UPSC Success Story: किसान के बेटे से ‘ईमानदार IAS’ तक, 26 तबादलों से न डरे – यू. सगायम की प्रेरणादायक कहानी
तमिलनाडु के एक छोटे से गाँव से निकले यू. सगायम ने सिविल सेवा में वह मुकाम हासिल किया, जिसकी कोई कीमत नहीं लगा सकता — लोगों का भरोसा। वह पाँच बेटों में सबसे छोटे थे और उनके पिता किसान थे। तमिल माध्यम के सरकारी स्कूल में पढ़कर उन्होंने मास्टर डिग्री और कानून की पढ़ाई की, फिर UPSC की परीक्षा पास करके सिविल सेवा में आए। तीन दशक से ज़्यादा के करियर में उनका 25 से ज़्यादा बार तबादला हुआ, लेकिन उनका एक ही नियम अडिग रहा — न रिश्वत लेना, न झुकना। उनकी कहानी हर उस युवा के लिए है जो सोचता है कि ईमानदारी से सिस्टम नहीं बदलता — सगायम ने बदलकर दिखाया। और अगर आप भी सिविल सेवा का सपना देख रहे हैं, तो अपनी उम्र और मौके जानने के लिए UPSC Eligibility Calculator से अपनी पात्रता ज़रूर जाँच लें।
किसान के घर जन्मा सबसे छोटा बेटा
यू. सगायम (पूरा नाम उपगारम पिल्लई सगायम) का जन्म तमिलनाडु के पुदुक्कोट्टई ज़िले के पेरुनचुनाई गाँव में 22 मार्च को हुआ था। उनके पिता एक साधारण किसान थे और माँ गृहिणी। घर में पाँच बेटे थे और सगायम सबसे छोटे। उस दौर में गाँव के ज़्यादातर बच्चे खेतों में हाथ बँटाते थे, लेकिन सगायम की माँ की एक सीख ने उनकी ज़िंदगी की दिशा तय कर दी — ईमानदारी। एक बार बचपन में उन्होंने और उनके दोस्तों ने खेत में गिरे आम उठा लिए, तो माँ ने वे आम फेंकवाकर कहा कि सिर्फ अपनी मेहनत की चीज़ का ही स्वाद लेना चाहिए।
शुरुआती पढ़ाई उन्होंने गाँव के ही तमिल माध्यम वाले पंचायत स्कूल से की और फिर एल्लापट्टी के हायर सेकेंडरी स्कूल में गए। पैसे की तंगी थी, लेकिन पढ़ाई में लगन इतनी थी कि उन्होंने चेन्नई के लोयोला कॉलेज से सोशल वर्क में मास्टर डिग्री हासिल की और फिर चेन्नई लॉ कॉलेज से कानून की डिग्री भी ली। गाँव के एक साधारण किसान का बेटा जब इतनी पढ़ाई पूरी करके शहर लौटा, तो गाँव वालों के लिए वह गर्व का विषय बन गया था।
सिविल सेवा का फैसला: व्यवस्था बदलने की शपथ
पढ़ाई पूरी करने के बाद सगायम ने UPSC की सिविल सेवा परीक्षा दी और उसे पास करके 1989 में दिल्ली में सेंट्रल सेक्रेटेरिएट सर्विस में शामिल हुए। लेकिन उनका मन दिल्ली की कुर्सी में नहीं लगा — वह तमिलनाडु के लोगों के बीच काम करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने तमिलनाडु पब्लिक सर्विस कमीशन की ग्रुप-I परीक्षा भी पास की और 1990 में तमिलनाडु में डिप्टी कलेक्टर के रूप में जुड़ गए। बाद में 2001 में उन्हें IAS में कन्फर्म किया गया।
सगायम ने नौकरी में आने से पहले ही यह तय कर लिया था कि वह सिस्टम के भीतर रहकर सिस्टम की गंदगी से लड़ेंगे। यह फैसला आसान नहीं था, क्योंकि उन्हें पता था कि ईमानदारी की राह पर चलने वाले अफसर को हर कदम पर विरोध झेलना पड़ता है। लेकिन गाँव की मिट्टी से जुड़े इस युवक के इरादे चट्टान जैसे मज़बूत थे, और यही इरादा आने वाले दशकों में उनकी पहचान बना।
