Kisan Success Story: घड़ी के नाम पर धान की किस्म और कंगाली में मिली प्रसिद्धि – दादाजी रामजी खोबरागड़े की प्रेरणादायक कहानी
कहते हैं कि शोध के लिए बड़ी प्रयोगशालाएँ चाहिए, डिग्रियाँ चाहिए और मोटा बजट चाहिए। लेकिन महाराष्ट्र के एक गाँव के किसान दादाजी रामजी खोबरागड़े ने इस धारणा को मिट्टी में मिला दिया। उनके पास न डिग्री थी, न प्रयोगशाला, न ही ज़मीन — सिर्फ डेढ़ एकड़ का एक छोटा-सा खेत था। फिर भी उन्होंने अपने खेत की मेड़ से ही धान की ऐसी किस्में विकसित कर दीं, जिन्होंने पाँच राज्यों के किसानों की थाली बदल दी। उनकी सबसे मशहूर किस्म का नाम “एचएमटी” किसी कृषि विश्वविद्यालय ने नहीं, बल्कि एक घड़ी के नाम पर रखा गया।
बचपन और पृष्ठभूमि
दादाजी रामजी खोबरागड़े महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के नागभीड़ तहसील के नांदेड़ गाँव के रहने वाले थे। वे एक दलित परिवार में पैदा हुए थे, जहाँ गरीबी घर की दहलीज पर ही बैठी रहती थी। उनके पास खेती के नाम पर सिर्फ डेढ़ एकड़ ज़मीन थी, जिसमें मुश्किल से परिवार का गुजारा चल पाता था। पढ़ाई-लिखाई का कोई माहौल नहीं था, लेकिन एक चीज़ उन्होंने अपने पिता से सीखी थी — खेत में अगर कोई दाना या बाली अलग दिखे, तो उसे बचाकर रखो और अगले सीज़न में अलग से बो दो। यह छोटी-सी सीख उनके जीवन का सबसे बड़ा शोध मंत्र बन गई। गाँव के लोग उन्हें एक साधारण किसान समझते थे, लेकिन उनकी आँखें हमेशा खेत में कुछ नया खोजती रहती थीं।
वह मोड़ जिसने सब बदल दिया
सन् 1983 के आसपास एक दिन दादाजी ने अपने धान के खेत में देखा कि तीन बालियों में कुछ दाने अलग थे — रंग में हल्के पीले-भूरे और आकार में छोटे। किसी और किसान के लिए यह मायने नहीं रखता, लेकिन दादाजी ने पिता की सीख याद की और उन दानों को संभालकर रख लिया। अगले सीज़न में उन्होंने छह फुट के एक छोटे-से प्लॉट में ये दाने बोए और उसे कांटेदार डालियों से ढक दिया ताकि जानवर न चरें। जब पौधे पके, तो उन्होंने देखा कि बालियाँ मजबूत थीं और दाने भरपूर थे — पहली बार में सिर्फ 250 ग्राम धान मिला। लेकिन दादाजी का हौसला बढ़ा। उन्होंने प्रयोग जारी रखा और एक बार 10 किलो धान मिल गया। सन् 1988 में उन्होंने 10 फुट के प्लॉट में 4 किलो बीज बोया और 400 किलो धान काट लिया। अगले साल करीब 100 किलो बीज से उन्हें 90 बोरियों जितना धान मिला। यह चमत्कार देखकर उन्होंने कटे हुए धान का कुछ हिस्सा दूसरे किसानों को भी दे दिया, और देखते ही देखते यह नई किस्म पूरे इलाके में फैलने लगी।
सफलता की रणनीति
दादाजी की सफलता कोई किस्मत का खेल नहीं थी। इसके पीछे उनकी अपनी बनाई रणनीति थी, जो किताबों से नहीं, खेत की मिट्टी से निकली थी। आइए जानते हैं उनके काम के वे सूत्र, जिन्होंने एक साधारण किसान को “बीज वैज्ञानिक” बना दिया।
1. प्रकृति का गहरा अवलोकन
दादाजी रोज़ सुबह खेत जाते और घंटों बालियों को देखते रहते। वे रंग, आकार, खुशबू और पकने के समय में मामूली अंतर भी पकड़ लेते थे। उनका मानना था कि प्रकृति हर साल किसान को नए उपहार देती है, बस उन्हें पहचानने वाली आँख चाहिए। यही अवलोकन उनकी सबसे बड़ी प्रयोगशाला थी, जिसमें न बिजली थी, न यंत्र — सिर्फ धैर्य और जिज्ञासा थी।
2. बीज संरक्षण का धैर्य
एक नई किस्म एक सीज़न में नहीं बनती। दादाजी ने पाँच साल तक एचएमटी किस्म पर काम किया — हर साल सबसे अच्छे दाने चुनना, अलग बोना, उपज नापना और फिर से चुनना। यह धीमा और उबाऊ काम था, जिसमें कोई तुरंत फायदा नहीं था। लेकिन उनका धैर्य इतना गहरा था कि वे सालों तक एक ही प्रयोग को दोहराते रहे, जब तक किस्म स्थिर न हो जाए।
3. ज्ञान बाँटने की उदारता
जैसे ही नई किस्म तैयार होती, दादाजी बीज दूसरे किसानों को मुफ्त में दे देते। उन्होंने कभी बीज को छिपाकर रखने या उस पर कब्ज़ा करने की कोशिश नहीं की। उनका मानना था कि अच्छा बीज जितने खेतों में जाएगा, उतना ही किसानों का भला होगा। इसी उदारता से एचएमटी धान पाँच राज्यों तक पहुँचा और लाखों किसानों की आय बढ़ी।
