर कुछ करने का जज्बा उत्पन्न होता है। ऐसी कहानियां हमारे जीवन को बहुत प्रभावित करती हैं। हमें उनसे कुछ न कुछ जरूर सीखने को मिलता है। कुछ ऐसी ही कहानी एक रिक्शा चलाने वाले पिता की है। जिनका नाम नारायण जयसवाल है। इन्होंने अपने जीवन में बहुत संघर्ष किया और ऐसे संघर्ष को देखकर ही इन्होंने अपने बेटे को आईएएस अफसर बनाने की ठानी,और बेटे को आईएएस बनाकर ही चैन की सांस ली। इस बीच उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा।

ऐसे भी दिन देखने पड़े जब सूखी रोटी खाकर रात गुजारी

बनारस के रहने वाले नारायण जायसवाल बताते हैं कि उनके परिवार में छः सदस्य थे. वो उनकी पत्नी और तीन बेटियां और एक बेटा था। नारायण जायसवाल बताते हैं कि मेरे पास लगभग 35 रिक्शे थे, जिन्हें मैं किराए पर चलवाता था। परिवार में सब ठीक-ठाक चल रहा था। फिर उनकी पत्नी की तबीयत खराब रहने लगी और घर की आर्थिक स्थिति भी खराब होने लगी। पत्नी का कई जगह इलाज होता रहा. तबीयत ज्यादा खराब होने पर उन्होंने कई डॉक्टरों को दिखाया।

जाँच में पता चला की उन्हें ब्रेन हेमरेज है और उनका ऑपरेशन करना पड़ेगा। पत्नी का ऑपरेशन कराने के लिए जब उन्हें कहीं से पैसे का जुगाड़ नही हो पाया तो उन्होंने अपने 20 रिक्शे बेच दिए। रिक्शे बेच कर उन्होंने अपनी पत्नी का ऑपरेशन कराया. दुर्भाग्य से वह अपनी पत्नी को बचा नही पाए। उस समय उनके बेटे गोंविद 7वीं कक्षा में थे। फिर भी वह अपने बेटे को पढ़ाई के लिए प्रेरित करते रहे।

पत्नी की मौत के बाद घर की आर्थिक स्थिति और खराब होने लगी। नारायण जायसवाल के ऊपर अब घर की पूरी जिम्मेदारी आ गयी। स्थिति कुछ ऐसी बदली की बेटियों की पढ़ाई और शादी के लिए सारे रिक्शे बेचने पड़े। केवल एक रिक्शा बचा था। उसी को चलाकर वह बेटे को स्कूल छोड़ते और घर का खर्चा चलाते। उनके बेटे को सब रिक्शेवाले का बेटा कहके चिढ़ाते थे। नारायण जायसवाल बताते है कि वह जब किसी से इस बात का जिक्र लोगो से करते की वह अपने बेटे को आईएएस अफसर बनाना चाहते हैं। तो लोग उनका मजाक बनाते और तंज कसते कि “रिक्शेवाले का बेटा आईएएस बनेगा”। नारायण जायसवाल ने फिर भी हिम्मत नही हारी और अपने बेटे को पढ़ाना जारी रखा।

ऐसे पास की IAS की परीक्षा

नारायण जायसवाल ने अपने बेटे का बारहवीं के बाद दाखिला हरिश्चंद्र यूनिवर्सिटी में कराया। गोविंद जायसवाल ने वहाँ से 2006 में स्नातक पूरा किया। वहाँ से स्नातक कराने के बाद उन्होंने बेटे को घर की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने का बावजूद दिल्ली में आईएएस की तैयारी के लिए भेजा।

दिल्ली जाकर गोविंद ने पिता का आर्थिक बोझ कम करने के लिए ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। साथ ही साथ मन लगाकर पढ़ाई भी करते रहे। उनकी और पिता की मेहनत का ही नतीजा था की उनका आईएएस पहले प्रयास में निकल गया। इनकी ऑल इंडिया रैंकिंग 48वीं थी। इनकी इस सफलता से पूरे परिवार में दोबारा से खुशियां लौट आयी।

गोंविद की सफलता का को लेकर उनकी बहन ममता बताती हैं कि गोंविद बचपन से पढ़ने-लिखने में काफी अच्छे थे। माँ के देहांत के समय जब वह 7वीं कक्षा में थे। तब घर पर सब कुछ ठीक नही था। तब भी गोंविद ने पढ़ाई जारी रखी। ममता आगे बताती हैं कि गोंविद के दिल्ली जाने के बाद पापा उनको सही से खर्चा भेज नही पाते थे। तो वह एक समय बिना कुछ खाये-पिये भूखे रह जाते थे।

नौकरी ने बदल दी पूरी जिंदगी

गोंविद को नौकरी मिलते ही घर की आर्थिक स्थिति में सुधार होने लगा। घर में किसी के न होने से पिता ने बेटे को शादी करने को कहा, तो वह ‘ना’ नही कह सके और अपने दामाद पर बेटे की शादी की जिम्मेदारी सौंप दी। नौकरी पाने के बाद उनकी पोस्टिंग कई जगह होती रही। जो लोग उनका और उनके पिता का मजाक उड़ाते थे। वह आज उनके परिवार से बड़े अदब से पेश आते हैं।

आईपीएस (IPS) से हुई उनकी शादी

नौकरी के चार बाद साल 2011 में उनकी शादी हुई। गोविंद की शादी को लेकर उनकी बहन ममता एक रोचक किस्सा बताती हैं। वह बताती हैं की मेरे पति के एक वकील मित्र हैं। उनकी और उनके वकील मित्र की काफी गहरी मित्रता थी। ऐसे ही एक बार बातचीत में गोंविद की शादी को लेकर उन दोनों के बीच चर्चा होने लगी। तभी उनके वकील मित्र ने बताया कि उनकी भाँजी का इसी साल आईपीएस परीक्षा पास की है।

फिर क्या था दोनों मित्रों की की दोस्ती रिश्तेदारी में बदल गयी। गोंविद ने भी शादी के लिए ‘हाँ’ कर दी। गोंविद की पत्नी दूसरी जाति की थी फिर उन्होंने शादी की। आज गोंविद और उनकी पत्नी देश के अलग-अलग हिस्सों में कार्यरत हैं। नारायण जायसवाल ने भी कड़ी मेहनत से वह सब हासिल कर लिया जिसके वह सपने देखते थे। उन्होंने अपने पिता होने के फर्ज को पूरा किया।

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