26 तबादले, लेकिन न टूटा हौसला
1991 में जब सगायम ऊटी (उटकमंड) में सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट के रूप में पहली पोस्टिंग पर आए, तो उन्होंने जिला कलेक्टर पर बड़े चाय बागानों के मालिकों के पक्ष में पक्षपात का आरोप लगा दिया। यह उनकी पहली लड़ाई थी और इसके बाद तबादलों का सिलसिला शुरू हो गया। अपने 30 साल के करियर में उनका 25 से ज़्यादा बार तबादला हुआ — यानी औसतन हर साल से भी कम समय में एक नई जगह। कई बार उन्हें जान से मारने की धमकियाँ भी मिलीं, खासकर जब उन्होंने खनन माफिया के खिलाफ कार्रवाई की।
लेकिन सगायम ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने सरकार से कई बार शिकायत की कि उन्हें जानबूझकर महत्वहीन पदों पर रखा जा रहा है, फिर भी उन्होंने हर पोस्टिंग में पूरी निष्ठा से काम किया। 2020 में उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) के लिए आवेदन दिया, जिसे जनवरी 2021 में स्वीकार कर लिया गया। उन्होंने कहा था कि अब वह लोगों की सेवा में खुद को और गहराई से लगाना चाहते हैं — वर्दी उतरी, लेकिन मिशन नहीं बदला।
सगायम की ‘सफलता की रणनीति’: ईमानदारी के तीन हथियार
सगायम की सफलता किसी एक घटना की देन नहीं थी, बल्कि उनकी रोज़मर्रा की ईमानदारी का नतीजा थी। उन्होंने अपनी रणनीति को तीन सीधे-सादे सिद्धांतों में बाँध रखा था, जिन पर वह जीवन भर अडिग रहे। यही सिद्धांत उन्हें तमिलनाडु का सबसे भरोसेमंद अफसर बनाते चले गए।
1. रिश्वत से इंकार, संपत्ति का खुलासा
उनके दफ्तर के दरवाज़े पर तमिल में एक तख्ती लगी रहती थी — “लंजम थविर्थु नेंजम निमिर्थु”, यानी “रिश्वत ठुकराओ, सिर ऊँचा रखो”। 2009 में जब वह नमक्कल के कलेक्टर थे, तो उन्होंने अपनी निजी संपत्ति का ब्योरा ज़िले की वेबसाइट पर खुद ही सार्वजनिक कर दिया। वह देश के पहले IAS अधिकारी थे जिन्होंने ऐसा किया। इस कदम ने उन्हें आम जनता के बीच ‘कॉमन मैन के कलेक्टर’ की उपाधि दिला दी।
2. आम आदमी से सीधा जुड़ाव
सगायम ने ‘उझवन उनवगम’ नाम से किसानों का फूड कोर्ट शुरू किया, जहाँ गरीब किसान अपना पारंपरिक खाना बेच सकते थे। उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी वी. ओ. चिदंबरम के तीन परपोतों के पुनर्वास में भी मदद की। वह कहते थे कि अफसर की कुर्सी जनता की सेवा के लिए है, रुतबे के लिए नहीं। यही सोच उन्हें लोककथाओं का नायक बना गई।
3. कानून के सामने किसी से डर नहीं