4. स्थानीय ज़रूरतों पर ध्यान
दादाजी ने कभी विदेशी या महंगी तकनीक का सपना नहीं देखा। उन्होंने अपने इलाके की मिट्टी, पानी और मौसम के हिसाब से किस्में विकसित कीं। उनकी एचएमटी किस्म की औसत उपज 40-45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर थी और चावल की रिकवरी दर 80 प्रतिशत तक थी। चावल सुगंधित था और पकाने की गुणवत्ता भी बेहतरीन थी, इसलिए बाज़ार में उसकी माँग अपने आप बढ़ती गई।
संघर्ष का दौर
सफलता की यह कहानी उतनी मीठी नहीं है, जितनी दिखती है। जब एचएमटी धान बाज़ार में धूम मचाने लगा, तो कृषि विश्वविद्यालय के अधिकारी दादाजी के खेत पर आए। सन् 1996 में विश्वविद्यालय ने इस किस्म को प्रमाणित किया और अगले साल “पीकेवी-एचएमटी” नाम से बाज़ार में उतार दिया, यह दावा करते हुए कि उन्होंने बीज को “शुद्ध” करके नई किस्म बनाई है। दादाजी को इसका कोई श्रेय नहीं मिला। उनकी एक और किस्म “डीआरके” (उनके अपने नाम दादाजी रामजी खोबरागड़े के शुरुआती अक्षरों पर) का नाम बदलकर “जय श्रीराम” कर दिया गया, क्योंकि व्यापारियों को एक दलित के नाम वाली किस्म बेचने में संकोच था। दादाजी को यकीन था कि उनकी जाति उनके रास्ते में आई। निजी जीवन में भी दुख कम नहीं थे — बीमार बेटे के इलाज के लिए उन्हें ज़मीन का हिस्सा बेचना पड़ा। वे कर्ज़ में डूबते गए, लेकिन प्रयोग करना नहीं छोड़ा।
सफलता का क्षण
लंबे संघर्ष के बाद दादाजी की मेहनत को देश ने पहचाना। सन् 2005 में नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन ने उन्हें तीसरे राष्ट्रीय ग्रासरूट इनोवेशन पुरस्कार से सम्मानित किया, और यह पुरस्कार उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के हाथों मिला। यह उनके जीवन का सबसे गौरवशाली क्षण था — डेढ़ एकड़ का किसान राष्ट्रपति भवन तक पहुँच गया था। इसके बाद सम्मानों की झड़ी लग गई: पहला रिछारिया पुरस्कार, वसंतराव नाईक कृषिभूषण पुरस्कार, डॉ. पंजाबराव देशमुख कृषि रत्न पुरस्कार और सन् 2010 में फोर्ब्स पत्रिका की भारत के शीर्ष सात ग्रामीण उद्यमियों की सूची में उनका नाम शामिल हुआ। अपने जीवन में उन्होंने धान की कम से कम नौ किस्में विकसित कीं — नांदेड़ चिनूर, नांदेड़ 92, नांदेड़ हीरा, विजय नांदेड़, दीपक रत्न, डीआरके, काटे एचएमटी और डीआरके सुगंधी। सन् 2012 में उनकी एचएमटी किस्म “दादाजी एचएमटी” नाम से आधिकारिक तौर पर पंजीकृत हुई।
युवाओं के लिए संदेश
दादाजी खोबरागड़े की कहानी हर युवा को एक सीधा संदेश देती है — बड़ी सफलता के लिए बड़ी डिग्री ज़रूरी नहीं, बड़ी जिज्ञासा ज़रूरी है। आज का युवा खेती को पिछड़ा काम समझकर शहरों की ओर भागता है, लेकिन दादाजी ने दिखा दिया कि खेत भी प्रयोगशाला हो सकता है, अगर आँखों में सवाल हों। उनका दूसरा संदेश है धैर्य का — पाँच साल तक एक ही प्रयोग को दोहराना आसान नहीं, लेकिन वही धैर्य उन्हें राष्ट्रपति के सामने ले गया। और सबसे बड़ा संदेश है ईमानदारी का — उन्होंने बीज बाँटे, ज्ञान छिपाया नहीं, और निजी कंपनी को अपनी किस्मों के अधिकार बेचने से इनकार कर दिया। वे “भारत बीज स्वराज मंच” के संस्थापक सदस्य बने और बीज संप्रभुता की लड़ाई लड़ी, ताकि किसानों का बीज पर हक़ बना रहे।
निष्कर्ष
सन् 2018 में 79 वर्ष की उम्र में दादाजी रामजी खोबरागड़े का निधन हो गया। वे गरीबी और कर्ज़ में इस दुनिया से गए, लेकिन अपने पीछे ऐसी विरासत छोड़ गए जो किसी खजाने से कम नहीं। आज भी उनकी विकसित किस्में देश के कई हिस्सों में उगाई जाती हैं और हज़ारों किसान उनसे रोटी कमा रहे हैं। उनकी कहानी हमें याद दिलाती है कि सम्मान कभी-कभी देर से मिलता है, और कभी पूरा नहीं मिलता — लेकिन मेहनत कभी बेकार नहीं जाती। डेढ़ एकड़ के खेत से राष्ट्रपति भवन तक का यह सफ़र हर उस किसान के लिए प्रेरणा है, जो मिट्टी से सोना निकालने का सपना देखता है।