2000 में कांचीपुरम में अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट रहते हुए उन्होंने पेप्सी की बॉटलिंग फैक्ट्री को सील कर दिया, जब लैब रिपोर्ट में नमूने मानव उपभोग के लिए अनुपयुक्त पाए गए। 2004 में चेन्नई में उन्होंने तीन दिन में 5,000 सब्सिडी वाले घरेलू गैस सिलेंडर जब्त किए, जिनका रेस्तरां अवैध इस्तेमाल कर रहे थे। 2011 में मदुरै के कलेक्टर के रूप में उन्होंने वोटरों को रिश्वत देने के कई प्रयास विफल किए, और 2012 में मद्रास हाईकोर्ट के लीगल कमिश्नर के रूप में मदुरै में अवैध ग्रेनाइट खनन की जाँच की — उनकी रिपोर्ट में एक लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा के नुकसान का खुलासा हुआ और कई रसूखदार नेताओं व कंपनियों पर आरोप लगे।
सफलता का पल: जब ईमानदारी बनी पहचान
सगायम के लिए सबसे बड़ा सम्मान कोई पद या पुरस्कार नहीं था, बल्कि लोगों का वह प्यार था जो उन्हें ‘ईमानदार IAS’ कहकर देता था। ग्रेनाइट घोटाले की जाँच के दौरान जब खनन लॉबी ने उनकी जान को खतरा बताया, तब आम लोग उनके साथ खड़े हुए। एक अखबार ने तो यहाँ तक लिखा कि “आम आदमी का कलेक्टर अब लोककथाओं का नायक बन गया है”।
सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने चेन्नई के साइंस सिटी के उपाध्यक्ष के रूप में काम किया और फिर पूरी तरह समाज सेवा में लग गए। महामारी के दौरान उन्होंने अपनी तनख्वाह का एक हिस्सा कोरोना राहत कार्यों में दिया और गरीब छात्रों की पढ़ाई में भी मदद की। उनकी कहानी साबित करती है कि सत्ता के गलियारों में रहकर भी इंसान अपनी आत्मा नहीं बेचता, बशर्ते इरादे नेक हों।
युवाओं के लिए सगायम का संदेश
सगायम हमेशा युवाओं से कहते हैं कि ईमानदारी कोई कमज़ोरी नहीं, सबसे बड़ी ताकत है। उनके मुताबिक, अगर आप सही रास्ते पर हैं तो तबादले, धमकियाँ और दबाव आपको रोक नहीं सकते — बस आपका मकसद साफ होना चाहिए। उन्होंने अपनी माँ की वह सीख कभी नहीं भूली कि “सिर्फ अपनी मेहनत की चीज़ का स्वाद लो”।
वह युवाओं को यह भी सिखाते हैं कि परीक्षा पास करना ही काफी नहीं है, असली इम्तिहान तो नौकरी के बाद शुरू होता है। कुर्सी पर बैठकर फैसले लेना आसान है, लेकिन जनता के हित में खड़े होना मुश्किल। जो युवा सिविल सेवा में आना चाहते हैं, उन्हें सगायम की तरह पहले से यह तय कर लेना चाहिए कि वह सिस्टम के हिस्से बनेंगे या सिस्टम को बदलने वाले।
निष्कर्ष
यू. सगायम की कहानी हमें सिखाती है कि बड़ी सफलता के लिए बड़े संसाधन नहीं, बड़ा चरित्र चाहिए। किसान के बेटे से लेकर देश के सबसे ईमानदार अफसरों में गिने जाने तक का उनका सफर इस बात का सबूत है कि सच्चाई की राह कठिन ज़रूर है, लेकिन अकेली नहीं है। आज भी तमिलनाडु के गाँवों में उनकी कहानी सुनाई जाती है और युवा उन्हें अपना आदर्श मानते हैं।
अगर आप भी उनके जैसा सपना देखते हैं, तो देर किस बात की — तैयारी की शुरुआत आज से ही करें और पूरी लगन से तैयारी में जुट जाएँ। कौन जाने, अगली प्रेरणादायक कहानी आपकी ही हो।